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तीन सहेलियाँ

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                    तीन सहेलियाँ बरगद के बड़े-से पेड़ की जड़ों में चींटियों का एक बड़ा-सा नगर बसा था। सूरज की पहली किरण पड़ते ही वहाँ चहल-पहल शुरू हो जाती। कोई भोजन की खोज में निकल पड़ता, कोई बच्चों की देखभाल में लग जाता, तो कोई नए रास्ते खोजने में जुट जाता। उसी नगर में तीन सहेलियाँ रहती थीं। लाली, काली और गोरी। लाली बहुत फुर्तीली थी। उसे दूर-दूर तक जाकर दाने खोजने में मज़ा आता था। काली समझदार थी, मगर धीरे-धीरे चलती थी। चलते समय वह गंध की एक पतली-सी लकीर छोड़ती जाती, ताकि पीछे आने वाली चींटियाँ, चाहे कितनी भी थकी हों, रास्ता न भूलें। गोरी धैर्यवान थी। वह भारी-से-भारी सामान को भी सावधानी से घर तक पहुँचाने में माहिर थी। एक सुबह तीनों भोजन की तलाश में निकलीं। बाग में पेड़-पौधे हवा में डोल रहे थे। ओस से भीगी घास धूप में चमक रही थी। तभी लाली की नज़र गेहूँ के एक बड़े दाने पर पड़ी। उसने खुशी से आवाज़ लगाई, "देखो, देखो! मुझे क्या मिला!" गोरी दौड़ती हुई वहाँ पहुँची और दाने को देखकर दंग रह गई। "इतना बड़ा दाना! इसे कौन ले जा सकता ह...