2025 सितम्बर की एक डायरी
21 सितम्बर 2025
आज पंद्रह सोलह वर्षों बाद उस स्त्री के तीन संदेश आए जो रिश्ते में मेरी भांजी लगती है।
किताबें लिखते हुए मैंने अपने भीतर जमी दुख की परतों को न जाने कितनी बार खरोंचा है। हर बार लगा जैसे शब्द नहीं, अपनी ही आत्मा को कुरेद रहा हूँ। इतनी बार कि भीतर तक लहूलुहान हो गया। यह एक प्रसंग है।
दूसरा प्रसंग तब का है जब उम्र में मुझसे लगभग तीन गुना छोटी एक स्त्री कह देती है, "I don't know, so called your fucking sensitivity." तब समझ में आता है कि संवेदनाएँ एक दिन में नहीं मरतीं। उन्हें धीरे धीरे मारा जाता है।
आज उसके संदेश में अपने पिता के बारे में घटनाओं की एक लंबी सूची थी। चरित्रहीनता के आरोप थे। आर्थिक शोषण की बातें थीं। अपमान था। अश्लील व्यवहार का वर्णन था। मानसिक प्रताड़ना थी। रिश्तों को तोड़ने के आरोप थे। हो सकता है उसमें बहुत कुछ सच हो। हो सकता है वह सच का केवल एक हिस्सा हो। मैं उसका निर्णय नहीं कर सकता। न मुझे किसी को दोषी ठहराना है और न निर्दोष।
लेकिन उस पूरे संदेश में जो बात मुझे सबसे ज्यादा दुख दे गई, वह आरोप नहीं थे। दुख इस बात का था कि एक बेटी के मन में अपने पिता के लिए केवल घृणा बची है। ऐसा एक दिन में नहीं होता। यह बरसों की खेती होती है।
बच्चा पैदा होते ही किसी से नफरत करना नहीं जानता। उसे सिखाया जाता है कि किससे प्रेम करना है और किससे घृणा। वह वही मानता है जो उसके आसपास बार बार कहा जाता है। जब वर्षों तक किसी एक व्यक्ति के बारे में केवल बुरा ही सुनाया जाता है तो एक समय ऐसा आता है जब बच्चा अपने अनुभव से नहीं, दूसरों के अनुभव से जीने लगता है। फिर उसे सच नहीं चाहिए होता। उसे वही सच लगता है जो बचपन से उसके भीतर बोया गया है।
यही सबसे बड़ा दुख है।
अगर किसी ने गलतियाँ की हैं तो उनका विरोध होना चाहिए। अन्याय का प्रतिकार होना चाहिए। लेकिन किसी मनुष्य की हर पहचान को मिटाकर उसे केवल घृणा का पात्र बना देना भी किसी परिवार की हार है। इससे किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरी पीढ़ी का नुकसान होता है।
बीज का स्वभाव है कि वह फैलता है। प्रेम का बीज बोया जाए तो उसका वृक्ष भी प्रेम देता है। घृणा का बीज बोया जाए तो उसका वृक्ष किसी को छाया नहीं देता। वह खुद भी भीतर से सूखता रहता है और दूसरों को भी शांति नहीं देता।
आज मुझे लगता है कि हम अपने बच्चों को सबसे ज्यादा विरासत जमीन या पैसा नहीं देते। हम उन्हें अपनी भाषा देते हैं। अपने फैसले देते हैं। अपने डर देते हैं। अपने प्रेम और अपनी नफरत भी दे देते हैं। वे फिर उसी विरासत को अपना सच मानकर आगे बढ़ते हैं।
संवेदना कमजोरी नहीं है। संवेदना मनुष्य होने की सबसे बड़ी पहचान है। उसका मजाक उड़ाया जा सकता है लेकिन उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
आज उन तीन संदेशों को पढ़ते हुए मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। केवल दुख हुआ। इसलिए नहीं कि किसी ने मेरे बारे में क्या कहा। इसलिए कि मैंने एक और मन को घृणा के बोझ तले दबा हुआ देखा। और घृणा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि वह जिस व्यक्ति के लिए पैदा की जाती है, उससे पहले उसी मन को जला देती है जिसमें उसे पाला जाता है।
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