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जलक्रीड़ा

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ऐसा नहीं  स्वाद उसका भी बिगड़ता है   वह भी परखती है स्वाद अपना  थोड़ा-सा साबुन चख कर उतर जाती है जब साबुन की तैलीय तिक्त गंध   उसके नथुनों से होते हुए  जिस्म में   वह लोहे की बड़ी बाल्टी में भरे  काई लगे जल में  डुबो देती है अपनी परछाईं  जब तक धोती है वह  दिन-रात के गहरे दागों को अपने शरीर से  उसकी परछाईं करती है जलक्रीड़ा.

सब्ज़ीवाला

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सब्ज़ीवाला आया था  ठेली भरकर   ताज़ी सब्ज़ी लाया था  हरे-भरे धनिया के साथ   मुँह बंद किये  कुछ गोभी सोये भी थे  उसकी ठेली पर  आँख पनीली करने वाली   मिर्ची सुइया थी उसकी थैली में   सब्ज़ी ले लो! आवाज़ भी लगाता है  रोज ही सब्जीवाला  इस  झुग्गी बस्ती में आता है  झुग्गी का दरवाज़ा खुलता भी है   कला लपक कर उसकी ओर बढ़ती भी है  हरा धनिया और नींबू  आहा!  पनीला चटकारा लगाकर  वह कहती भी है     किन्तु  उसकी डलिया चुनती है   सिर्फ़ बूढ़ी खाल वाले  चार आलुओं को  सब्ज़ी वाला चला जाता है  कम आमद के साथ कल फिर आने को  कला खोलती भी है बटुआ कल के लिए  पर चुनाव जानता है अपना कर्तव्य  कल भी चुनेगा वह  सिर्फ चार आलुओं को   कला की रसोई के लिए  बंद कर मुँह बटुए का  चली जाती है कला  सेंकने ख़ुद को तवे पर  बिना नमक .

कैमरे की आँख

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  कैमरे की आँख होती है   बहुत ही चालू! अक्सर  कहते हैं  लोग  लेकिन देखा जाये तो   कहाँ पकड़ पाती है  वह बेचारी  हमारे सच्चे दुखों को   अनकही   खोखली मुस्कानों में  देखा है  सबने उसे  फँसते हुए!   दरअसल कैमरे की आँख के  भीतर  छिपकर  बैठा होता है  हमारा ही  दुःख   जो ख़ुशी की आँख बचाकर  हुंकारता है जब बेरहमी से   तो दुम दबाकर दर्द  सिलने लगता है   अपना पुराना गूदड़ जो मिला होता है विरासत में   दुनिया की हर स्त्री को मुस्कानें सेल्फी वाली   रचती होगीं  अल्पनाएं   पवन में उड़ते भोज पत्रों पर जो कभी नहीं आते हैं  हमारे गलियारों तक मुस्कान-ए-सेल्फी    किंचित छू   नहीं पाती है   दिलों को  और ऐसे  उस बेचारी से  छूट ही जाता है  हर बार कुछ न कुछ अनदेखा स्त्री की आँख में. ***  

मिस्टर लेट-लतीफ़

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देर रात तक फेसबुक पर आप खुले रहते हैं जब टोको उनको तो कहते हैं हम बेहद व्यस्त रहते हैं धक्के देने पर भी नहीं खुलती हैं आँखों उनकी कहते हैं कि वे तो सदैव चिंतनशील रहते हैं घर को उठाए रहते हैं सर पर जब होते हैं घर पर कहते हैं बस बीवी की वजह से ही ये ड्रामे होते हैं । घर का खाना उन्हें भाता नहीं कभी बर्गर कभी पिज़्जा कभी चिप्स खाते हैं कहते हैं कार्यों में दबे हैं इतने कि बस इन्हीं से काम चलाते हैं । सूट-बूट टाई में खुद को हर पल सजाए रखते हैं कहते हैं हम जमाने के साथ चलते हैं टोक देता है जब अफसर उनका पहुंचने पर देर से दफ्तर भड़क उठते हैं आप और शान से कहते हैं कि चलाते हैं दफ़्तर हम लोगों बेमतलब ही हमें मिस्टर लेट कहते हैं।  ***

स्त्रीत्व के सर्वोच्च शिखर पर मातृत्व !

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चिंतनशील परीक्षित  पल पल दिल के पास तुम्हारा बचपन रहता है. प्यारे बेटे! आज तुम्हें सफेद कुर्ते में क्लास लेते देखकर पहले तो मुझे तुम्हारा वो मलमल का सफ़ेद झबला याद आया जिसको मैंने तुम्हारे जन्म से पूर्व सिला था. उस दौरान तुम्हारी छवि मेरी कल्पना में हर पल काँपती रहती थी किंचित बन नहीं पाती थी. हाँ, उत्सुकता बहुत थी कि आने वाला मेरा बच्चा कैसा होगा? तब तो नहीं पता चला था कि तुम बड़े होकर कैसे दिखोगे लेकिन अब साफ़ दिखने लगा है कि तुम्हारी छवि की गढ़न में ईश्वर को तुम्हारे डैडी और चाचा को कई-कई बार देखना पड़ा होगा. तुम उन्हीं दोनों की प्रतिच्छाया लगते हो. खैर,नवान्कुत शिशु के आगमन पर अपने भीतर आकार ले रही माँ से मैं प्रतिपल बातें करती रहती थी. फिर एक दिन ऐसा आया कि तुम मेरी गोद में आ गये.और मैं स्त्रीत्व के सर्वोच्च शिखर मातृत्व पर, माँ बनकर खड़ी हो गयी थी. कौसल्या की गोद जब राम आये होंगे तब हर्ष हुआ होगा. ठीक उसी तरह मेरे दिन-रात खुशहाल हो नाच उठे थे. मेरी जीवन-गाड़ी में एक भव्य शिशु का आगमन हो गया था. उसकी किलकारियों में मेरे भीतर की माँ ने लोरी गाना सीखा. मैं बेटी, बहू, भाभी जैसे सुमधुर स...

नवगीत में यथार्थ की ख़ोज उपन्यास की तरह नहीं की जा सकती.

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  नवगीत में यथार्थ की ख़ोज उपन्यास की तरह नहीं की जा सकती- डॉ. इंदीवर  प्रख्यात समीक्षक डॉ. इन्दीवर पाण्डेय से कल्पना मनोरमा की बेबाक बातचीत।                                                                             कल्पना-  कविता को किस आधार पर सार्थक माना जाए? कविता की आलोचना में सामाजिक यथार्थ की खोज क्या उपन्यास और कहानी की तरह हो सकती है ? इंदीवर- कविता में भाषिक संरचनाएँ उपन्यास और नाटक से अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। भाषिक संरचनाओं के विश्लेषण के अभाव मैं कविता की व्याख्या मुश्किल होगी। साहित्य के समाज विज्ञान मैं किसी कला कृति की उत्पत्ति की परिस्थितियों और उसके परवर्ती प्रभावों का ही विवेचन होता ह...

मन से रहती सदा सफ़र में

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  भरम जाल में भूला मौसम तुम भी सावन वापस जाना।।   नदी संस्कृति वाली सूखी , गए सूख मन ताल पोखरे मेंहदी वाली सूखी यादें हैं नयन कटोरे भरे-भरे   नहीं सुभीते हरियाले अब उत्सव तुम ओझल हो जाना।।   बादल बने डाकिए फिरते   बिना पते की चिट्ठी लेकर मीलों चल आते दरवाज़े जाते खाली गागर देकर   तने धनुक नभ कुंठाओं के अवनी तुम भी रंग छिपाना।।   कैसी होगी सरहद उसकी जिस धरती ने सौंपा बाना मन से रहती सदा सफ़र में लेकिन मिलता नहीं ठिकाना    पूजा विनती साँझ-सकारे उर में थोड़ी धीर बंधाना।। ***