सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास (शैक्षिक दख़ल के ताज़ा अंक में)


                सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास             

मनुष्य का जीवन अपने प्रारंभिक अबोध अनुभवों से ही आकार लेना आरम्भ कर देता है। जिस परिवेश में मनुष्य जन्म लेता है, जिन लोगों की आँखों के सहारे से दुनिया को पहली बार देखता है, और जिस संस्कृति में बोलना, देखना, महसूस करना और अभिव्यक्त करना सीखता है, वही सब मिलकर उसकी प्रौढ़ दृष्टि और समझ का आधार बनती हैं। मेरे अनुभव का संसार का आधार, वह परिवेश रहा जो एक गाँव का आँगन था, उत्तर प्रदेश के औरैया तहसील, जिला इटावा का एक छोटा सा गाँव अटा। जितना बाहर से यह गाँव अन्य गाँवों जैसा ही सरल, स्वच्छ और सुसंस्कृत दिखता रहा, उतना ही भीतर से विरोधाभासों, सीमाओं, भावुकता, विरोध और अवरोधों से भरा हुआ था। इस में प्राथमिक पाठशाला तो थी, पर अस्पताल, पंचायत भवन या पुस्तकालय जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। फिर भी यह गाँव समृद्ध किसानों और व्यवसायियों का गांव बना रहा। अन्य जरूरतों के लिए तीन से चार किलो मीटर की दूरी तय कर अपने सुख सुविधाओं का जुटान करता गाँव अपने आसपास किसानों की जमीनें और अपने दिल में हद भर आम के बागान लिए खुशहाल ही दिखता। गाँव में बहुत से परिवारों के बच्चे अब पढ़-लिखकर बाहर निकल चुके हैं। पलायनवादिता ने इसे भी नहीं बख्शा। खैर!

 

मेरा घर गाँव के बिल्कुल बाहर लिंक रोड से जुड़ा है। आम के बागान से घिरा हुआ। शहरी भाषा में इसे ‘फार्महाउस टाइप’ घर कहा जा सकता है। घर भले ही गाँव में रहा लेकिन घर के भीतर का वातावरण माँ की वजह से नगरीय संस्कारों, शिक्षा के महत्व और मानसिक जागरूकता से लकदक रहा। जबकि घर में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ नियमित नहीं आती थीं, पर माँ ने उपलब्ध सीमित संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया। घर में कल्याण और सोवियत संघ की पत्रिका के साथ भारतीय ग्रन्थ सुखसागर, गीता, वाल्मीकि रामायण, वशिष्ठ गीता, और स्त्री शिक्षा से संबंधित कई किताबें मौजूद थीं। कभी कभी अपने भाई रामविनोद त्रिपाठी मामा के पढ़े उपन्यास और कथा संग्रह भी मां जब मायके जाती तो ले आतीं।


बरसात के दिनों में जब खेतों में काम कम होता, तो गाँव के लोग अक्सर हमारे घर के अहाते में जुट जाते थे। महिलाओं की टोली में माँ विभिन्न ग्रंथ किताबें पढ़तीं सुनाती और पुरुषों की टोली में पिता या उनके चाहने वाले लोग बैठकर पढ़ते और सुनते थे। यहां से मुझ में ज्ञान की निर्मित शुरू होती हुई मानी जा सकती है। अच्छे-बुरे, मान-अपमान, धर्म-अधर्म जैसे गूढ़ जीवन-तत्वों की शिक्षा अबोधावस्था में ही ग्रहण कर ली थी, कह सकती हूँ। इसी बिना पर मैंने अपने घर का माहौल बेहद सजीव और जिज्ञासा से भरा ही देखा। हर किसी को अपने से आगे बढ़ने का चाव देखा। मां का भी मानना था कि घर केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि सीखने सीखाने का आत्मीय स्थान होता है। मां पिता के द्वारा निर्मित मुखरित वातावरण मेरी प्रारंभिक चेतना और सीखने की जिज्ञासा का आधार बना।


वैसे तो मेरी माँ भी उन्हीं स्त्रियों की भीड़ में थीं, जिनके पढ़े लिखे पिता ने कक्षा आठ तक की शिक्षा दिलाकर उन्हें ब्याह दिया था। मगर शिक्षा के प्रति मां का आग्रह ही, पहले अपने लिए फिर अपने बच्चों के लिए अहम बना। उन्होंने हम दोनों भाई बहन का लालन पालन करते हुए बीटीसी तक की अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्हीं के माध्यम से मैंने जाना कि शिक्षा केवल स्कूल और किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर अनुभव, हर बातचीत और हर एक निर्णय अनिर्णय में उतरती है। गाँव की सीमित सुविधाओं और दादी और पिता की परंपरागत सोच के बीच भी माँ ने हमें यह समझाया कि सीखने की ललक, जिज्ञासा और आत्मनिर्भरता किसी विशेष भवन, किसी संस्था या किसी सामाजिक अनुमति की मोहताज नहीं होती। यही कारण है कि मेरे प्रारंभिक अनुभव न केवल व्यक्तिगत शिक्षा के बीज बने, बल्कि उन्होंने यह भी सिखाया कि स्त्री शिक्षा का अर्थ केवल अक्षर-ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन की समझ, साहस और सामाजिक भागीदारी भी है। 

                लेखिका: कल्पना मनोरमा 

  मेरे पिता उद्यमी, स्वभाव के अनुशासन प्रिय सादे व्यक्ति हैं। जितने वे किसी के आगे खुलने में संकोची हैं, उतने ही सामाजिक मेलजोल में रुचि रखने वाले इंसान हैं। इस विरोधाभास को समझ समझकर भी कभी समझ नहीं पाई। वैसे तो उन्होंने बैठकर कभी हम भाई बहन को पढ़ाया लिखाया नहीं, लेकिन संस्कार देने के अवसर हमेशा उन्हें पूरे मिले। और ये भी कि मेरे माता पिता ने सिर्फ बोल-बोलकर हमें कुछ नहीं सिखाया, बल्कि कृत्य संस्कारों की कसौटी पर पहले खुद को कसा, फिर अपने क्रियान्वयन से हम तक उनका अबोला यथार्थ भी शिक्षा बनकर आता रहा। अच्छे संस्कार देने का प्रयास सुनकर, देखकर, महसूस कर ही प्राप्त किए जाते हैं, माँ से मैंने ये सीखा। मां से निरंतर कर्म और पिता से अनुशासन और कर्मठता से आगे बढ़ते रहने की शिक्षा मिली। साथ अपने खाने, पीने, परिधानों का चुनाव बढ़िया से बढ़िया रखना शौक नहीं, कर्तव्य की तरह होना चाहिए, सब पिता से सीखा। इस सबके बाद भी पिता अपनी माताजी यानी मेरी दादी की तरह परंपरावादी धार्मिक ख्यालों के व्यक्ति रहे। मगर मेरी माँ उन्नत विचारों वाली अन्वेषणशील, शोधात्मक बुद्धि की महिला थीं। उन्होंने हमें वही कहानियाँ नहीं सुनाईं जो परंपरा ने उन तक पहुंचाई या जो प्रचलित थीं— बल्कि उन्होंने आगे बढ़कर भारतीय इतिहास को खंगाला और हमारे लिए अरुंधति, वशिष्ठ, अपाला, घोषा, अनसूया और मदालसा जैसी विदुषी स्त्रियों की कहानियां उपलब्ध करवाई। प्रेमचंद, महादेवी, लक्ष्मीबाई, भगतसिंह आदि की बातें भी खूब खूब बताई। माँ द्वारा सुनाई गई कथाओं की स्त्री केवल घर संभालने वाली गृहणी भर नहीं थी। वह विदुषी थी, साहसी थी, और अपने निर्णयों में दृढ़ थी। हर परिस्थिति में वह अपने और अपने परिवार के हित के लिए निर्भीक निर्णय लेने में सक्षम थी। इन कथाओं ने यह स्पष्ट किया कि स्त्री की शक्ति केवल पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं होती, उसकी समझ, साहस और निर्णयक्षमता ही उसे वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान दिलाती हैं। यही संदेश मुझे बचपन से मिलता आया, और इसी ने मेरी सोच में स्त्री की भूमिका को नए दृष्टिकोण से देखने की क्षमता दी।  जबकि मेरी दादी जमींदार परिवार की बेटी थीं, पाँचवीं कक्षा तक वे भी पढ़ी थीं, पर विचारों में बेहद परंपरावादी स्त्री क्या! उनके लिए पितृसत्तात्मक व्यक्तित्व कहना उचित होगा। घर की सत्ता उनके ही हाथों में थी। वे भी निर्णय लेने में संकोची नहीं थीं। अपने अकेले बेटे को बीएससी में एडमिशन लेने के बाद, ये कहते हुए वापस बुला लिया, “हमारे घर खुद नौकर चाकर लगे हैं। अपनी पैतृक सम्पत्ति सम्हालो।” पिता सिर झुकाए लौट आए। ये बात मां को हमेशा खली क्योंकि मेरी माँ विचारों से उन्नत तो थीं ही, वे गांव में रहना नहीं चाहती थीं। एक सदमा से मां उबरी नहीं थीं कि उनकी नौकरी भी दादी अपने अकड़ में खा गईं। दादी का तर्क था—“हमारी बहू किसी की नौकरी करेगी, यह असंभव है।” यह वाक्य मेरे बचपन की स्मृति में गहराई से दर्ज हो गया था। वहीं से मैंने समझा कि पुरुष सत्ता केवल पुरुषों में ही नहीं, औरतों में भी होती है, जो परंपरागत ढांचे को बनाए रखने की अभिलाषी होती हैं।


माँ इसका विरोध नहीं कर पाईं क्योंकि पिता का वोट दादी के पक्ष में था। उन्होंने सास की इच्छा का सम्मान किया, पर भीतर से हार नहीं मानी। दिन भर घूँघट में रहकर घर-गृहस्थी के कार्य किए और रात में लालटेन जलाकर अपनी मन पसंद किताबें पढ़ीं। जब होश आया तो मुझे हमेशा आश्चर्य होता रहा कि एक ही स्त्री कैसे दिन में पारंपरिक बहू बनी रहती है और रात में आधुनिक स्त्री बन जाती है। शायद इसी से मैंने जाना कि स्त्रियों की जिजीविषा, भीतर से ज्वाला की तरह जले तो उसका जीवन सुनहरा होकर दहक भी सकता है। अपनी शिक्षा के बाबत अगर कहूं तो प्राथमिक शाला तक की पढ़ाई मैंने अपने गांव में ही की। मां की जिद न होती तो बाकी पढ़ाई होती ही नहीं। लेकिन मां ने अपने बड़े भाई घर भेज कर मेरी शिक्षा पूरी करवाई। बची खुची शादी के बाद तक मैं पढ़ती रही हूं।


माँ ने हमेशा सिखाया कि आँख, कान खुले रखो तो हर पल पर्यावरण से लेकर समाज, जीव जंतुओं से भी शिक्षा ली जा सकती है। उन्हें, मकड़ी और बिच्छू के जीवन चक्र पर रोते देखा तो छिपकली की पूँछ छोड़ देना, इल्ली से तितली बनना, उन्हें खास आश्चर्य में डाल देता था। वे हम भाई बहन को पल पल कहती रहतीं कि प्रकृति के हर एक उपादानों से जो सीखता है, वही इस अबूझ संसार की थोड़ी बहुत थाह ले भी सकता है। उन्होंने स्त्रियोचित कभी भी हम भाई-बहन को चुगली, सुनने और करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। ये एक अलग किस्म की शिक्षा थी, हम दोनों भाई बहन के लिए। जो आज तक काम आ रही है। गाँव में फ़िज़ूल में घूमने-टहलने या खेलकूद में हमारे निमित्त संतुलन बनाए रखना, हमेशा उन्हें आवश्यक लगता रहा था। उनका मानना था कि संगत से व्यक्ति के गुण और चरित्र का निर्माण होता है। यदि संगत सही नहीं, तो जीवन भी ध्वस्त हो सकता है। यही सोच उन्हें लगातार हमारी गतिविधियों और मित्रों के चयन पर सतर्क बनाए रखता था। 


बचपन की स्मृतियों के अनुसार आज की दृष्टि में भी यही लगता है कि एक स्त्री हजारों कठिनाई, थकान और सामाजिक बंधनों को सहकर भी अपने भीतर की जिजीविषा को जीवित रख सकती है। हर संभव समय से मुकाबला कर अपने और परिवार के लिए रचनात्मक कर सकती है। मां की मान्यता ही हमारे जीवन का ध्येय बनी। उन्होंने अपने सारे दर्द, सारी असफलताएँ और परेशानियाँ, शौक और सफलताएं पीछे रखकर केवल इसमें जुटी रहीं कि उसकी संतान किसी भी तरह पढ़ने-लिखने, सोचने-समझने में सक्षम और आत्मनिर्भर बने। माँ का यह समर्पण और दृष्टिकोण मेरे जीवन का सबसे मूल्यवान पाठ बना। 


मेरी माँ किसी भी प्रकार के अंधेरे की हामी नहीं रहीं। चाहे कितना भी श्रम क्यों न करना पड़ा हो उन्हें, अपने उजाले उन्होंने खुद बुने। हमेशा याद रहता कि जब मैं छठी कक्षा में पहुँची और अंग्रेज़ी की किताब हाथ आई, तब पहली बार अंग्रेज़ी के अक्षरों का उच्चारण भी उनकी मदद से ही सीखा। पहले उन्होंने स्वयं अंग्रेजी सीखी फिर मेरे साथ बैठकर अंग्रेज़ी की कविताएँ पढ़ना सिखाया। उनके लिए यह केवल पढ़ाई नहीं थी, बल्कि हमारी सोच और समझ की दिशा निर्धारित करने का एक गंभीर कार्य था। माँ ने हमें यह विश्वास दिलाया कि हौसला और लगन के साथ धैर्य रखना व्यक्ति को अगर आ जाए तो फिर किसी डिग्री या सामाजिक अनुमति की मोहताज नहीं रहता है व्यक्ति। यदि सीखने की जिज्ञासा हो तो मिट्टी का घर भी विश्वविद्यालय बन सकता है। उन्होंने यह जीवन-दर्शन अपने कर्म और जीवंत उदाहरण से मुझे समझाया। और ये भी कि अपने भीतर सवाल जन्म लेने देने की अनुमति भी किसी और की नहीं, व्यक्ति की अपनी नीयत होती है, और यह आदत आसानी से नहीं, चिंतनशीलता से जन्म लेती है। हमारे भारतीय परिवारों में मां बाप अपने बच्चे को स्वयं सोचकर निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। यहां व्यक्ति, पराश्रित बनते नहीं, उन्हें बाकायदा बनाया जाता है। मां बाप अपने पदचिह्नों पर ही संतान को चलते देखने के इच्छुक होते हैं। खैर!

 

माँ की सतत देख-रेख, उनका मार्गदर्शन और अनवरत प्रोत्साहन ही मेरे जीवन को बार बार नए नजरिए से देखने का आदि बनाता रहा। माँ, जो दिनभर अनगिनत कामों और कठिनाइयों—घर-गृहस्थी, परिवार की जिम्मेदारियों, सास की कट्टर अपेक्षाओं—को सहकर थक जाती थीं लेकिन जब शिक्षा की बात आती, तो अपनी सारी थकान, सारे दर्द और सभी परेशानियाँ पीछे रखकर हमें पढ़ाने में जुट जाया करती थीं। वे न केवल हमें बैठाकर पाठ रटातीं, बल्कि हमारी जिज्ञासा को समझतीं, हमारे प्रश्नों पर विचार करतीं और हमें सोचने के लिए प्रेरित करतीं। उन्होंने कभी भी अपने स्वयं के अधूरे ख्यालों की सीमाओं को बहाना नहीं बनने दिया। वे अपने सारे अनुभव, अपनी असफलताएँ, सामाजिक रोक-टोक, सीमाओं को खुलकर सामने रखतीं, ताकि हम उनसे सीख सकें और किसी भी तरह से हमारे जीवन के रास्ते न रुकें। उनका यह दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।  माँ की यह संघर्षपूर्ण शिक्षा ही मेरी शिक्षा के उस बीज को अंकुरित कर सकी जो एक लड़की को आत्मनिर्भर, जिज्ञासु और साहसी बना सकी। साथ ही, मां के अनुभवों ने ये भी सिखाया कि एक स्त्री अपने हजारों कष्टों, थकान और सामाजिक बाधाओं को सहकर भी अपनी संतान के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकती है। बच्चों के प्रति खोखली बयानबाजी काम नहीं आती, बल्कि माता पिता को अपनी संतान के लिए त्याग और धैर्य की शिक्षा भी मुझे अपनी माँ और पिता से ही मिली। उन्होंने अपनी सारी कमजोरियों और भीतर के दर्द को हमारे सीखने की प्रक्रिया में शामिल कर लिए थे। अपने घर में,परिवार के बीच, मैंने यह जाना कि सीखने की इच्छा, माँ के मार्गदर्शन में एक सामान्य घर भी ज्ञान का केंद्र बन सकता है। मां की सीख का नतीजा रहा जो मैं अपने बच्चों को सोचने और सवाल पूछने की स्वतंत्रता दे सकी। 


गाँव की पाठशालाओं में शिक्षा का ढाँचा अक्सर सीमित और रूढ़िवादी रहा है और आज भी पूरी तरह बदल नहीं पाया है। विकास की तेज़ आंधी ने समाज को कई तरह से बदल दिया है, परंतु मनुष्य के मनोविज्ञान और उसकी सोच पर इसका असर सीमित ही रहा है। आज भी शिक्षकों का व्यवहार लड़कियों और लड़कों के प्रति भेदभावपूर्ण होता है। लड़कियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अनुशासन और आज्ञाकारिता में उत्कृष्ट रहें, भले ही पढ़ाई में वे पीछे रह जाएँ। वहीं, लड़के जब सवाल पूछते हैं तो उसे जिज्ञासा माना जाता है। लड़की सवाल पूछे तो ‘बहुत बोलती है’ कहकर रोका जाता है। खेलकूद और प्रयोगात्मक गतिविधियों में भी भेदभाव स्पष्ट है। लड़कों को अधिक अवसर मिलते हैं—दोड़, फुटबॉल, प्रयोगात्मक प्रयोग, आदि। जबकि लड़कियों को सीमित गतिविधियों में रखा जाता है, जैसे रस्सी कूदना, गीत-संगीत, सजावट या कला। इस प्रकार, प्रारंभिक शिक्षा के स्तर से ही लड़कियों और लड़कों के अवसरों और दृष्टिकोण में भिन्नता पैदा हो जाती है।


स्त्री के बाबत समाज की दृष्टि सदियों से सीमित और परंपरागत रही है। ग्रामीण, नगरीय और महानगरीय समाजों में भले ही जीवन की परिस्थितियाँ भिन्न हों, फिर भी लड़कियों और महिलाओं के लिए अपेक्षाएँ लगभग समान रहती हैं, अनुशासन, सज्जनता और पारंपरिक भूमिकाओं में रहने की। स्कूल व्यवस्था भी इस सोच को पुष्ट करती है। वह लड़कियों की जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच को अक्सर दबा देती है। फिर भी, विद्यालय एक ऐसी सामाजिक और बौद्धिक इकाई है, जहाँ केवल ज्ञान अर्जित करने के लिए ही नहीं, बल्कि सोचने, समझने और आत्म-अवलोकन करने के लिए भी छात्रों का प्रवास होता है। यह दृष्टि दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षा केवल तथ्यों और सूचनाओं का संचय नहीं, बल्कि मनुष्य के आत्म-संवर्धन और सामाजिक चेतना का माध्यम है। स्कूल की संस्कृति जो शिक्षक, सहपाठी, पाठ्यक्रम और गतिविधियों के माध्यम से निर्मित होती है, लड़की के मानसिक विकास, जिज्ञासा और सामाजिक भागीदारी को आकार देती है।


यदि स्कूल केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रह जाए, तो वह व्यक्ति की चेतना और मानसिक स्वतंत्रता को पूर्ण रूप से विकसित नहीं कर पाता। विद्यालय मनुष्य के तार्किक, रचनात्मक और सामाजिक विकास का प्रारंभिक मंच बन जाता है। यहाँ स्त्री भी पहली बार ज्ञानात्मक गतिविधियां सीखती है। ये भी कि ज्ञान केवल संग्रहण नहीं, बल्कि जीवन की समस्याओं और अनुभवों को समझने और उनका समाधान करने की क्षमता भी है। इस प्रकार, विद्यालय न केवल अकादमिक संस्था है, बल्कि वह मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास का केंद्र भी है। ग्रामीण संसाधनों और सामाजिक सीमाओं के बावजूद, विद्यालय की संस्कृति और उसमें व्याप्त सीखने का माहौल ही स्त्री के आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सामाजिक सक्रियता का प्रारंभिक आधार तय करता है।


नगरीय और महानगरीय व निजी स्कूलों में लड़कियाँ भले ही खुले माहौल में पढ़ती हों, फिर भी उनकी भागीदारी और प्रयासों की मान्यता अक्सर सीमित रहती है। इस तरह, भौतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएँ लड़कियों के आत्मविश्वास और जिज्ञासा को प्रभावित करती हैं। जबकि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, यदि लड़कियों को सवाल पूछने, प्रयोग करने और चुनौतीपूर्ण कार्यों में भाग लेने का अवसर नहीं मिलता, तो उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे सिकुड़ता है। उनके भीतर उठने वाले प्रश्न अपराध या असहजता का कारण बन जाते हैं। यही वह समय है जब शिक्षा और अनुभव उन्हें अपनी पहचान, आत्म-सम्मान और भविष्य की संभावनाओं के लिए निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं।


इतिहास में कई स्त्रियों ने इन बाधाओं को पार कर दिखाया। मीराबाई ने भक्ति और ज्ञान को जीवन का आधार बनाया, सरोजिनी नायडू ने साहित्य, समाजसेवा और राजनीति में सक्रिय भागीदारी दिखाई, इंदिरा गांधी ने नेतृत्व और प्रशासन में उत्कृष्टता प्राप्त की, और रमाबाई ने स्त्री शिक्षा और सामाजिक दृष्टि को प्रेरणास्रोत बनाया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि शिक्षा, जिज्ञासा और आत्मविश्वास किसी भी सामाजिक या सांस्कृतिक बाधा को पार करने की शक्ति रखते हैं। इस दृष्टि से, स्त्री केवल समाज या घर की परंपरागत भूमिका तक सीमित नहीं है। वह अपने अनुभव, शिक्षा और आत्मविश्वास के माध्यम से अपने जीवन, समाज और इतिहास को आकार देने में सक्षम है। ग्रामीण या महानगरीय, संसाधन सीमित या भरपूर, हर परिवेश में उसका संघर्ष और प्रयास समान रूप से महत्व रखता है।


जीवन की धारा, जिसमें सीमाएँ, संघर्ष और सीख सभी कुछ मिश्रित होती है, के दो पहलू हर स्त्री के अनुभव में मौजूद होते हैं। एक ओर वह स्थिर, संरक्षित और परंपरा की धारा है, जो जड़ों से जोड़ती है, सुरक्षा देती है और सीमाओं के भीतर संरक्षण सिखाती है। दूसरी ओर वह जागरूक, संघर्षशील और स्वतंत्रता की धारा है, जो चुनौती देती है, सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को उजागर करती है, और आगे बढ़ने का साहस देती है। ग्रामीण, नगरीय या महानगरीय परिवेश में जन्मी, हर लड़की और स्त्री इन दोनों धाराओं के संगम से गुजरती है। घर की संस्कृतियाँ, स्कूल की सीमाएँ, समाज की अपेक्षाएँ, सब मिलकर उसे आकार देती हैं। कभी दादी या बुजुर्ग महिलाओं की सलाह, कभी माँ या शिक्षिकाओं का मार्गदर्शन, ये सभी अनुभव उसे सोचने, जिज्ञासा रखने, सवाल पूछने और निर्णय लेने की शिक्षा देते हैं। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहती। यह लड़कियों और महिलाओं को मानसिक स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी का अवसर देती है। यदि उन्हें अवसर, सम्मान और मार्गदर्शन मिले, तो वे केवल अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और पूरे समाज को भी उजागर कर सकती हैं। इतिहास ने यह स्पष्ट किया है कि जब स्त्रियाँ अपने भीतर की जिज्ञासा और साहस को पहचानती हैं, तो कोई भी सामाजिक या सांस्कृतिक बाधा उन्हें रोक नहीं सकती।इस दृष्टि से, हर स्त्री का जीवन केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक सांझी यात्रा है, जो सीमाओं, संघर्ष और अवसरों के बीच बहती है। उसकी शिक्षा, सोच और संघर्ष केवल उसका अधिकार या उपलब्धि नहीं है, यह समाज, संस्कृति और राष्ट्र की नींव है। हर सुरक्षित, शिक्षित और सशक्त स्त्री न केवल स्वयं के जीवन को समृद्ध करती है, बल्कि परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों को भी उजागर करती है।


इसलिए यह स्पष्ट है कि स्त्री शिक्षा का महत्व केवल व्यक्तिगत सफलता में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, संस्कृति की गहराई और मानवता के विकास में निहित है। हर महिला, हर लड़की अपने साहस, निर्णय और जिज्ञासा के माध्यम से उस उजास का वाहक बनती है, जो सीमाओं के बीच से निकलकर पीढ़ियों को जोड़ता है और भविष्य को प्रकाशित करता है। स्कूल की संस्कृति यहाँ एक बीज-भूमि की तरह है, जहाँ यह उजास पल्लवित होता है। वही वातावरण जिसमें बच्चियाँ प्रश्न पूछना सीखती हैं, सपने गढ़ती हैं और अपने भीतर की क्षमताओं को पहचानती हैं। स्कूल केवल पढ़ाई-लिखाई की जगह नहीं, बल्कि वह संसार है जहाँ बराबरी का भाव, सम्मान और सामूहिक सीखने की ऊर्जा उन्हें जीवन की राह पर आत्मविश्वास से भरती है। इस तरह विद्यालय संस्कृति स्त्री शिक्षा को केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना से जोड़ती है।


आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी पाठशाला कोई विद्यालय नहीं, मेरी माँ थीं। उन्होंने मुझे अक्षरों से अधिक प्रश्न करना सिखाया, उत्तरों से अधिक जिज्ञासा दी और सीमाओं से अधिक संभावनाओं पर विश्वास करना सिखाया। गाँव के उस छोटे-से घर में, जहाँ संसाधन कम थे और सामाजिक बंधन अधिक, वहीं मैंने जाना कि शिक्षा केवल पुस्तक का ज्ञान नहीं, बल्कि अपने भीतर उजाला जलाए रखने की कला है। शायद इसी कारण आज भी जब स्त्री शिक्षा की बात होती है, तो मुझे विद्यालय की इमारत से पहले लालटेन की वह लौ याद आती है, जिसके प्रकाश में एक स्त्री अपने सपनों को जीवित रखे हुए थी। वही लौ मेरे भीतर आज भी जल रही है।

                  इस अंक में मेरी भी भागीदारी।


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