बुराई का पूर्ण कद
बुराई का पूर्ण कद
बुरे लोगों के साथ बुरा होने में इतनी देर क्यों लगती है?
यह प्रश्न लगभग हर मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठता है। क्योंकि हम देखते हैं कि छल करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, झूठ बोलने वाले सम्मान पा रहे हैं और दूसरों को पीड़ा देने वाले बिना किसी दंड के सुख से जी रहे हैं। ऐसे में न्याय और नैतिकता के बारे में हमारी सहज धारणाएँ डगमगाने लगती हैं। मन पूछता है, यदि बुराई का अंत निश्चित है, तो उसमें इतनी देर क्यों लगती है?
शायद इसका उत्तर बुराई की प्रकृति में ही छिपा है।
बहुत विचार करने के बाद कहना चाहती हूँ कि बुराई तब तक भस्म नहीं होती, जब तक वह अपने पूर्ण कद को प्राप्त नहीं कर लेती। वह अपने छोटे रूप में समाप्त नहीं होती। संसार की संरचना का यह एक विचित्र सत्य है। यहाँ जन्म और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं। विस्तार की आकांक्षा भी एक स्वभाव है। जिस तरह अच्छाई जन्म लेती है, उसी तरह बुराई भी जन्म लेती है, फैलती है, अपने नए-नए रूप गढ़ती है और धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचती है जहाँ उसके लिए स्वयं को छिपाए रखना संभव नहीं रह जाता। वहीं से उसके अवसान की शुरुआत होती है।
हमारे मिथकों में यह अनुभव बार-बार दिखाई देता है। रावण और कंस का अंत उनके पहले अपराध के साथ नहीं हुआ। उन्हें अपनी शक्ति, अपने अहंकार और अपने अधर्म के चरम तक पहुँचने का भरपूर अवसर मिला था। उनकी वास्तविकता जितनी स्पष्ट होती गई, उनके विरुद्ध खड़ी होने वाली शक्ति भी उतनी ही स्पष्ट होती चली गई।
संभव है कि इसी अनुभव ने मनुष्य को पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं की ओर प्रेरित किया हो। जैसा कि कह चुकी हूँ कि हर जन्मने वाले की प्रवृत्ति अपने पूर्ण विस्तार की आकांक्षा रखती है। तो जो बुराई एक जीवन में अपनी समूची संभावना तक नहीं पहुँच पाती, वह फिर मनुष्य के साथ जन्म लेती रहती है। यह कोई धार्मिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि मनुष्य और इतिहास के अनुभवों से उपजा एक प्रश्न है।
पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग ने मनुष्य के भीतर मौजूद अंधेरे पक्ष को "छाया" कहा था। उनका मानना था कि जिन प्रवृत्तियों को हम पहचानने से इंकार करते हैं, वे समाप्त नहीं होतीं। वे भीतर सक्रिय बनी रहती हैं और अवसर मिलने पर सामने आ जाती हैं। युंग का यह विचार बताता है कि अंधकार से मुक्ति का पहला कदम उसे देख पाना है। उसी तरह दार्शनिक हेगेल का मानना था कि हर शक्ति अपने भीतर अपने विरोध के बीज लेकर चलती है। जब कोई व्यवस्था अपने चरम पर पहुँचती है, तब उसके भीतर ही उसके प्रतिरोध की संभावना जन्म लेने लगती है। इतिहास में अनेक बार अत्याचार ने स्वयं अपने विरुद्ध खड़ी होने वाली चेतना को जन्म दिया है।
इसी कारण न्याय तुरंत दिखाई नहीं देता। हम जिस क्षण अन्याय को देखते हैं, उस क्षण उसकी पूरी कहानी नहीं देख रहे होते। कई बार बुराई अपने विस्तार की प्रक्रिया में होती है। वह अपने सारे आवरण उतार रही होती है और अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर रही होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें अन्याय के सामने मौन रहना चाहिए। इसका अर्थ केवल इतना है कि उसके अस्थायी वैभव से भ्रमित नहीं होना चाहिए। जो शक्ति दूसरों को कुचलकर खड़ी होती है, वह अपने भीतर ही अपने पतन का कारण भी लिए रहती है।
राम का प्राकट्य भी शायद इसी अर्थ में समझा जाना चाहिए। मैं यहाँ पर राम को केवल एक धार्मिक पात्र की तरह नहीं देख पाती, बल्कि "राम" मनुष्य के भीतर जागने वाली वह चेतना हैं जो असत्य को पहचान लेती है और उसके सामने खड़े होने का साहस जुटाती है। यह चेतना तब जन्म लेती है जब बुराई अपने सारे आवरण खो देती है और स्वयं को पूरी तरह प्रकट कर देती है।
इसलिए यदि कभी जीवन में बुराई बहुत शक्तिशाली दिखाई दे, तो यह याद रखना चाहिए कि कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। संभव है कि वह अपने पूर्ण कद की ओर बढ़ रही हो। और संभव है कि उसी प्रक्रिया में कहीं किसी दूसरे मनुष्य के भीतर प्रतिरोध, विवेक और साहस भी आकार ले रहे हों, जो उसे ठिकाने लगाने का कारक बनें।
बुराई का सबसे बड़ा भ्रम उसकी शक्ति नहीं, उसका यह विश्वास है कि वह स्थायी है। जबकि सच यह है कि उसका पूर्ण कद ही उसकी सीमा है।
2025 की विजयादशमी को लिखा गया एक विचार, आज एक लेख के रूप में पूर्ण हुआ।
लेखिका: कल्पना मनोरमा
बहुत बेहतरीन तरीके से व्याख्या किया है आपने...
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