स्वर्ग का अंतिम उतार

“ स्वर्ग का अंतिम उतार ” डॉ. लक्ष्मी शर्मा जी की उपन्यासिक कृति पढ़कर निवृत हुई हूँ। स्वर्ग पाने के नाम पर न जाने हम क्या-क्या करते रहते हैं। प्रत्येक संसारी जीव की ये आकांक्षा रहती है कि उसे कैसे न कैसे स्वर्ग हासिल हो। कभी-कभी जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि स्वर्ग में आख़िर होता क्या होगा ? कौन वहाँ का संचालक होगा ? कैसी वहाँ की सुख-सुविधाएँ होंगी ? क्या वहाँ भी महामहिम जनों की राजनीत- कूटनीति से लोग शिकार होते होंगे ? कितना भी उछल-कूद लो स्वर्ग के छज्जे से झाँकने तक को नहीं मिलता। कोई नहीं जानता वहाँ की व्यवस्था और व्यस्थापक कौन और कैसा है क्योंकि वहाँ जाकर कोई आज तक लौटा नहीं है। क्या वहाँ जाकर जीव की सारी इच्छाएँ भस्म हो जाती हैं ? या जीव भ्रामक हो चकरघिन्नी बन वहीं का वहीं डोलता रह जाता है ? हालाँकि बड़े-बड़े चिन्तक और विचारक ये भी कहते हैं कि स्वर्ग-नर्क सब कुछ यहीं इसी पृथ्वी लोक पर हैं और हम प्रतिदिन उनसे रूबरू भी होते रहते हैं लेकिन स्वार्गिक स्वाद से अनभिज्ञ होने के कारण अछूते ही रह जाते हैं। इस तरह स्वर्ग पाने की लालसा में फँसा जीव एक पल को भी सुकून से नहीं जी पाता है। ...