मन की आँखें
मन की आँखें
दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया।
“सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।”
बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया।
बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे लगा जैसे वे पत्थर उसे अपनी ओर बुला रहे हों। कुछ देर बाद बस किले के निकट पहुँचकर रुकी। बच्चे बस से उतरकर किले की ओर बढ़ने लगे। प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सबकी नज़र उसके विशाल दरवाज़े पर टिक गई। मोटी लकड़ी का भारी फाटक लोहे की नुकीली कीलों से जड़ा था। ऊपर बने झरोखे ऐसे लग रहे थे जैसे अभी भी कोई सैनिक वहाँ से झाँक पड़ेगा।
“सर, क्या ये झरोखे सैनिकों के लिए बनाए गए थे?” हार्दिक ने उत्सुकता से पूछा।
“अच्छा प्रश्न,” शिक्षक मुस्कराए, “हाँ, ऐसे स्थानों से सैनिक आसपास के क्षेत्र पर नज़र रखते थे।”
हार्दिक कुछ और पूछना चाहता था। तभी शिक्षक ने एक स्थानीय गाइड को बुलाया। उसकी सफेद मूँछें और शांत मुस्कान अनुभव की कहानी कह रही थीं।
“गाइड साहब, आप हार्दिक को पूरा किला अच्छी तरह घुमा दीजिए। बड़ा जिज्ञासु बालक है।”
“आओ सा!” गाइड ने मुस्कराते हुए कहा।
हार्दिक कुछ क्षण उसके संबोधन को समझ नहीं पाया।
“सा का क्या मतलब होता है?” उसने पूछा।
गाइड हँस पड़ा। “बेटा, राजस्थानी में ‘सा’ सम्मान और अपनत्व का शब्द है। जैसे हिंदी में हम किसी बड़े या आदरणीय व्यक्ति के लिए ‘जी’ कहते हैं, वैसे ही यहाँ ‘सा’ कहा जाता है। ‘आओ सा’ का मतलब है— आइए जी, आपका स्वागत है। इसमें सम्मान भी है और स्नेह भी।”
“धन्यवाद सा!” हार्दिक ने तुरंत कहा।
गाइड उसकी बात सुनकर खिलखिला पड़ा।
“आज मैं तुम्हें एक ऐसी बात बताऊँगा, जो इस पुराने किले को खास बनाती है।”
“वह कौन-सी बात?”
“यह किला केवल इतिहास की निशानी नहीं, हमारी विरासत भी है। और विरासत को मन की आँखों से देखने का आनंद कुछ और ही होता है।”
“मन की आँखें?” हार्दिक ने आश्चर्य से पूछा।
गाइड बोला, “बेटा, मन की आँखें वही होती हैं जिनसे हम केवल देखते नहीं, समझते भी हैं।”
यह सुनकर हार्दिक चुप हो गया।
वे दोनों किले के भीतर चले गए। ऊँची पत्थर की दीवारों के बीच से ठंडी हवा बह रही थी। टूटे हुए जीने, पुराने खंभे और समय की मार झेल चुके दरवाज़े बीते युग की कहानियाँ कहते प्रतीत हो रहे थे।
एक स्थान पर रुककर गाइड ने बताया—“बहुत समय पहले यहाँ पृथ्वीराज चौहान का शासन था। अजमेर उनकी प्रमुख राजधानी थी। बाद में उन्होंने दिल्ली पर भी अधिकार किया और उत्तर भारत के शक्तिशाली शासकों में गिने गए।”
हार्दिक ध्यान से सुन रहा था।
“क्या वे सचमुच शब्दभेदी बाण चलाते थे?”
“लोककथाओं में ऐसा कहा जाता है,” गाइड बोला। “शब्दभेदी बाण का अर्थ है केवल आवाज़ के आधार पर लक्ष्य भेदना। यह केवल शक्ति नहीं, बल्कि बहुत अभ्यास और गहरी एकाग्रता का परिणाम माना जाता है।”
“यानी अभ्यास आँखों से देखने से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है?”
“बिलकुल। जब मन पूरी तरह किसी काम पर लग जाता है, तब हम ऐसी बातें भी समझ पाते हैं जो केवल आँखों से दिखाई नहीं देतीं।”
घूमते-घूमते हार्दिक थक गया। गाइड ने उसे कुछ देर विश्राम करने को कहा। वह एक पत्थर पर बैठ गया और दीवार पर हाथ फेरने लगा। धीरे-धीरे उसका मन कल्पनाओं के पंख लगाकर उड़ने लगा। उसे लगा जैसे किले की प्राचीरों पर मशालें जल रही हैं। चौहान ध्वज हवा में लहरा रहा है। सैनिक कवच पहनकर दौड़ रहे हैं। घोड़ों की टापों से धरती गूँज रही है। रणभेरी की आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर लौट रही है। किले के विशाल आँगन में एक वीर योद्धा धनुष उठाए खड़ा है। उसका चेहरा दृढ़ है। चारों ओर सन्नाटा छा गया है। तभी एक आवाज़ सुनाई देती है। योद्धा धनुष पर तीर चढ़ाता है।
हार्दिक साँस रोके उस दृश्य को देख रहा था।
उसी समय किसी ने उसके कंधे पर हल्का-सा हाथ रखा।
“अरे सा! आप सो गए क्या?”
हार्दिक चौंककर वर्तमान में लौट आया।
“नहीं,”मैं तो जैसे पुराने समय में पहुँच गया था।”
गाइड भी मुस्करा दिया। “जब हम किसी बात को मन से समझने की कोशिश करते हैं, तब बीता हुआ समय भी हमारे सामने जीवित हो उठता है।”
हार्दिक को अपने जुड़वाँ भाई आभार की याद आ गई। उसने सोचा— काश, वह भी यहाँ होता। मैं उसे बताता कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, इन पत्थरों में भी छिपा होता है। धीरे-धीरे दिन दोपहर की ओर बढ़ने लगा। बच्चे पेड़ों की छाया में बैठकर टिफिन खाने लगे। हार्दिक को गाइड की बातें याद आने लगीं। उसे अपनी चित्रकला प्रतियोगिता भी याद आ गई, जिसमें वह पिछले वर्ष सफल नहीं हो पाया था क्योंकि उसने पर्याप्त अभ्यास नहीं किया था।
उसने मन ही मन निश्चय किया—अगर किसी भी काम में अच्छा बनना है, तो अभ्यास करना ही होगा। शायद इसी कारण कुछ लोग इतिहास में याद रखे जाते हैं।
शाम होने लगी थी। शिक्षकों ने बच्चों को बस में बैठने के लिए बुला लिया। सभी बच्चे थक चुके थे। कोई ऊँघ रहा था, कोई खिड़की से बाहर देख रहा था।
अरावली की पहाड़ियों के पीछे सूरज लालिमा बिखेरते हुए ढल रहा था।
हार्दिक ने अपनी डायरी निकाली और लिखा—“आज मुझे समझ आया कि किसी भी काम में अच्छा बनने के लिए अभ्यास बहुत ज़रूरी है। और किले में बैठकर मुझे लगा जैसे पुराना समय मेरे सामने जीवित हो उठा हो। शायद यही मन की आँखों का कमाल है।”
उसने डायरी बंद कर दी।
दूर पहाड़ी पर खड़ा किला धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा था। डूबते सूरज की रोशनी उसकी दीवारों पर कुछ देर चमकती रही, फिर धुंधली पड़ गई।
हार्दिक के मन में एक विचार कौंधा—“मन की आँखें खुली हों, तो पुराने पत्थर भी कहानियाँ सुनाने लगते हैं।”
बस आगे बढ़ती रही और अरावली की पहाड़ियों के पीछे किले की शांत छाया धीरे-धीरे ओझल हो गई। लेखिका: कल्पना मनोरमा
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