परिधि के बाहर जीवन,मन और विचार
( 11.06.2026)
हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा गहरे दोहराव से निर्मित होता है। हम बार-बार उन्हीं रास्तों पर चलते हैं, उन्हीं लोगों से मिलते हैं, उन्हीं बातों पर विचार करते हैं और धीरे-धीरे उन्हीं निष्कर्षों के भीतर बसने लगते हैं, जिन्हें कभी हमने सत्य मान लिया था। किसी माने हुए सत्य का खंडन करना अत्यंत कठिन कर्म है। क्योंकि केवल समाज ही परम्पराओं की परिधि में नहीं घूमता, मन भी अपनी परिधियाँ रच लेता है। कुछ शब्द, कुछ व्यक्ति, कुछ घटनाएँ और कुछ भाव ऐसे होते हैं जो निरंतर हमारे भीतर लौटते रहते हैं। प्रातः आँख खुलते ही बासी और जर्जर विचार मन की सतह पर उपस्थित हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो मन अपने ही निर्मित, परिचित संसार में पुनः प्रवेश कर गया हो। वहाँ सब कुछ जाना-पहचाना है, वही स्मृतियाँ, वही आशंकाएँ, वही निष्कर्ष। मन अनजाने की अपेक्षा परिचित को अधिक सहज स्वीकार करता है; इसलिए वह बार-बार उन्हीं मानसिक पगडंडियों पर लौटता है, चाहे वे उसे सीमित ही क्यों न कर रही हों। इस प्रकार मनुष्य केवल बाहरी परम्पराओं का नहीं, अपनी आंतरिक आदतों और धारणाओं का भी उत्तराधिकारी होता है। और शायद आत्मचिन्तन का अर्थ यही है कि हम यह पहचान सकें, जो बार-बार लौट रहा है, वह वास्तव में सत्य है या केवल परिचय का आकर्षण।
पहली दृष्टि में यह स्वाभाविक प्रतीत होता है। स्मृति के बिना जीवन संभव भी नहीं है। किंतु समस्या तब शुरू होती है जब स्मृति केवल उपयोग का साधन न रहकर देखने का माध्यम बन जाती है। तब हम वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं को वैसे नहीं देखते जैसे वे हैं, बल्कि वैसे देखते हैं जैसे हमने उन्हें पहले से परिभाषित कर रखा है। हमारा प्रत्येक अनुभव पुराने अनुभवों की छाया में घटित होने लगता है।
यहीं से एकरूपता जन्म लेती है। एकरूपता सुविधा देती है, क्योंकि उसमें संघर्ष कम है। वहाँ हमें अपने विश्वासों को बार-बार परखना नहीं पड़ता। हम उन लोगों के बीच रहते हैं जो हमारी तरह सोचते हैं, उन विचारों को स्वीकार करते हैं जो हमारे निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं और उन बातों से बचते हैं जो हमारी स्थापित धारणाओं को चुनौती देती हैं। धीरे-धीरे यह सुविधा एक अदृश्य संकुचन में बदल जाती है। मन का विस्तार रुकने लगता है। और सबसे खतरनाक बात ये कि हम अक्सर मान लेते हैं कि स्थिरता ही परिपक्वता है। अनुभव है। जबकि कई बार वह केवल जड़ता होती है। जीवंतता का अर्थ लगातार नए विचारों का संग्रह करना नहीं है, बल्कि देखने की क्षमता को जीवित बनाए रखना है। जब मन किसी निष्कर्ष से चिपक जाता है, तब वह सीखना बंद कर देता है। सीखना वहीं संभव है जहाँ यह स्वीकार करने का साहस हो कि जो मैं जानता हूँ, वह सम्पूर्ण नहीं है।
नए दृष्टिकोण में ठहरना सहज नहीं होता। वह असुविधाजनक होता है, क्योंकि वहाँ निश्चितता का सहारा नहीं होता। वहाँ व्यक्ति को अपने ही विश्वासों, धारणाओं और निष्कर्षों से सामना करना पड़ता है। कई बार यह स्वीकार करना पड़ता है कि जिन बातों को हमने वर्षों तक सत्य माना, वे वस्तुतः हमारी समझ की सीमाएँ थीं। यह स्वीकार मन को विचलित कर सकता है। इसलिए अधिकांश लोग परिचित विचारों की सुरक्षा में लौट जाना पसंद करते हैं।
उदाहरण के लिए, हमने अक्सर यह धारणा सुनी है कि माता-पिता गलत हो ही नहीं सकते। किंतु यह भी एक बनी-बनाई मान्यता हो सकती है। माता-पिता अनुभवी हो सकते हैं, शुभचिंतक हो सकते हैं, पर वे भी मनुष्य हैं और मनुष्य होने के कारण उनसे भी भूल संभव है। किसी विचार को केवल परंपरा या संबंध के आधार पर सत्य मान लेना, उसे परखने की आवश्यकता को समाप्त नहीं कर देता।
जीवन सुरक्षा के घेरे में नहीं खिलता। जीवन का स्वभाव नवीनता है। हर सुबह नई है, हर संबंध हर क्षण बदल रहा है, हर अनुभव पहले से भिन्न है। केवल मन ही है जो पुराने शब्दों, पुराने निष्कर्षों और पुरानी स्मृतियों के सहारे इस निरंतर नवीनता को पकड़ने का प्रयास करता है। परिणाम यह होता है कि हम जीवन को प्रत्यक्ष रूप से नहीं जीते, बल्कि जीवन के बारे में अपने विचारों को जीने लगते हैं। हम वस्तुस्थिति से अधिक अपनी धारणाओं के साथ संपर्क में रहते हैं। और शायद जागरूकता की शुरुआत वहीं से होती है जहाँ हम अपने निष्कर्षों को अंतिम सत्य मानने के बजाय उन्हें देखने, परखने और आवश्यक होने पर छोड़ने का साहस जुटाते हैं।
जे. कृष्णमूर्ति ने बार-बार इस तथ्य की ओर संकेत किया कि मन ज्ञात के क्षेत्र में रहना चाहता है। ज्ञात उसे सुरक्षा देता है। परंतु जो ज्ञात है, वह हमेशा अतीत से संबंधित है। जीवन अतीत नहीं है, वह इसी क्षण घटित हो रहा है। इसलिए जब मन केवल स्मृति के आधार पर जीता है, तब वह जीवन की ताजगी से दूर हो जाता है।
मनुष्य की सबसे बड़ी चुनौती अपनी मानसिक परिधियों को पहचानना है। यह देखना कि कौन-से शब्द, धारणाएँ और निष्कर्ष उसे बार-बार उसी वृत्त में बाँधे रखते हैं। जब तक परिधि दिखाई नहीं देती, वह सम्पूर्ण आकाश प्रतीत होती है।
यही पहचान परिवर्तन की शुरुआत है। परिवर्तन नए विचारों को जोड़ लेने से नहीं, बल्कि अपनी निश्चितताओं को बिना भय और पक्षपात के देखने से आता है। अधिकांश लोग एक विश्वास छोड़कर दूसरा पकड़ लेते हैं, पर यह केवल एक परिधि से दूसरी परिधि में जाना है। वास्तविक परिवर्तन तब घटित होता है जब मन विश्वास और निष्कर्ष की सीमाओं को समझने लगता है।
जीवन किसी निष्कर्ष में नहीं, बल्कि खुलेपन में रहता है। वह निरंतर गतिशील है, जबकि निष्कर्ष स्थिर होते हैं। इसलिए जीवन को समझने के लिए हर क्षण नया देखने का साहस चाहिए।
परिधियाँ सुरक्षा और पहचान देती हैं, किंतु वे देखने की सीमा भी बन सकती हैं। परिपक्वता किसी अंतिम सत्य पर पहुँचने में नहीं, बल्कि इतनी सजगता में है कि हम अपने हर निष्कर्ष को भी प्रश्न की दृष्टि से देख सकें। वहीं से खुला और जीवंत जीवन आरंभ होता है।
लेखिका: कल्पना मनोरमा
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