लेखन की तैयारी या सहजता की खोज


किसी भी रचनाकार के लिए सबसे कठिन क्षण शायद वही होता होगा, जब वह तय कर लेता होगा कि आज उसे कुछ अद्भुत लिखना है। मेरे लिए भी ये क्षण कठिन से कठिनतम हो जाते हैं। क्योंकि जिस वक्त रचनात्मकता को धैर्य की ज़रूरत होती है, उसी क्षण अधीरता अपना खेल शुरू कर देती है। शब्द ठोस हो जाते हैं, विचार जुगनुओं की तरह जलते-बुझते हैं, और सामने रखे कागज़ मुझे देखते रह जाते हैं कि उन पर मन की इबारत उतरे।


मैं खुद को ज़्यादा समय इसी स्थिति में पाती हूँ।

इससे उबर भी जाएँ, लेकिन सुनी-सुनाई बातों पर मन अमल कर लेता है कि लेखन एक साधना है। इसलिए उसे साधने के लिए विधि-विधान होना ही चाहिए। जैसे योगी आसन बिछाकर ध्यान में बैठता है, एक लेखक को भी अपनी टेबल सजाकर, किताबें व्यवस्थित कर, पूरी तैयारी के साथ लिखने बैठना चाहिए। इस सोच के साथ मैं कई बार स्टडी टेबल की सफाई और सजावट में लग जाती हूँ—किताबें जमाना, पेन-पेंसिल ठीक करना, सामने की दीवार पर प्रेरक पंक्तियाँ चिपकाना। सब कुछ तैयार हो जाने पर लगता है कि अब तो लिखना सहज हो जाएगा। लेकिन ठीक उसी समय मन नए भाव में भटकने लगता है। कभी चाय का बहाना, कभी फोन, कभी कोई छोटा काम—और अंत में एक सधी हुई आवाज़, “आज नहीं, कल सही से लिखूँगी।”

जब कल जल्दी से नहीं आता, तब मैं खुद से पूछती हूँ—क्या वह टालमटोल थी, या लेखन का अपना स्वभाव ही ऐसा होता है? मेरा हर बार अनुभव यही कहता है कि जब मैंने लेखन को बुलाने की कोशिश की, वह नहीं आया। लेकिन जब कोई विचार भीतर उमड़ पड़ा, कोई स्मृति बार-बार लौटने लगी या कोई अनुभव बेचैन करने लगा—तब लिखना अपने आप वहीं से शुरू हो गया। उस समय न तैयारी की ज़रूरत पड़ी और न ही औपचारिकता की। जहाँ भी हूँ, जैसे भी हूँ, शब्द उतरने लगे और मैं रचनात्मकता में खो गई।

वह लिखावट कभी कागज़ पर उतरी, तो कभी मोबाइल के नोट्स में। इससे मुझे लगता है कि लेखन की प्रकृति बारिश जैसी होती है। हम चाहे कितनी भी तैयारी कर लें, बरसात अपने समय पर ही होती है। और जब आती है, तो पूरी तरह भिगो जाती है। लेखक का काम शायद केवल इतना है कि वह उस पहली बूँद की आहट पहचान सके।

फिर सवाल उठता है—तैयारी करने पर लेखन क्यों नहीं आता? शायद इसलिए कि तैयारी के साथ अपेक्षा जुड़ जाती है। हम चाहते हैं कि अब, जब बैठ ही गए हैं, तो अच्छा लिखना ही चाहिए। लेकिन रचनात्मकता दबाव को स्वीकार नहीं करती। वह स्वतंत्रता में ही पनपती है। यह समझ धीरे-धीरे बनती जा रही है। लेखन दरअसल जीवन के प्रति गहरी संवेदनशीलता का परिणाम है। कोई अनुभव जब भीतर तक असर करता है, कोई सवाल बेचैन करता है, तभी वह शब्दों का रूप लेता है। इसे जबरन बुलाना कठिन है—शायद हर एक लेखक के लिए भी।

लेकिन यहाँ यह कहना भी समीचीन होगा कि केवल प्रेरणा पर लेखक को निर्भर रहना भी पर्याप्त नहीं। प्रेरणा क्षणिक होती है। लेखन को जीवित रखने के लिए निरंतरता ज़रूरी है—बिना इस डर के कि आज अच्छा लिखा जाएगा या नहीं। अक्सर यही डर हमें टेबल से दूर करता है, क्योंकि हम चाहते हैं कि हर बार श्रेष्ठ लिखें। यही अपेक्षा कलम को बाँध देती है।

इसके विपरीत, जब बिना दबाव के लिखना शुरू होता है, तो शब्द सहजता से जुड़ने लगते हैं। वहाँ केवल अभिव्यक्ति की तात्कालिकता होती है, न कि श्रेष्ठता का बोझ।

तो क्या तैयारी व्यर्थ है? नहीं। लेकिन तैयारी का अर्थ केवल बाहरी सजावट नहीं होना चाहिए। असली तैयारी है—मन को खुला रखना। किताबें सजाना गलत नहीं, पर यह मान लेना कि इसके बाद लेखन स्वतः आ जाएगा, यही भ्रम है। खुद को बताती रहती हूँ।

सबसे संतुलित रास्ता शायद यही है कि हम नियमित रूप से लिखने का समय तय करें, लेकिन उस समय यह अपेक्षा न रखें कि कुछ महान रचना ही करनी है। बस शब्दों से संवाद करें, विचारों को बहने दें। धीरे-धीरे यही अभ्यास सहजता में बदल जाता है।

लेखन का स्वभाव द्वंद्वात्मक है—वह अनुशासन भी चाहता है और स्वतंत्रता भी। कभी वह प्रयास से आता है, कभी अनायास। इसी संतुलन को साध लेना ही लेखक का अभ्यास है, जो मैं करने का प्रयास करती हूँ।

आज भी जब मैं अपनी स्टडी टेबल को देखती हूँ, तो मुस्कुरा देती हूँ। वही टेबल कभी बोझ लगती है, और कभी सबसे सुंदर पंक्तियों का जन्मस्थान बन जाती है। और कई बार वे पंक्तियाँ कहीं और—बिस्तर पर, यात्रा में—चुपचाप उतर आती हैं।

शायद लेखन का यही स्वभाव है—वह किसी एक समय, स्थान या विधि में बँधता नहीं। वह भीतर और बाहर के संसार के बीच एक संवाद है, जो तभी संभव है जब हम अपने मन और आँखें खुली रखते हैं।

मेरी लिखने की मेज हमेशा मेरे सामने होती है। बस भाषा और भाव जब आंदोलित करने लगते हैं, लिखने बैठ जाती हूँ


Comments

  1. आपने सही कहा है लेखन बारिश की तरह है , जो अपने समय पर ही आयेगी, बहुत सुंदर आलेख!!

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