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मिस्टर लेट-लतीफ़

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देर रात तक फेसबुक पर आप खुले रहते हैं जब टोको उनको तो कहते हैं हम बेहद व्यस्त रहते हैं धक्के देने पर भी नहीं खुलती हैं आँखों उनकी कहते हैं कि वे तो सदैव चिंतनशील रहते हैं घर को उठाए रहते हैं सर पर जब होते हैं घर पर कहते हैं बस बीवी की वजह से ही ये ड्रामे होते हैं । घर का खाना उन्हें भाता नहीं कभी बर्गर कभी पिज़्जा कभी चिप्स खाते हैं कहते हैं कार्यों में दबे हैं इतने कि बस इन्हीं से काम चलाते हैं । सूट-बूट टाई में खुद को हर पल सजाए रखते हैं कहते हैं हम जमाने के साथ चलते हैं टोक देता है जब अफसर उनका पहुंचने पर देर से दफ्तर भड़क उठते हैं आप और शान से कहते हैं कि चलाते हैं दफ़्तर हम लोगों बेमतलब ही हमें मिस्टर लेट कहते हैं।  ***

स्त्रीत्व के सर्वोच्च शिखर पर मातृत्व !

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चिंतनशील परीक्षित  पल पल दिल के पास तुम्हारा बचपन रहता है. प्यारे बेटे! आज तुम्हें सफेद कुर्ते में क्लास लेते देखकर पहले तो मुझे तुम्हारा वो मलमल का सफ़ेद झबला याद आया जिसको मैंने तुम्हारे जन्म से पूर्व सिला था. उस दौरान तुम्हारी छवि मेरी कल्पना में हर पल काँपती रहती थी किंचित बन नहीं पाती थी. हाँ, उत्सुकता बहुत थी कि आने वाला मेरा बच्चा कैसा होगा? तब तो नहीं पता चला था कि तुम बड़े होकर कैसे दिखोगे लेकिन अब साफ़ दिखने लगा है कि तुम्हारी छवि की गढ़न में ईश्वर को तुम्हारे डैडी और चाचा को कई-कई बार देखना पड़ा होगा. तुम उन्हीं दोनों की प्रतिच्छाया लगते हो. खैर,नवान्कुत शिशु के आगमन पर अपने भीतर आकार ले रही माँ से मैं प्रतिपल बातें करती रहती थी. फिर एक दिन ऐसा आया कि तुम मेरी गोद में आ गये.और मैं स्त्रीत्व के सर्वोच्च शिखर मातृत्व पर, माँ बनकर खड़ी हो गयी थी. कौसल्या की गोद जब राम आये होंगे तब हर्ष हुआ होगा. ठीक उसी तरह मेरे दिन-रात खुशहाल हो नाच उठे थे. मेरी जीवन-गाड़ी में एक भव्य शिशु का आगमन हो गया था. उसकी किलकारियों में मेरे भीतर की माँ ने लोरी गाना सीखा. मैं बेटी, बहू, भाभी जैसे सुमधुर स...

नवगीत में यथार्थ की ख़ोज उपन्यास की तरह नहीं की जा सकती.

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  नवगीत में यथार्थ की ख़ोज उपन्यास की तरह नहीं की जा सकती- डॉ. इंदीवर  प्रख्यात समीक्षक डॉ. इन्दीवर पाण्डेय से कल्पना मनोरमा की बेबाक बातचीत।                                                                             कल्पना-  कविता को किस आधार पर सार्थक माना जाए? कविता की आलोचना में सामाजिक यथार्थ की खोज क्या उपन्यास और कहानी की तरह हो सकती है ? इंदीवर- कविता में भाषिक संरचनाएँ उपन्यास और नाटक से अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। भाषिक संरचनाओं के विश्लेषण के अभाव मैं कविता की व्याख्या मुश्किल होगी। साहित्य के समाज विज्ञान मैं किसी कला कृति की उत्पत्ति की परिस्थितियों और उसके परवर्ती प्रभावों का ही विवेचन होता ह...

मन से रहती सदा सफ़र में

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  भरम जाल में भूला मौसम तुम भी सावन वापस जाना।।   नदी संस्कृति वाली सूखी , गए सूख मन ताल पोखरे मेंहदी वाली सूखी यादें हैं नयन कटोरे भरे-भरे   नहीं सुभीते हरियाले अब उत्सव तुम ओझल हो जाना।।   बादल बने डाकिए फिरते   बिना पते की चिट्ठी लेकर मीलों चल आते दरवाज़े जाते खाली गागर देकर   तने धनुक नभ कुंठाओं के अवनी तुम भी रंग छिपाना।।   कैसी होगी सरहद उसकी जिस धरती ने सौंपा बाना मन से रहती सदा सफ़र में लेकिन मिलता नहीं ठिकाना    पूजा विनती साँझ-सकारे उर में थोड़ी धीर बंधाना।। ***

रखना मन का मोल

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सीधा बनने में सदा रहे एक नुकसान गुरु तो गुरु , लघु भी नहीं करते हैं सम्मान. विनयशील कहता नहीं   अपने मन का भार   हृदय उज्जडे समझते   मन से है लाचार. छोड़ा जब से भौंकना भूल गया संसार   तभी नहीं है छोड़ता   विषधर निज फुंकार.   कड़ुए फल रहते अमर   मीठे बनते भोग अति का सीधापन रहा   जी का निर्मम रोग.     कानन में खोज़े गये   सीधे-लम्बे ताड़   टेढ़े थे जो आप में   बिहँसे छिपकर आड़.   स्वाभिमान के हाथ में   रखना मन का मोल   कह देना जो सत्य है   अपना हिरदय खोल.   ***      

लिप्सा जो अमरत्व की

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  कस्तूरी   कानन   बसे , सोना   गृहे  सुनार। काया कंचन कांच की ,  भूली क्यों गुलनार।।   दिवस डूबता रंग में ,  उगता लेकर रंग। फिरता फिर क्यों भटकता  भूषित भ्रमित कुरंग ।।   रहे सुनहरा आवरण भोर-सांझ के पास  रजनी के मन कालिमा नर खोजे विश्वास ।।    सब जाते अवसान में ,  कुटी, सदन,प्रासाद । लिप्सा जो अमरत्व की मन का वह अवसाद।। दिवस कहेगा मैं बड़ा  रजनी भवें कमान  बचा अबोला आदमी  कैसे भरे उड़ान ।। ।। ***