धरा की गोद में

 


सूर्य की किरण मिली

तो जग रही हूँ मैं

कि जैसे जग रहा हो

एक बीज

आसमान के तले,

मचल, धरा की गोद में।

 

आँधियों से लड़ सकूँ

जो धूप में डटी रहूँ

कि बारिशों में भीगकर

खड़ी रहूँ,

विशाल पेड़ की तरह

अडिग, धरा की गोद में।

 

कि शत्रुओं से भय न हो

तो मित्र से बंधू नहीं

डगर नई कदम नए,

दौड़ती सदा रहूँ

मैं सिंहनी के मार्ग पर

विरल, धरा की गोद में।।

***

 

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