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धरा की गोद में

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  सूर्य की किरण मिली तो जग रही हूँ मैं कि जैसे जग रहा हो एक बीज आसमान के तले , मचल , धरा की गोद में।   आँधियों से लड़ सकूँ जो धूप में डटी रहूँ कि बारिशों में भीगकर खड़ी रहूँ, विशाल पेड़ की तरह अडिग , धरा की गोद में।   कि शत्रुओं से भय न हो तो मित्र से बंधू नहीं डगर नई कदम नए , दौड़ती सदा रहूँ मैं सिंहनी के मार्ग पर विरल , धरा की गोद में।। ***  

मान्यताओं की आँच

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चित्र : अनुप्रिया  " आओ संतो! आज कहाँ से सूरज निकल पड़ा ?" धनक सिलाई मशीन रखे कपड़े सिल रही थी , बोली। " अरे जिज्जी! मरने की भी फुरसत ना मेरे कों। ” संतो ने बिटिया का कुरता धनक की ओर बढ़ाते हुए कहा। " ऐसी कहाँ से नोटों की पौ फट पड़ी है तेरे घर जो व्यस्त हो गयी ?" धनक ने सुई में धागा डालते हुए कहा। “ जिज्जी , मेरी सास नाती की मेंड उठावे गंगा जी नाहवे जा री है। ” संतो ने साफई दी।   " सास जा रही है ?” “ हाँ जिज्जी! ”  “ तो तूने क्यों उठना-बैठना तज दिया ?” धनक ने खरखराते हुए मशीन चला दी। " जिज्जी सो तो तुम सही कह रही हों लेकिन मेरी सास के प्राण मायके में बसते हैं। बस दाल , अचार , बड़ी , पापड़ बना-बनाकर मर री हूँ मैं। " संतो ने साड़ी का पल्ला सिर पर सहेजते हुए कहा।   " इसका मतलब तेरी सास मायका घूमने जा रही है। " मुस्कुराते हुए धनक ने तंज कसा। " हाँ जिज्जी , ऐसा ही समझ…। " " तो सास से भी थोड़ा बहुत काम ले लिया कर संतो। " " ना जिज्जी उनके छोरा से तो आप मिली ही हों ?" “ हाँ तो। " ...

चिड़िया का कहना सुनो

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" सदियों से चली आ रही परंपराओं में से बेजान परंपरा की  एक सूखी पत्ती  निकालकर फेंक सको, और अपनी पसंद की हरी पत्तीनुमा जाग्रत परंपरा जोड़ सको तो आओ , बुनें घोंसला अपने लिए। " चिड़िया ने कहा। " किसी को भी लग सकता है कि मनुष्य घोंसले में रहता है। लेकिन नहीं , वह अपने हाथ से बनाए घोंसले में नहीं , अपितु अपने मन के द्वारा विचारों से बने घोंसने में नितांत अकेला रहता है। उस घोंसले को बनाते हुए वह कितना विचलित या तटस्थ रहा , उसके बोलने - बताने और आचार-विचार प्रकट करने से वह दिखता है। ईंटों के मकान से निकलकर आदमी कहीं छिप भी सकता है लेकिन विचारों में प्रकट होकर छिपना मुश्किल है। " चिड़िया आसमान की ओर देखकर बुदबुदाई। " आओ , पुरानी घिस चुकी परंपराओं को पुनर्नवा कर नई परंपराएं गढ़ें। " चिड़िया का कहना, डाल ने सुना , सुना पेड़ , फूल , फल , आकाश , सूरज और मौसम ने। चिड़िया की करनी और कथनी में समानता भी थी लेकिन मनुष्य विकास वाला खरगोश पकड़ने की जल्दी में दिखा। ***  

दिव्या माथुर की कविताओं में मानवीय चेतना के संघर्षों की आँच

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कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में एक स्थापित हस्ताक्षर दिव्या माथुर समकाल की चर्चित कवयित्री भी हैं। नई कविता की टकराहटें हों या छंदबद्ध गीतों की मधुर तानाकशी, छोटी बड़ी बहर की ग़ज़लें या नज़्में , उनके अपने मौलिक व भावनात्मक बिम्ब-प्रतीक पाठक-मन को सहजता से आंदोलित करने में सक्षम हैं। उनके सात कविता संग्रह: ‘अंतःसलिला’,’रेत का लिखा’, ’ख़याल तेरा’, ‘11 सितम्बर: ‘सपनों की राख तले’, ’चंदन पानी’, ‘झूठ, झूठ और झूठ’, ‘हा जीवन हा मृत्यु’ (ई-संग्रह) और ‘सिया-सिया’ ( बाल -कवितायें) जैसी कृतियों में संग्रहित कविताओं को पढ़कर खुरदुरे यथार्थ के सत्य को आच्छादित होते हुए देखा और महसूस किया जा सकता है।  जिस प्रकार ज्ञान-कर्म-अर्थ हमारे अन्न हैं। उसी प्रकार कर्म का मौलिक रूप गति तत्व होता है। इसी के द्वारा निर्जीव व सजीव दोनों तत्वों के जीवित रहने का बोध जिस प्रकार साधारण इंसान को होता है, उसी प्रकार कवि को लगातार होता रहता है। किसी के द्वारा कविता करना माने अपने बाहर-भीतर जमी कठोरता को त्याग देना होता है। इतना भावपूर्ण कार्य, भावनाविहीन व्यक्ति कर ही नहीं सकता। कविता की गुणवत्ता पहचानने वाले से पूछो...

पीली चिड़िया

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खिड़की से आती संघ्या की अंतिम किरण प्रभा को उदास कर रही थी। उसने फिर से किताब उठाकर अपनी पसंदीदा कविता  ‘ आज की स्त्री ’  पढ़नी चाही।   " स्त्री कूटती आई है/ ख़ुशी के धान/ अँधेरे की ओखली में…! "  पंक्ति के अर्थ में प्रभा को अपना और अपनी माँ का भूला-सा जीवन याद आने लगा। उसकी उदासी मिटने के बजाय बढ़कर सातवें आसमान तक जा पहुँची। “ जिन बातों की पर्देदारी में मैंने अपना जीवन हवन कर दिया। लेखिका ने खुलेआम लिख दिया ?  जबकि स्त्री और पीड़ा का चोली-दामन का साथ है। वह जा भी कहाँ सकती है ?”  अवसाद में जकड़ी रहने वाली प्रभा अब निश्चेष्ट हो नकारात्मकता की नदी में बह चली थी।   " निरी बेवकूफ हो गई हैं आज की कवयित्रियाँ। "  अचानक तुनक कर प्रभा बुदबुदाई और उसका क्रोध इतना बढ़ता चला गया कि उसके दिमाग़ की नसें तड़कने लगीं। अपने इर्द-गिर्द घिरे रहने वाले सन्नाटों में वह खो जाती मगर उसकी कलाई पर तेज़ चुभन का उसे एहसास हुआ।   “ क्या मेरे जीवन की चुभन इतनी बढ़ चुकी है कि वह कहीं भी और कभी भी महसूस होने लगे ?”  उसके अचेतन में एक प्रश्न कौंधा और ध्यान उस हाथ की ओर चला गया...

मानवीय अपेक्षाओं-उपेक्षाओं की कहानियाँ

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  अभी हाल ही में मैंने सुधांशु गुप्त का कहानी संग्रह ' उसके साथ चाय का आखिरी कप ' पढ़ा जो काफी चर्चित रह चुका है। इन कहानियों में एक ऐसा झरोखा है जो अनवरत खुला रहता है। उसी से झांकते हुए लेखक जीवन का स्थाई भाव उदासी और मेहमान सरीखे उल्लास को अपनी वैचारगी से देखता रहता है। इस संग्रह की कहानियों में कई एक प्रेम कहानियाँ भी हैं। लेकिन उन कहानियों में जो कथा नायक प्रेमी है , वह उच्छृंखलतापूर्ण रवैया नहीं अपनाता। वह जीवन-प्रेम के प्रति उत्सुक तो है लेकिन किसी भी प्रकार से स्त्री प्रेमिका को ठगता या ‘ चीट ’ नहीं करता है। उसके लिए प्रेम इत्मिनान है , वह मानव मूल्यों को संजोकर चलने में विश्वास रखता है।आपकी कहानियों की भाषा , बिंब , प्रतीक और सौन्दर्यबोध दुरूह नहीं है।   इस संग्रह की ही नहीं , आपकी ज्यादातर कहानियाँ छोटे आकार की होती हैं लेकिन लेखक जिस मुद्दे को अपनी कहानी में उठाता है , वह मुकम्मल और वैचारिक रूप से ज़ोरदार होता है। किसी मामूली-सी बात को उठाकर कहानी में ढाल देना आसान नहीं लेकिन सुधांशु गुप्त इस कला में सिद्धहस्त हैं। उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए लगेगा कि कहानी का विषय क्य...