सिक्कों की खनक में खोती हँसी
सिक्कों की खनक में खोती हँसी कल्पना मनोरमा “मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे...” सुमित्रानंदन पंत की यह कल्पना कितनी भोली और निश्छल थी। बच्चा मिट्टी में बीज नहीं, अपने छोटे-से मन के सपने बोने की बात कर रहा था। बचपन में पैसे बोने की यह कल्पना कौतुक और मासूम उम्मीद से जुड़ी थी। आज पैसे कमाने की दौड़ जीवन की एक बड़ी चिंता बन गई है। फर्क इतना है कि तब एक बच्चा सिक्के मिट्टी में छिपाने की कल्पना करता था और आज का मनुष्य मिट्टी झाड़कर अपनी पूरी उम्र धन कमाने में लगा देता है। पाने को शायद हमने बहुत कुछ पा लिया है, लेकिन इस पाने की यात्रा में जाने कितनी आत्मीय चीजें पीछे छूट गई हैं। वह बचपन, जो बिना वजह हँसता था। वह दोपहर, जिसमें पेड़ की छाँव किसी महल से कम नहीं लगती थी। वह पगडंडी, जिस पर चलते हुए जूतों से ज्यादा पैरों को मिट्टी का स्पर्श अच्छा लगता था। वह घर, जहाँ शाम का अर्थ था, सबका एक साथ लौट आना। आज जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि एक ही घर में रहते हुए भी परिवार के लोगों के पास साथ बैठने का समय कम होता जा रहा है। शाम आती है, लेकिन हर व्यक्ति अपने काम, मोबाइल या ...