स्त्रियाँ: आवाज़ों के बीच एक स्त्री-संसार
स्त्रियाँ: आवाज़ों के बीच एक स्त्री-संसार
किसी पुस्तक को पढ़ना कई बार उसके भीतर प्रवेश करने से पहले ही शुरू हो जाता है। आवरण, फ्लैप पर दी गई जानकारी, लेखक और अनुवादक का परिचय पाठक के मन में पुस्तक की पहली छवि बनाते हैं। ‘स्त्रियां’ काव्य-संग्रह के साथ मेरा अनुभव कुछ ऐसा ही रहा।
पुस्तक के फ्लैप पर प्रो. गायत्रीबाला पंडा का परिचय दिया गया है। वे ओड़िया की प्रमुख कवयित्री, उपन्यासकार, कथाकार और निबंधकार हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। इस पुस्तक का हिंदी रूपांतरण राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने किया है। मूल रचना ओड़िया में है। इसलिए हिंदी में इसे पढ़ते हुए भाषा के साथ उस सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ को भी महसूस किया, जिसमें ये कविताएँ जन्मी हैं।
किताब के शीर्षक पर आते ही मैं ‘स्त्रियां’ शब्द पर ठिठक जाती हूँ।
स्त्रियां!अर्थात एक स्त्री नहीं। किसी एक भूगोल की स्त्री नहीं। किसी एक जाति, वर्ग, भाषा, संस्कृति या समय की स्त्री नहीं। फिर ये स्त्रियां कौन हैं?
संसार भर की सारी स्त्रियां?
स्त्रियों के रंग रूप पर जलवायु और भूगोल का असर है। उनके शरीर अलग हैं। उनकी भाषाएँ अलग हैं। उनके सामाजिक अनुभव अलग हैं। उनके भीतर का संसार भी अलग है। अलग-अलग परिस्थितियों में रहते हुए उन्होंने पुरुषों और पुरुषों द्वारा बनाई गई दुनिया से अपने-अपने ढंग से मुठभेड़ की है। किसी ने प्रतिरोध किया होगा। किसी ने समझौता किया होगा। किसी ने रास्ता बदला होगा तो किसी ने उसी व्यवस्था के भीतर अपने लिए जगह बनाई होगी।
फिर भी कविता का शीर्षक उन्हें एक ही शब्द में बाँध देता है।
‘स्त्रियां’
इस संग्रह की भूमिका वरिष्ठ कवयित्री अनामिका जी ने लिखी है। उनकी भूमिका का शीर्षक है ‘स्त्रियों की सामूहिक इयत्ता, कविता की अमृता शेरगिल’। यह शीर्षक अपने आप में संग्रह को देखने की एक अलग दृष्टि देता है। अनामिका जी लिखती हैं कि गायत्री की कविताओं से गुजरना “एक ऐसी जीवंत चित्रवीथी से गुजरना है जो किसी आर्ट गैलरी में समाएगी नहीं।” वे राजा रवि वर्मा के चित्रों का संदर्भ लेते हुए बताती हैं कि जिस तरह उनके चित्रों की प्रतीक शरद नायिकाएँ किसी एक चौखट में नहीं समा सकतीं, उसी तरह गायत्री की कविताओं में उपस्थित स्त्रियां भी किसी एक परिभाषा या स्थिर छवि में नहीं बंधतीं।
अनामिका जी की भूमिका पढ़ते हुए लगता है कि वे कविताओं को बाहर से नहीं देखतीं। वे उनके भीतर प्रवेश करती हैं और वहाँ मौजूद स्त्रियों, उनके अनुभवों और उनकी दुनिया से संवाद करती हैं। अनेक कविताओं को उद्धृत करते हुए वे अपनी बात रखती हैं। इस तरह उनके शब्दों के साथ-साथ कविताओं की अपनी आवाज़ भी सुनाई देती रहती है। उनकी दृष्टि में स्त्री का संसार केवल दुख, शोषण और प्रतिरोध तक सीमित नहीं है। उसमें स्मृतियाँ हैं। आकांक्षाएँ हैं। रिश्ते हैं। देह है। श्रम है। सौंदर्य है। जीवन को अपनी शर्तों पर समझने और जीने की एक बेचैन कोशिश भी है।
उनकी भूमिका पढ़ते हुए ‘स्त्रियां’ शीर्षक का अर्थ कुछ और खुलता है। अलग-अलग स्त्रियों की अलग-अलग छवियों के बीच एक ऐसा साझा अनुभव दिखाई देता है जो उन्हें जोड़ता है। फिर भी वह उनकी अलग पहचान को मिटाता नहीं। शायद यही इस शीर्षक की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
अनामिका जी ने अनुवादक राजेंद्र प्रसाद मिश्र के लिए भी बहुत सुंदर बात कही है। कविताएँ पढ़ने के बाद उनके मन में अनुवादक के प्रति जो सहज कृतज्ञता पैदा होती है, वह इस अनुवाद की आत्मीयता को समझने का एक सुंदर रास्ता देती है। वे लिखती हैं, “कविताएँ पढ़ने के बाद अनुवादक का आभार व्यक्त करने का सहज ही मन हुआ। हर कविता का अनुवाद इतना सहज और उच्छल जैसे कि गाँव के किसी झुटपुटे में घर लौटती दीदी।”
‘सहज और उच्छल’ शब्द इस अनुवाद की प्रकृति को बहुत खूबसूरती से सामने लाते हैं। ओड़िया से हिंदी में आते हुए कविताएँ अपनी सांस्कृतिक संवेदना और आत्मीयता को बनाए रखती हैं। भाषा कहीं बोझिल नहीं होती। वह पाठक तक सहज गति से पहुँचती है। गाँव के झुटपुटे में घर लौटती दीदी की उपमा में अनुवाद की सहजता के साथ अपनापन भी है।
इस संग्रह की दूसरी भूमिका कवि जितेंद्र श्रीवास्तव ने लिखी है। वे संग्रह की 108 कविताओं में स्त्री जीवन की वास्तविक स्थितियों को रेखांकित करते हैं। उनके अनुसार इन कविताओं में परिवार के प्रति आस्था के साथ उसी परिवार में मौजूद स्त्री शोषण और असमानता की पहचान भी है। घर की चिंता यहाँ स्त्री के जीवन और उसकी पहचान की चिंता से जुड़ जाती है। कविताएँ विसंगतियों से अलग होकर किसी दूसरी दुनिया की तलाश नहीं करतीं। वे उन्हीं के बीच जीवन के अर्थ और संगति को खोजती हैं।
अनामिका जी और जितेंद्र श्रीवास्तव की भूमिकाएँ इस संग्रह को देखने के लिए दो अलग दृष्टियाँ देती हैं। एक ओर कविताओं में मौजूद स्त्री जीवन की बहुरंगी और जीवंत दुनिया है। दूसरी ओर उस दुनिया के भीतर मौजूद असमानताओं और अंतर्विरोधों की पहचान है। इन दोनों के बीच गायत्रीबाला पंडा की कविताएँ अपना संसार रचती हैं। यहाँ स्त्री केवल दिखाई नहीं देती। वह बोलती है। कभी धीमे स्वर में। कभी किसी दबे हुए सवाल की तरह। कभी अपने अनुभव को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखते हुए। उसकी आवाज़ कई दूसरी आवाज़ों से मिलती है और फिर भी अपनी अलग पहचान बनाए रखती है। शायद इसी वजह से ‘स्त्रियां’ को पढ़ना केवल स्त्रियों के बारे में पढ़ना नहीं है। यह उन आवाज़ों के बीच से गुजरना है जहाँ एक स्त्री-संसार धीरे-धीरे हमारे सामने खुलता है।
कवयित्री स्वयं भी किसी निश्चित ‘वाद’ के आग्रह से कविता लिखने की बात नहीं करतीं। उन्होंने अपनी बात में कहा है कि उनके लिए स्त्री का हर्ष, विषाद, यंत्रणा और दुर्दशा जीवन के अनुभवों से कविता में आए हैं। स्त्री के अपमान, अत्याचार और उत्पीड़न से उपजा दुख, क्षोभ और क्रोध भी उनकी कविता का हिस्सा बना है। वे यह भी स्वीकार करती हैं कि आज तक वे स्वयं यह पूरी तरह तय नहीं कर पाई हैं कि ‘नारीवाद’ का स्वरूप क्या है। इसी बिंदु पर ‘स्त्रियां’ को पढ़ने का एक अलग रास्ता खुलता है। यह संग्रह स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं देखता। उसके संबंध, इच्छाएँ, विवेक, अस्मिता और संघर्ष भी उसके अनुभव का हिस्सा हैं। इसलिए मेरे लिए सवाल केवल यह नहीं है कि कविता स्त्री के बारे में क्या कहती है। असली सवाल यह है कि वह ‘स्त्रियों’ को किस तरह देखती है। क्या वह उनकी भिन्नताओं के भीतर कोई साझी जमीन तलाशती है या स्त्री होने के एक सामूहिक अनुभव में उनकी अलग-अलग अस्मिताओं को समेट देती है?
बलात्कार जैसी त्रासदी झेलती स्त्री के लिए यहाँ कवयित्री का मन द्रवित होता है। वे इस अनुभव को केवल एक घटना की तरह नहीं देखतीं, बल्कि उसके भीतर घटती हुई अनेक मौतों को पहचानती हैं। कविता के आरंभ में सामूहिक बलात्कार, दहेज, यातना और गर्भपात जैसी स्थितियों का उल्लेख करते हुए कवयित्री उस स्त्री की ओर देखती हैं जो मृत्यु से लगातार जूझ रही है। ऐसी स्त्री के लिए मृत्यु एक बार नहीं आती। वह बार-बार टूटती है और हर बार उसके पार जाकर खड़ी होती है। इसी अर्थ में "मर न सकी एक औरत" का बिंब बहुत मार्मिक है। वह अपने जख्मीपन की चिता से "हजार-हजार बार" उठती है। उस चिता में केवल शरीर की पीड़ा नहीं जलती, बल्कि लज्जा, अपमान और उस सामाजिक व्यवस्था की आग भी है जिसने उसके साथ घटे अपराध का बोझ भी उसी पर डाल दिया है। आगे उसका क्रोध और जीवित रहने की जिद इसी पीड़ा से निकलती दिखाई देती है। यहाँ करुणा स्त्री को कमजोर बनाने वाली करुणा नहीं है। वह उसके भीतर बची हुई जीवन शक्ति को पहचानने वाली करुणा है।
‘पाँचाली’ में द्रौपदी के मिथकीय चरित्र को कवयित्री एक नए स्त्री अनुभव से देखती हैं। पाँच पांडवों की पत्नी बनी द्रौपदी के संदर्भ में सबसे तीखा प्रश्न उसके अपने व्यक्तित्व का है। उसे बाँट लेने का आदेश आया और उसे बिना दुविधा स्वीकार कर लिया गया। यहाँ ‘बाँटना’ केवल पाँच पतियों के बीच संबंध का विभाजन नहीं रह जाता। कवयित्री इस बिंब को आगे बढ़ाकर पूछती हैं कि एक स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध बाँटते और भोगते जाने की प्रक्रिया आखिर कहाँ जाकर समाप्त होती है। पाँच हिस्से पाँच हजार हिस्सों में बदल जाते हैं। स्त्री का शरीर और अस्तित्व उसकी अपनी इच्छा से अलग कर दिया जाता है। "कभी नीले रंग से थी प्रबल आसक्ति मुझमें" जैसी पंक्ति इस पीड़ा के बीच द्रौपदी के निजी व्यक्तित्व की ओर लौटाती है। युद्ध, अस्त्र-शस्त्र, राजप्रतिष्ठा और ईश्वर से सामना करने वाली उस दुनिया में उसकी अपनी पसंद कहाँ थी? कविता इसी अनुपस्थिति को सामने लाती है। महाभारत की परिचित कथा में जिसे हम पाँचाली के रूप में जानते हैं, उसके भीतर मौजूद उस स्त्री को कविता खोजती है जिसकी इच्छाओं पर किसी ने प्रश्न नहीं किया। इस तरह मिथक अतीत की कथा भर नहीं रहता, वह वर्तमान स्त्री के अनुभव से जुड़ जाता है।
‘प्रतिमा’ में स्त्री का अनुभव किसी एक घटना या पहचान तक सीमित नहीं रहता। भीतर जमा चोट और उससे पैदा हुई जड़ता कविता के आरंभ से ही दिखाई देती है। सुबह की चाय का ठंडा होना और धमनियों में रक्त का बर्फ बनना उस मानसिक स्थिति को सामने लाते हैं जिसमें स्त्री अपने भीतर के बवंडर और अपने ही बिखरे हुए अंशों से सामना करती है। लेकिन वह केवल पीड़ा से बनी आकृति नहीं है। उसने मनुष्य को उल्लास से लेकर उद्वेग तक, अहंकार से आतंक तक और उत्थान से पतन तक देखा है। इसलिए उसका अनुभव निजी होकर भी मनुष्य के व्यापक स्वभाव तक पहुँचता है। वह केवल देखी जाने वाली वस्तु नहीं, देखने और समझने वाली चेतना भी है।
‘महिला दिवस’ कविता में स्त्री अधिकार की बात एक बुनियादी मानवीय जरूरत से जुड़ जाती है। "हाँ, मैं फिर उसी हक की बात करूँगी / देह है तो सुरक्षा माँगूँगी / मन है तो स्वतंत्रता चाहूँगी।" इन पंक्तियों में देह की सुरक्षा और मन की स्वतंत्रता को स्त्री के मूल अधिकार के रूप में रखा गया है। कविता में हिंसा, अपमान और बलात्कार जैसी स्थितियाँ आती हैं, लेकिन उन्हें पढ़ते हुए मुझे लगा कि बलात्कार शब्द से अधिक स्वयं कवयित्री आहत हैं। वह घटना को केवल दर्ज नहीं करतीं, उसके भीतर छिपी उस पीड़ा को भी महसूस करती हैं जो स्त्री के शरीर के साथ उसके मन को भी घायल करती है। महिला दिवस के अवसर पर भी वह उत्सव की भाषा के बजाय सुरक्षा और स्वतंत्रता की बात करती हैं। यही कविता को एक व्यापक मानवीय प्रश्न से जोड़ता है।
‘एड़ी के पास न सूखते घाव’ में एक छोटे से शारीरिक घाव के सहारे स्त्री जीवन की लंबी पीड़ा सामने आती है। एड़ी पर शरीर का भार पड़ता है और वह लगातार जमीन के संपर्क में रहती है। इसलिए वहाँ का न सूखता घाव उस जीवन का संकेत बन जाता है जिसमें चोटें मिलती रही हैं, लेकिन उन्हें भरने का अवसर नहीं मिला। घाव का न सूखना अभाव, श्रम, उपेक्षा और लगातार चलती पीड़ा की ओर भी संकेत करता है। इसी संदर्भ में सूरज का बिंब अर्थपूर्ण हो जाता है। वह "तितली के मुड़े हुए पंखों", "पहाड़ की गुफाओं", "जमुनाबाई के जूड़े" और "एड़ी के पास के न सूखते घाव" से भी उगता है। जहाँ जीवन घायल है, वहीं से प्रकाश और प्रतिरोध की संभावना भी पैदा होती है।
इसी जगह कविता का ‘सूरज’ वाला बिंब बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है। कवयित्री कहती हैं कि सूरज केवल आकाश में नहीं उगता। वह "तितली के मुड़े हुए पंखों", "पहाड़ की गुफाओं", "जमुनाबाई के जूड़े" और "एड़ी के पास के न सूखते घाव" से भी उग सकता है। जहाँ जीवन सबसे अधिक घायल है, वहीं से प्रकाश और प्रतिरोध भी जन्म ले सकता है। ‘पहनावा’ बाहरी रूप और भीतर के जीवन के बीच की दूरी को सामने लाती है। "पहनावे से अंदाज़ा मत लगाओ मेरे दिल का" केवल वस्त्रों की बात नहीं है। पहनावा उस बाहरी छवि का भी संकेत है जिसके आधार पर समाज किसी स्त्री के बारे में धारणा बना लेता है। वह मंच पर कविता पढ़ती है, मंदिर जाती है, अपनी सामाजिक भूमिका निभाती है, लेकिन उसके भीतर का दुख दूसरों की नजर से बाहर रहता है। आँख के कोर में ठहर जाने वाली बूँद और पकते हुए जामुन का बिंब इस अनकहे दुख और भीतर की बेचैनी को सामने लाते हैं।
‘झूठ का रंग हरा’ में हरे रंग का अर्थ माँ की स्मृति के साथ बदलता है। बचपन में हरा रंग सत्य, जीवन और संभावना का रंग था। माँ कहती थी कि सत्य का रंग भी हरा होता है। कविता में यह सत्य पिछली पंक्ति में खड़ी उस बच्ची में दिखाई देता है जिसकी नाक बह रही है और जिसके सिर पर लाल रिबन बँधा है। माँ के जाने के बाद वही हरा रंग झूठ का रंग बन जाता है। "इस सृष्टि में सिर्फ झूठ का रंग हरा है।" माँ की मृत्यु के बाद बेटी के लिए दुनिया को पहचानने का तरीका भी बदल जाता है। जिस रंग को माँ ने सत्य की तरह सौंपा था, जीवन ने उसी में छल का अर्थ भर दिया। ‘सात औरतें’ में स्त्री के सात अलग जीवन सामने आते हैं। किसी के जीवन में विवाह और मातृत्व है, किसी के हिस्से घरेलू श्रम और गायब हो जाने की त्रासदी है, तो कोई अपनी तरह जीने की कोशिश करती है। इन स्त्रियों को एक साँचे में नहीं ढाला गया है। उनकी अपनी परिस्थितियाँ और अपने संघर्ष हैं। शीर्षक भी इसी विविधता की ओर संकेत करता है। स्त्री एक नहीं है, उसके अनुभव अनेक हैं।
‘औरत’ में यही अलग-अलग जीवन एक ऐसी सामाजिक छवि में बदलते दिखाई देते हैं जिसे समाज अपनी सुविधा से सुंदर बना लेता है। परत-दर-परत पापों को रंगकर उन्हें पुण्य का रूप दिया जाता है और टूटी हुई जिंदगी से एक सुंदर तस्वीर बना दी जाती है। लोग उस तस्वीर की तारीफ करते हैं, लेकिन उसमें जीवित औरत की इच्छाएँ, अनिच्छाएँ और सपने दिखाई नहीं देते। इसके बाद ‘देवी’ पढ़ते हुए यह सवाल और गहरा होता है। स्त्री को त्याग, सहनशीलता, पवित्रता और ममता के आदर्शों से जोड़कर देवी बना दिया जाता है। उसे सम्मान तो मिलता है, लेकिन उसके मनुष्य होने की जगह धीरे-धीरे कम होती जाती है। कवयित्री जब देवी के सामने खड़ी होती हैं तो इस आदर्श के भीतर छिपी पीड़ा और खामोशी उन्हें दिखाई देती है। देवी के विराट रूप के पीछे उन्हें स्त्री के लंबे इतिहास का दुख दिखाई देता है। इन तीनों कविताओं को साथ पढ़ने पर संग्रह का एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। स्त्री को उसके अपने जीवन और अनुभवों के साथ एक मनुष्य के रूप में देखने के बजाय समाज उसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार छवियाँ गढ़ता है। कभी वह छवि सुंदर और आदर्श स्त्री की होती है। कभी उसे देवी बना दिया जाता है। दोनों ही स्थितियों में उसकी अपनी इच्छा, उसकी आवाज और उसकी मनुष्यता पीछे छूट सकती है। इसलिए ‘स्त्रियां’ को केवल स्त्री-विमर्श की कविताओं के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यहाँ सवाल स्त्री की मनुष्यता का भी है। वह पीड़िता, माँ, पत्नी या देवी होने से पहले एक मनुष्य है। उसके पास अपनी इच्छा है। अपनी आवाज है। अपने निर्णय लेने का अधिकार है। इस संग्रह की कविताएँ बार-बार इसी अधिकार की ओर लौटती हैं। वे उस जगह पर सवाल उठाती हैं जहाँ स्त्री को सम्मान तो दिया जाता है, लेकिन उसे अपने ढंग से जीने की पूरी स्वतंत्रता देने में समाज हिचकता है।
स्त्रियाँ काव्य संग्रह को जितेंद्र पात्रो ने भी बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। पुस्तक अच्छी तरह छपी है और कहीं वर्तनी या मुद्रण की त्रुटियाँ दिखाई नहीं देतीं। प्रकाशन की यह सजगता भी पुस्तक के आकर्षण को बढ़ाती है।
पुस्तक: ‘स्त्रियां’
कवयित्री: गायत्रीबाला पंडा
अनुवादक: राजेंद्र प्रसाद मिश्र
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
मूल्य: ₹499
समीक्षा: कल्पना मनोरमा
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