पेंच कटने के बाद

         पेंच कटने के बाद

यूँ तो झाड़ियों में अटकना बिल्कुल ठीक नहीं, लेकिन जब कोई तुम्हें अचानक छोड़ ही दे, पेंच काट ही दे, तो तुम पतंग बन जाना। आसमान न सही, किसी झाड़ी पर टिक जाना। कोई न कोई तुम्हें उतार लेगा, जीत की खुशी के साथ।

पतंग का झाड़ी या पेड़ की शाख पर अटक जाना सामान्यतः एक दुर्घटना माना जाता है। वह अब आकाश में नहीं है। उसकी डोर टूट चुकी है। उसकी दिशा और गति दोनों छिन चुकी हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वह पूरी तरह नष्ट भी नहीं हुई है। वह अब भी मौजूद है, किसी शाख पर, किसी उलझन के बीच, किसी अनिश्चित प्रतीक्षा में। शायद जीवन के कुछ अनुभव भी ऐसे ही होते हैं। वे हमें यह समझाते हैं कि हर टूटन का अर्थ अंत नहीं होता।

जीवन में ऐसे दिन भी आते हैं जब लगता है कि अब कुछ नहीं बचा। जो अपना था, वह छूट गया। जिस रास्ते पर चल रहे थे, वह बंद हो गया। जिन लोगों पर भरोसा था, वे साथ नहीं रहे। ऐसे समय में मनुष्य को किसी बड़ी जीत की नहीं, अपितु इतना भर जान लेने की आवश्यकता होती है कि इतना सब घट जाने के बाद भी उसका जीवन बचा हुआ है।

हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ सफलता दिखाई देती है और संघर्ष अक्सर अदृश्य बना रहता है। उपलब्धियों का उत्सव मनाया जाता है, किंतु टूटन, असफलता और विषाद को प्रायः निजी दुर्बलता मान लिया जाता है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य अपने कठिन समय में स्वयं को अकेला समझने लगता है। जबकि सच यह है कि जीवन का कोई भी गंभीर बोध बिना संघर्ष के नहीं आता। परिपक्वता, धैर्य और आत्मबोध का जन्म प्रायः उन्हीं परिस्थितियों में होता है जहाँ हमारे बनाए हुए विश्वास और सहारे टूटते हैं।

पतंग का पेंच कटना इसी सत्य की ओर संकेत करता है। जब तक पतंग उड़ रही होती है, उसकी ऊँचाई दिखाई देती है। लोग उसकी ओर देखते हैं, उसकी उड़ान की प्रशंसा करते हैं। लेकिन जैसे ही डोर छूटती है, वही पतंग अचानक महत्वहीन प्रतीत होने लगती है। किसी के मांझे की शान थी, अब नहीं। मनुष्य के जीवन में भी कई बार ऐसा ही होता है। पद, प्रतिष्ठा, संबंध और सफलता हमारे परिचय का हिस्सा बन जाते हैं। हम स्वयं को इन्हीं के माध्यम से पहचानने लगते हैं। लेकिन एक बीमारी, एक असफलता, एक बिछोह या कोई अप्रत्याशित परिवर्तन हमें यह एहसास करा सकता है कि जीवन का आधार इन सबसे कहीं अधिक गहरा है।

यहीं से आत्मचिंतन आरंभ होता है और टूटने के बाद फिर से जुड़ने की संभावना जन्म लेती है। जब जीवन की पुरानी निश्चितताएँ टूटती हैं, तब नए प्रश्न सामने आते हैं। हर प्रश्न का उत्तर तुरंत नहीं मिलता, लेकिन कोई भी सच्चा प्रश्न मनुष्य को उसके भीतर तक ले जाता है। भारतीय चिंतन ने इस अवस्था को महत्व दिया है। गीता का आरंभ भी विजय के उल्लास से नहीं, अर्जुन के विषाद से होता है। मानो जीवन कहना चाहता हो कि असमंजस भी एक अवस्था है और प्रश्न भी एक यात्रा हैं। मनुष्य केवल उत्तरों से नहीं, कई बार अपने प्रश्नों के साथ जीते हुए भी विकसित होता है।

लेकिन जीवन केवल विचारों के सहारे नहीं कटता। मनुष्य संबंधों में जीने वाला प्राणी है। कठिन समय में उसे किसी न किसी की आवश्यकता होती है। कभी किसी मित्र के विश्वास की, कभी परिवार के धैर्य की, कभी किसी पुस्तक के विचार की, तो कभी किसी अजनबी की करुणा की। झाड़ी में अटकी पतंग का रूपक यहीं और गहरा हो जाता है। वह स्वयं को नहीं उतारती। कोई उसे कटी हुई समझकर छोड़ जाता है और कोई उसे अपनी छोटी-सी जीत की तरह उतार लेता है। जीवन में भी ऐसा ही होता है। जिन्हें हम अपने सबसे अकेले क्षण समझते हैं, वे कई बार किसी अनदेखे सहारे से ही पार हो पाते हैं। यह निर्भरता नहीं, मनुष्य होने की स्वाभाविक स्वीकृति है।

अंततः जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी ऊँचाई तक पहुँचे। ऊँचाइयाँ परिस्थितियों और समय के साथ बदलती रहती हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब जीवन ने हमारी डोर छीन ली, तब हमने अपने भीतर क्या बचाए रखा। क्या हमने विश्वास बचाए रखा? क्या हमने संवेदना बचाए रखी? क्या हमने अपने भीतर जीवन के लिए जगह बचाए रखी?

कटी हुई पतंग की सबसे बड़ी उपलब्धि फिर से आसमान में लौटना नहीं है। उसकी उपलब्धि यह है कि वह गिरकर भी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई। उसने अपने अस्तित्व को तब तक बचाए रखा, जब तक किसी ने उसे उतार नहीं लिया। और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वह कई मौसमों तक किसी शाख पर, किसी झाड़ी में, किसी अनदेखे कोने में अटकी रहती है। तब उसकी उड़ान भले समाप्त हो चुकी हो, उसका होना नहीं। शायद मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी यही है—टूट जाने के बाद भी अपने भीतर जीवन के लिए थोड़ी-सी जगह बचाए रखना। क्योंकि हर कटी हुई पतंग को तुरंत उतार लिया जाए, यह आवश्यक नहीं; लेकिन उसका बने रहना इस बात का संकेत है कि जीवन ने अभी उसके साथ अपना संवाद पूरा नहीं किया है।

                  लेखिका: कल्पना मनोरमा 





Comments

  1. वाह कितनी गहरी बात 🌹🌹 शानदार आलेख मित्र।

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