पारंपरिक बनाम नेगोशिएबल पेरेंटिंग

तस्वीर इन्स्टाग्राम से साभार " नेगोशिएबल पेरेंटिंग " माने माता-पिता और बच्चों के बीच जीवन, प्रेम और शक्ति के प्रेमिल समीकरणों और खुरदुरे संघर्षों का उचित प्रबंधन! माने थोड़ा तुम हमारी ओर चलो , थोड़ा हम तुम्हारी ओर चलें और इस तरह एक ऐसा अनुमोदित धरातल निर्धारित करें जहाँ ठहरकर अभिभावक और शिशु दोनों खुलकर साँस ले सकें। दोनों अपने-अपने जीवनानुभव के क्षेत्र में मुक्त कंठ से एक दूसरे की सराहना कर सकें और दैहिक-मासिक ‘ स्पेस ’ में अपने होने का उत्सव मना सकें। जिन परिवारों में अभिभावकीय तादात्म के स्थान पर तनाव व तानाशाही रहती है , वहाँ पलने-बढ़ने वाले शिशु डरे-सहमें जीवन को निमित्त बनाकर तनावपूर्ण संस्कारों को अपना आलंब बनाते हैं और जब वे शिशु पूर्ण मानव के रूप में समाज में विहार करते हैं तब उनके सानिद्ध्य में आने वाले क्लेश को प्राप्त होते रहते हैं। प्रेम-सद्भावना में पोषित शिशु चंदन वृक्ष की तरह होता है। जिसके नजदीक जाना माने शीतलता की परिधि में घुसना है। जिस घर में दिन के समस्त पहरों में अभिभावकीय निर्देशित स्वर गूँजता रहता है , वहाँ नज़रों क...