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चलो राम संसार दिखाएँ

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2023 विजय दसवीं  चलो राम संसार दिखाएँ दुनिया के व्यापार दिखाएँ । चुप रहना बस सुनते जाना , मौन-मुखर के पार दिखाएँ । नाम तुम्हारा लेकर बिकते , लोलुप्ता के द्वार दिखाएँ ।   लंका में था एक दशानन , रावण के परिवार दिखाएँ ।   उज्ज्वल चेहरे  वालों  के , कालिखमय बाजार दिखाएँ ।   गदा,शंख, ध्वनि, लाल दुपट्टा , के अपने अधिकार दिखाएँ । श्रद्धा का ' श ' समझ न पाते , हाथ लिए तलवार दिखाएँ । दुखी हृदय रघुनाथ हुए जो , मानवता की हार दिखाएँ । आप रहो बैकुंठ धाम में , अपनापन करतार दिखाएँ ।।

मुहब्बत की यादें पुरानी लिखें

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  चलो प्रेम की इक कहानी लिखें गुज़री है दिल पर ज़ुबानी लिखें ।।   भले लाख पहरे हमारे लिये हों , मगर हम चलो,सच बयानी लिखें।।   लिखे कोई दरिया या सगार लिखे,   मगर हम  मीठा-सा  पानी लिखें।।   सुमन सूखकर जो गिरे डाल से,   उन्हें  मोंगरा-रातरानी  लिखें।।   भूगोल युद्धों का लिक्खे भले वो   मगर हम सदा ज़िन्दगानी लिखें ।।   सिमटे हुए, दिल के पीले सफ़ों पर   मुहब्बत की यादें पुरानी लिखें ।। मिलें ठोकरें रास्तों पर भले ही   मगर दूसरों को रवानी लिखें।।

मन को कैसे राधा कर लूँ

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  कैसे तुम से वादा कर लूँ , जीवन अपना आधा कर लूँ ।।   कुब्जी प्रीति दिखाओगे तुम   मन को कैसे राधा कर लूँ ।।   सुई रखोगे नश्तर वाली कैसे खुद को धागा कर लूँ ।।   कृपण नियति बाँटोगे जी भर   कम से कैसे ज़्यादा कर लूँ ।।   गूँगे गीत सिखाओगे जब स्वर को कैसे बाजा कर लूँ ।।   लड़-भिड़ बाँटोगे कुनबे जब   चूल्हा कैसे साझा कर लूँ ।।   लूटोगे नित नई पतंगें उनसे जुड़ क्यों मांझा कर लूँ ।।   फक्कड़ सुबह-शाम बाँटोगे   दिन को कैसे राजा कर लूँ ।।  

चेहरे बीच लुनाई आए

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  कैसे बात बनाई जाए चेहरे बीच लुनाई आए।।   कहते-सुनते बीच-बीच में अपनी जगह बचाई जाए।।   नदिया नहर सरोवर में रह मन की भीत उठाई जाए।।   हथियारों के बाज़ारों में कोई ग़ज़ल सुनाई जाए।।   यहाँ-वहाँ की राजनीति में सच्ची नीति बनाई जाए।। रैन बसेरा जग का फेरा अपनी राह सजाई जाए।।   कल्प न बीते विचलन में , मंज़िल एक बनाई जाए।।

सेवक रबड़ी चाप रहे हैं

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  पंछी अम्बर नाप रहे हैं हम दीवारें पाथ रहे हैं ।।   आग जलाकर चौराहों पर हिम्म्मत वाले ताप रहे हैं ।।   गलती करने वाले ही ख़ुद बेकुसूर को श्राप रहे हैं।।   प्रहरी जनता के बनकर वे   ख़बर भेद की छाप रहे हैं ।।   कोरी शान बचाने को , कुछ गिद्ध , मंत्र को जाप रहे हैं ।।   शाही खर्चे पर धरना धर सेवक रबड़ी चाप रहे हैं ।।   सच को फाँसी देने वाले हरिश्चन्द्र के बाप रहे हैं ।।  

ख़ुद से सच्चे वादे रखना

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तन पर कपड़े सादे रखना मन को अपने साधे रखना ।।   बिगड़ी बात बनानी हो-जो   ख़ुद से सच्चे वादे रखना ।।   पड़े ज़ोर यदि सच कहने में मुँह पर अपने ताले रखना।।   टेढ़ा होकर समय डराए हिम्मत के तुम भाले रखना ।।   सीख रहा है बचपन तुमसे ख़ुद को तप में ढाले रखना ।।   पड़े सामना अपनों से जब अपने होश सम्हाले रखना ।।   भले ‘ कल्प ’ निस्सार गए हों , आस हृदय में पाले रखना ।।

पक्के मन का कच्चा चिट्ठा

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  पेंटिंग : प्रयाग शुक्ल  Sharing a painting I did recently.Untitled : 5.6 "× 8 ", acrylic on paper : prayag shukla आ. प्रयाग शुक्ल जी ने इस पेंटिंग का शीर्षक नहीं दिया है इसलिए मैं इसे "जेल प्रेयर्स" शीर्षक से लिख रही हूँ. आशा है पसंद आये... ***************************************** पक्के मन का कच्चा चिट्ठा- तुम जो अविरल मुस्कुराती हो , मुझे क्यों गुनगुनाहट महसूस नहीं होती अब ? क्यों में तुम्हारे बाद या तुमसे अलग जीने का अभिलाषी होता जा रहा हूँ ? जबकि हम उस चरागाह में कभी गए ही नहीं , जहाँ गायों को दूध बढ़ाने के लिए ग्वाला चराता है. न ही हमने उस दर्पण को देखने की कभी कोशिश की जिसमें हमारी तस्वीर की ओट में तुम छिपी दिखो। भरी नींद में भी हमारी चादर को अपनी ओर नहीं घसीटा। हमारे तुम्हारे बीच पुल का निर्माण हमने अपनी स्वेच्छा से किया था. फिर ये काँपता क्यों रहता है ? हम इस पार से उस पार तक की यात्रा में सहज क्यों नहीं हो पाते हैं ? हमारे मन के कपाट असमय क्यों खुलते और बंद होते रहते हैं. जबकि हमने अपने सपनों में माता-पिता के साथ घर को देखा , परिवार को देखा और जब तुम...