पंडिता रमाबाई
पंडिता रमाबाई भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 2 पंडिता रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल 1858 को हुआ। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे संस्कृत के विद्वान थे और वे स्त्रियों की शिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत सिखाई और लक्ष्मीबाई आगे रमाबाई की पढ़ाई में प्रेरणा बनीं। रमाबाई की शुरुआती शिक्षा घर में ही हुई। माँ उन्हें संस्कृत के श्लोक और धार्मिक ग्रंथ पढ़ाती थीं। उस समय लड़कियों के लिए संस्कृत और शास्त्रों का अध्ययन सामान्य नहीं माना जाता था। घर में मिली इस शिक्षा ने रमाबाई को केवल बहुत कुछ याद करना नहीं सिखाया, बल्कि स्वयं सीखने का भरोसा भी दिया। आगे चलकर यही शिक्षा उनकी विद्वत्ता की पहली नींव बनी। रमाबाई का बचपन एक जगह ठहरकर नहीं बीता। उनके पिता धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते थे और इसी क्रम में परिवार को अलग-अलग स्थानों की यात्रा करनी पड़ती थी। इन यात्राओं में रमाबाई ने भारत के अनेक क्षेत्रों और वहाँ के जीवन को करीब से देखा। परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन थी, फिर भी पढ़ने और शास्त्रों को समझने का क्रम बना रहा। कम उम्र में ही उ...