जब लेखक ब्रांड बनने लगे

   आज की जनधारा में आवरण कथा के रूप में लेख 
  

जब लेखक ब्रांड बनने लगे


  साहित्य का इतिहास उठाकर देखा जाए तो लेखक कभी केंद्र में नहीं था, उसकी रचना थी। पाठक पुस्तक खोलता था तो वह लेखक के व्यक्तित्व से नहीं, उसके विचारों, उसके अनुभवों और उसकी संवेदनाओं से मिलना चाहता था। बहुत-से पाठकों ने प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध या निर्मल वर्मा को पढ़ा, बिना यह जाने कि वे दिखते कैसे थे। उनकी पहचान उनके शब्द थे, उनका चेहरा नहीं।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते साहित्य की दुनिया में एक मौन परिवर्तन घटित हुआ। लेखक धीरे-धीरे रचना से बाहर निकलकर स्वयं एक दृश्य उपस्थिति में बदलने लगा। अब केवल पुस्तक का प्रकाशित होना पर्याप्त नहीं रहा, लेखक का दिखाई देना भी आवश्यक हो गया। उसे मंचों पर उपस्थित होना था, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना था, अपने पाठकों से लगातार संवाद करना था और सबसे बढ़कर स्वयं को एक पहचान के रूप में स्थापित करना था। यहीं से लेखक के "ब्रांड" बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।

पहली दृष्टि में यह परिवर्तन स्वाभाविक लगता है। हर युग अपने संचार माध्यमों के साथ आता है। यदि आज का लेखक डिजिटल मंचों का उपयोग करता है तो इसमें कोई अस्वाभाविकता नहीं है। समस्या माध्यम के उपयोग में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है, जिसमें लेखक की रचना से अधिक उसकी सार्वजनिक छवि महत्वपूर्ण होती जा रही है।

ब्रांड मूलतः बाज़ार की अवधारणा है। किसी वस्तु को भीड़ से अलग पहचान देने के लिए उसे एक विशिष्ट छवि प्रदान की जाती है। जब यही तर्क साहित्य में प्रवेश करता है तो लेखक भी एक प्रकार की सांस्कृतिक वस्तु में बदलने लगता है। उसकी भाषा, उसके विचार, उसकी सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ, यहाँ तक कि उसकी जीवन-शैली भी उसकी साहित्यिक उपस्थिति का हिस्सा बना दी जाती है। इस पूरी व्यवस्था में पाठक पुस्तक नहीं, लेखक की छवि पढ़ने लगता है। यहाँ एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि क्या साहित्य का मूल्य लेखक की दृश्यता से तय होना चाहिए, या रचना से? यदि कोई लेखक उत्कृष्ट रचनाएँ लिख रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं है, मंचीय प्रस्तुतियों में सहज नहीं है, प्रचार के साधन नहीं रखता, तो क्या उसकी रचनात्मकता कम महत्वपूर्ण हो जाती है? दूसरी ओर यदि कोई लेखक निरंतर दिखाई दे रहा है, चर्चा में बना रहता है, पर उसकी रचना साधारण है, तो क्या केवल दृश्यता उसे साहित्यिक महत्व प्रदान कर सकती है?

हमारे समय का संकट यही है कि दृश्यता और मूल्य के बीच का अंतर धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा है। समय की यही निष्ठुरता साहित्य को भीतर ही भीतर क्षीण कर रही है। विडंबना यह है कि साहित्यकार स्वयं भी इस प्रक्रिया को हमेशा पहचान नहीं पा रहा। वह लिट फेस्टों, मंचों और सार्वजनिक उपस्थितियों की धुरी पर निरंतर घूम रहा है, जबकि उसकी रचनात्मकता का केंद्र उससे दूर होता जा रहा है। साहित्य का जन्म एकांत, चिंतन और आत्मसंवाद से होता है, लेकिन जब दृश्यता ही उपलब्धि का पर्याय बन जाए तो शब्दों की जगह प्रदर्शन लेने लगता है। तब लेखक उपस्थित अधिक रहता है, रचता कम है।

साहित्य का स्वभाव मूलतः धीमा होता है। वह तत्काल प्रभाव का नहीं, दीर्घकालिक संवाद का माध्यम है। एक अच्छी रचना पाठक के भीतर धीरे-धीरे खुलती है। वह प्रश्न पैदा करती है, असहमति जगाती है और कई बार ऐसी बेचैनी भी छोड़ जाती है, जो मनुष्य को अपने समय और स्वयं के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए विवश करती है। इसके विपरीत ब्रांड की दुनिया धैर्य नहीं जानती। वहाँ त्वरित पहचान, त्वरित प्रतिक्रिया और त्वरित लोकप्रियता ही सफलता के मानदंड हैं। इसलिए ब्रांड संस्कृति स्वाभाविक रूप से उन्हीं चीज़ों को महत्व देती है, जो तुरंत आकर्षित करें, चाहे वे समय की कसौटी पर टिकें या नहीं। साहित्य का संकट यहीं से शुरू होता है, जब स्थायित्व की जगह तात्कालिकता और रचना की जगह उसकी प्रस्तुति अधिक महत्वपूर्ण मान ली जाती है।

लेखक के ब्रांड बनने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह अनजाने में अपनी छवि का कैदी बन सकता है। जब किसी लेखक की एक निश्चित सार्वजनिक पहचान बन जाती है, तो उस पर उसे बनाए रखने का दबाव भी बढ़ने लगता है। वह उन प्रश्नों से बच सकता है, जो उसकी लोकप्रियता को प्रभावित करें। वह उन विषयों की ओर झुक सकता है, जिन्हें अधिक सराहना मिलती हो। धीरे-धीरे रचना का साहस छवि की सुरक्षा में बदल सकता है।

यह केवल लेखक का संकट नहीं है, यह पाठक का भी संकट है।

जब पाठक किसी रचना तक पहुँचने से पहले लेखक की प्रसिद्धि, अनुयायियों की संख्या या मीडिया उपस्थिति से प्रभावित होने लगता है, तब साहित्य का मूल्यांकन भी बदल जाता है। तब पुस्तकें पढ़ी नहीं जातीं, उपभोग की जाती हैं। साहित्य अनुभव नहीं, प्रतिष्ठा का हिस्सा बन जाता है। फिर भी इस परिवर्तन को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। लेखक का सार्वजनिक होना अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब है, जब सार्वजनिकता रचना पर हावी हो जाए। यदि कोई लेखक अपने पाठकों तक पहुँचने के लिए नए माध्यमों का उपयोग करता है, तो यह साहित्य की पहुँच को विस्तृत करता है। किंतु यदि लेखक का व्यक्तित्व उसकी रचना से बड़ा हो जाए, तो साहित्य का संतुलन बिगड़ने लगता है।

वास्तव में साहित्य और ब्रांड के बीच मूल अंतर यही है कि ब्रांड विश्वास पैदा करता है, जबकि साहित्य प्रश्न पैदा करता है। ब्रांड चाहता है कि लोग उसे स्वीकार करें। साहित्य चाहता है कि लोग सोचें, चिंतन करें और मनन करें। ब्रांड पहचान बनाता है, साहित्य चेतना का विस्तार करता है। इसलिए साहित्य को पूरी तरह ब्रांड में बदल देना उसके स्वभाव को ही बदल देना होगा।

समय का एक विचित्र सत्य यह भी है कि जो चीज़ें सबसे अधिक चमकती हैं, वे हमेशा सबसे अधिक टिकती नहीं हैं। इतिहास में अनेक ऐसे लेखक हुए, जिनकी लोकप्रियता अपने समय में सीमित थी, लेकिन उनकी रचनाएँ समय की सीमाएँ पार कर गईं। दूसरी ओर अनेक ऐसी साहित्यिक प्रसिद्धियाँ भी रहीं, जो अपने युग के साथ ही समाप्त हो गईं। इसका कारण सरल है। समय अंततः लेखक की छवि को नहीं, उसकी रचना को परखता है।

इसलिए आज प्रश्न केवल लेखकों के ब्रांड बनने का नहीं, साहित्य के केंद्र के बदल जाने का है। जब रचना की जगह छवि और मूल्य की जगह दृश्यता स्थापित होने लगती है, तब साहित्य अपनी सबसे बड़ी शक्ति खोने लगता है। साहित्य का इतिहास बताता है कि समय अंततः लेखक के चेहरे को नहीं, उसके शब्दों को याद रखता है। इसलिए साहित्य को बचाने का अर्थ लेखक को दृश्यता से रोकना नहीं, बल्कि रचना को फिर से केंद्र में स्थापित करना है। यदि हम दृश्यता को मूल्य और प्रसिद्धि को प्रतिभा का पर्याय मानते रहेंगे, तो संभव है कि हमारे पास चर्चित लेखक बहुत हों, लेकिन स्मरणीय साहित्य कम होता जाए।


                      लेखिका: कल्पना मनोरमा 

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