स्कूल, कोचिंग और भय का उद्योग
ज्ञानार्जन अब केवल एक साधारण प्रक्रिया नहीं रही। बल्कि ज्ञान प्राप्त करना एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें अभिभावकों की आर्थिक और मानसिक क्षमता लगातार क्षीण हो रही है। पिछले दो दशकों में निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संस्कृति ने शिक्षा को ऐसे ढाँचे में ढाल दिया है, जहाँ सामान्य आय वाला परिवार भी असाधारण खर्च करने के लिए विवश हो रहा है। और जब-जब ऐसा होता है तो सामान्य आय वाले माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा दिलाने के लिए त्याग नहीं, अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा देते हैं।
हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था शायद दुनिया की अकेली ऐसी व्यवस्था है, जहाँ बच्चे को स्कूल भेजना ही काफी नहीं। माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे भी स्कूल से लौटकर कोचिंग जाएँ। मानो दिन का पहला हिस्सा केवल उपस्थिति दर्ज कराने में निकल गया और दूसरा, जो कोचिंग के नाम खर्च होता है, उसमें बच्चा तकनीक से लेकर भाषा, गणित सबकी शिक्षा ग्रहण कर ले।
सुबह सात बजे बस स्टॉप पर खड़े बच्चों को देखिए। पीठ पर इतने बड़े बैग कि लगता है वे किताबें नहीं, पूरा भविष्य ढो रहे हैं। कुछ घंटों के बाद वही बच्चे दूसरी कॉपियाँ लेकर कोचिंग रूम की सीढ़ियाँ चढ़ते दिखाई देंगे। एक ही दिन में दो तरह की शिक्षा, दो तरह की फीस, दो तरह की थकान और दो तरह की व्यवस्था।
स्कूल अब नाकाफी होते जा रहे हैं। वहाँ स्मार्ट बोर्ड हैं, वार्षिक उत्सव हैं, “होलिस्टिक डेवलपमेंट” के पोस्टर हैं। वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ हैं। अनुभव से सीखो वाले सत्र हैं, जिनमें बच्चे अजीब-अजीब चीजें लेकर स्कूल तक की यात्रा करते हैं। किसी के हाथ में आटा और चलनी होती है, तो किसी के हाथ में सब्जी का थैला। रंगों की परिभाषा आलू-टमाटर से ही सीखी जा सकेगी। लेकिन पढ़ाई का वास्तविक स्वरूप नदारद है। न शिक्षकों को विद्यार्थी पर भरोसा और न विद्यार्थियों को शिक्षकों पर भरोसा। यह बात शिक्षक से लेकर अभिभावक तक सब जानते हैं। इसलिए वे बहुत सहज और आत्मीय स्वर में कहते हैं, “बोर्ड की तैयारी के लिए अलग मेहनत करनी पड़ेगी।” “प्राथमिक शिक्षा धरातलीय है, उसे महत्व देना ही होगा।” ये वाक्य ज्ञान के प्रति स्वीकृति कम, सहज व्यवस्था की विनम्र आत्मस्वीकृति अधिक हैं। अभिभावकों की आँखों के सामने स्कूल और कोचिंग सेंटरों ने अपने सिद्धांतों और आय के स्रोतों के हिसाब से शिक्षण बाँट लिया है।
अभिभावकों को लगता है, उनके बच्चों को स्कूल प्रमाणपत्र देता है और कोचिंग भविष्य। स्कूल शिक्षा देता है, कोचिंग चयन। स्कूल में बच्चा विद्यार्थी होता है, कोचिंग में अभ्यर्थी।
यहीं से शिक्षा सीखने की प्रक्रिया कम और छँटाई की प्रक्रिया अधिक लगने लगती है।
जबकि कभी कोचिंग कमजोर छात्रों की सहायता मानी जाती थी। अब वह लगभग अनिवार्य सामाजिक संस्कार बन चुकी है। पाँचवीं का बच्चा “फाउंडेशन बैच” में है, आठवीं का बच्चा “ओलंपियाड ट्रेनिंग” में। बारहवीं तक आते-आते घरों का वातावरण किसी छोटे परीक्षा केंद्र जैसा हो जाता है। रिश्तेदार अब यह नहीं पूछते कि बच्चा क्या पढ़ रहा है, वे पूछते हैं, “किसकी तैयारी चल रही है?”
यहाँ शिक्षा अब जिज्ञासा नहीं, निरंतर तैयारी है।
बारहवीं कक्षा भी अब बोर्ड परीक्षा कम और प्रवेश परीक्षाओं का वेटिंग रूम अधिक लगने लगती है। स्कूल के भीतर पढ़ाई चलती रहती है और बाहर मेडिकल, इंजीनियरिंग, CLAT, CUET, विदेशी विश्वविद्यालयों और स्किल-सर्टिफिकेट्स का विशाल बाजार अपना तंबू लगाए बैठा रहता है। हर मोड़ पर एक नई परीक्षा है और हर परीक्षा के बाहर एक नया संस्थान।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जितना अविश्वास बढ़ा है, उतना ही खर्च भी। स्कूल फीस बढ़ती है तो कोचिंग की फीस भी बढ़ जाती है। ऑनलाइन ऐप आ चुके हैं, टेस्ट सीरीज़, करियर काउंसलिंग अलग से। शिक्षा अब वह क्षेत्र बन गई है जहाँ असुरक्षा सबसे महँगा उत्पाद है।
और माता-पिता? वे अब अभिभावक कम, परियोजना प्रबंधक बने अधिक दिखाई देते हैं। कौन-सा बोर्ड बेहतर है, कौन-सा बैच जल्दी भर जाता है, किस परीक्षा की तैयारी कितनी उम्र से शुरू करनी चाहिए।
घरों से आत्मीयता, संस्कारों की बातें, दादी-नानी की कहानियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। घर, घर कम, छोटे शिक्षा कार्यालय अधिक लगने लगे हैं। और यह सब इतनी सामान्य ढंग से हो रहा है कि किसी को यह प्रश्न भी अजीब नहीं लगता कि यदि स्कूल पर्याप्त है, तो कोचिंग क्यों? और यदि कोचिंग अनिवार्य है तो स्कूल किसलिए हैं।
हमारे यहाँ अब शिक्षा केवल पढ़ाई नहीं रही, वह एक पूर्णकालिक चिंता में बदल चुकी है। और हर बड़ी चिंता की तरह उसका भी अपना उद्योग विकसित हो चुका है। कोचिंग सेंटर इसी उद्योग के सबसे चमकदार संस्थान हैं। बाहर टॉपर्स की मुस्कराती तस्वीरें, भीतर हजारों बच्चे और उनके पीछे बैठा हुआ एक बेचैन मध्यवर्ग, जिसे लगातार यह समझाया जा रहा है कि भविष्य बहुत कठिन है और तैयारी अभी पर्याप्त करना बाकी है।
यह व्यवस्था कभी खुलकर नहीं कहती कि स्कूल नाकाफी हैं। वह केवल इतना कहती है, “प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है।” यही वाक्य इस पूरे उद्योग का सबसे विनम्र और सबसे सफल विज्ञापन है। धीरे-धीरे पूरा समाज शिक्षा की नहीं, तैयारी की भाषा बोलने लगा है। बच्चे अब विषय कम, पैटर्न अधिक समझ लेना चाहते हैं। गणित का मतलब प्रश्न हल करना नहीं, “स्पीड बढ़ाना” हो गया है। इतिहास याद रखने की चीज नहीं, “स्कोरिंग सेक्शन” है। यहाँ तक कि रुचियाँ भी करियर संभावनाओं के हिसाब से व्यवस्थित की जाने लगी हैं।
अब तो कई स्कूल अपनी पहचान इस आधार पर बनाते हैं कि वे किस कोचिंग संस्थान से जुड़े हैं। कुछ जगह स्कूल और कोचिंग का समय इस तरह बाँटा गया है कि बच्चा समझ ही नहीं पाता कि वह पढ़ कहाँ रहा है और तैयार कहाँ हो रहा है।
कोटा इस व्यवस्था का सबसे हॉट टॉपिक है, लेकिन समस्या केवल कोटा नहीं। दरअसल पूरा देश धीरे-धीरे कोटा में बदलता जा रहा है। छोटे शहरों तक में “रेजिडेंशियल प्रोग्राम”, “रैंकर्स बैच” और “अर्ली टार्गेट प्रिपरेशन” जैसे शब्द सामान्य हो चुके हैं। बचपन अब उम्र नहीं, प्रतियोगी परीक्षा से पहले की अस्थायी अवस्था जैसा लगता है। संज्ञान होना चाहिए कि इस पूरे मॉडल की सबसे बड़ी ताकत भय है।
पीछे छूट जाने का भय। औसत रह जाने का भय। चयन न होने का भय। स्कूल और कोचिंग सेंटर जानते हैं, भय हमेशा अच्छा ग्राहक बनाता है।
मध्यवर्ग इस व्यवस्था का सबसे प्रमुख पात्र है। गरीब परिवार को कम से कम यह भ्रम नहीं कि शिक्षा सस्ती है, और संपन्न वर्ग को यह डर नहीं कि फीस भर पाएँगे या नहीं। सबसे अधिक तनाव उस परिवार में है जो हर महीने अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई में खर्च कर रहा है और फिर भी आश्वस्त नहीं हो पा रहा। और शिक्षा है कि भावनात्मक संबंध से निकलकर आर्थिक निवेश में बदलती जा रही है। बच्चे के अंक केवल उपलब्धि नहीं रहते। वे परिवार के त्याग का हिसाब भी बन जाते हैं। घरों में अक्सर यह वाक्य सुनाई देता है, “हम तुम्हारे लिए इतना कर रहे हैं।”
उसके बाद बच्चे को पढ़ाई कम और ऋण चुकाने की चिंता ज्यादा हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में बचपन चुपचाप गायब हो रहा है। खेल “स्किल डेवलपमेंट” बन गया, छुट्टियाँ “प्रोडक्टिव टाइम” और थकान “फोकस की कमी”। यहाँ अब बच्चे करियर चुनने से पहले टेस्ट सीरीज़ चुनते हैं। सबसे रोचक बात यह है कि इस व्यवस्था में असफलता की जिम्मेदारी हमेशा बच्चे या परिवार पर आती है। व्यवस्था कभी असफल नहीं होती। बच्चा टूट जाए तो कहा जाएगा, “प्रेशर संभाल नहीं पाया।” कोई यह नहीं पूछता कि चौदह-पंद्रह साल के बच्चों पर वयस्क महत्वाकांक्षाओं का इतना भार किसने रखा।
शिक्षा अब ज्ञान से अधिक सहनशक्ति की परीक्षा बनती जा रही है। यहाँ विद्यार्थी कम, लगातार प्रदर्शन करते छोटे कर्मचारी अधिक दिखाई देते हैं। और फिर भी समाज आश्वस्त है कि यही भविष्य निर्माण का संकेत है।
हमारे यहाँ शिक्षा को लेकर सबसे सुंदर बातें भाषणों में कही जाती हैं और सबसे कठोर सच्चाइयाँ स्कूलों में दिखाई देती हैं। एक तरफ वे बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई किंडरगार्टन से ही करियर योजना की तरह शुरू हो जाती है। स्कूल के बाद कोडिंग क्लास, फिर ओलंपियाड ट्रेनिंग, फिर व्यक्तित्व विकास। दूसरी तरफ वे बच्चे हैं जिनके लिए स्कूल अब भी दिन का सबसे भरोसेमंद भोजन है। मिड डे मील योजना ने लाखों बच्चों को स्कूल से जोड़े रखा। अनेक परिवारों के लिए यह केवल सरकारी योजना नहीं, घर के बजट का हिस्सा है। कई इलाकों में बच्चे स्कूल इसलिए नियमित आते हैं क्योंकि वहाँ खिचड़ी मिलती है, दाल मिलती है, कभी-कभी फल भी। शिक्षा यहाँ अभी भी पेट से होकर गुजरती है। और उसी देश में कुछ स्कूल ऐसे हैं जहाँ बच्चों के टिफिन “न्यूट्रिशन चार्ट” देखकर तय होते हैं। कहीं कैलोरी गिनी जा रही है, कहीं भोजन की उपलब्धता। दोनों को एक ही शिक्षा व्यवस्था कहा जाता है ताकि राष्ट्रीय आत्मविश्वास बना रहे।
एक बच्चा एयर-कंडीशंड बस से उतरकर स्मार्ट क्लास में जाता है। दूसरा टूटी बेंच पर बैठा शिक्षक का इंतजार करता है। एक के पास परीक्षा की तैयारी के लिए पाँच ऐप हैं, दूसरे के स्कूल में कभी-कभी गणित का शिक्षक ही नहीं होता। फिर दोनों से कहा जाता है, “प्रतियोगिता समान है।”
शायद यही हमारे समय की सबसे व्यवस्थित असमानता है। यहाँ शिक्षा अब समान अवसर नहीं, असमानताओं का सबसे सुव्यवस्थित नक्शा बन चुकी है। इन्हीं दिनों देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर गंभीर बहस चल रही है। एक राष्ट्र, एक कानून, एक नागरिक व्यवस्था। यह विचार अपने भीतर समानता का आकर्षण रखता है। लेकिन शिक्षा का क्षेत्र इस बहस के बीच एक असुविधाजनक प्रश्न की तरह खड़ा रहता है।
हमारे यहाँ समानता पर सबसे लंबी बहसें अक्सर उन्हीं क्षेत्रों से दूर होती हैं जहाँ असमानता सबसे आसानी से दिखाई देती है। यहाँ बच्चे एक ही संविधान पढ़ते हैं, लेकिन एक जैसी शिक्षा नहीं पाते। कुछ स्कूलों में “ग्लोबल सिटीजन” तैयार किए जा रहे हैं, कुछ में उपस्थिति दर्ज करवाना ही उपलब्धि है। एक बच्चा पाँचवीं से IIT फाउंडेशन में है, दूसरा मिड डे मील के भरोसे स्कूल में बना हुआ है। दोनों को भविष्य का नागरिक कहा जाता है, मानो भविष्य भी सबके लिए समान हो।
यहाँ सिविल कोड के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न नहीं, बच्चा, विद्यार्थी, छात्र केवल इतना पूछना चाहता है कि यदि समानता सचमुच राष्ट्रीय लक्ष्य है, तो शिक्षा उसकी सबसे पहली शर्त क्यों नहीं है? हम शायद एक समान नागरिक संहिता की कल्पना कर सकते हैं, लेकिन एक समान स्कूल व्यवस्था की नहीं। यही बात सबसे अधिक बेचैन करती है।
धीरे-धीरे शिक्षा ने अपना मूल अर्थ खोना शुरू कर दिया है। और किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। वह सीखने से अधिक छँटाई का तंत्र बनती जा रही है। कुछ बच्चों को ऊपर भेजने और बाकी को किनारे लगाने की व्यवस्थित प्क्या। और इस पूरी यात्रा में स्कूल, कोचिंग और मिड डे मील, तीनों मिलकर देश की तीन अलग तस्वीरें बनाते हैं। शायद आने वाले समय में इतिहास यह नहीं पूछेगा कि हमने कितनी नई शिक्षा नीतियाँ बनाईं। वह शायद यह पूछे कि क्या हमने कभी सचमुच ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की, जिस पर सभी वर्ग समान भरोसा कर सकें।
फिलहाल तो स्थिति यह है कि यहाँ बच्चे अलग-अलग नावों में बैठकर ज्ञान के एक ही किनारे तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।
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