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सुनो स्त्री!

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  थरथराता हुआ उजाला उतरा जब आसमान से पेड़ ने साध लिया पहले कंधों पर फिर धीरे से उतार दिया धरती पर जैसे झुनझुना पकड़ा कर सुला देती है पालने में शिशु को पनिहारिन माँ तूफान में कांपते विकल पेड़ों को थाम लेती है पृथ्वी जैसे बरसाती आवारा बूंद को पी लेती है अधचटकी सीप सुनो स्त्री! तुम किसके बल बूते हंसने की हिम्मत जुटाती हो ? न न न बताना मत! मौलिकता का अपहरण हो जायेगा मैंने तो सिर्फ प्रश्न पूछकर तुम्हें , तुम्हारा होना याद दिलाया है जैसे रोटी नहीं बनी है क्या ? पूछकर मां से याद दिला देते थे बाबा मुझे , भूख की उत्तर की मारकता प्रश्न के विस्तार में निहित है तुम्हें चौकन्ना रहना होगा।

खिड़की

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  जब जब होती हूँ उदास चुपचाप चली आती हूँ  खिड़की के पास खिड़की मुझे समझाती नहीं, बस दिखलाती है कहीं दूर किसी सख्त डाल पर नए अंकुरों को फूटते हुए कोमल अंकुर में छिपी मजबूत पत्तियाँ  नहीं देखती जमीन को वे पलकें उठाये  मचलती हैं ऊपर की ओर  मुझे याद आता है वह गमला जिसमें छिपाए होते हैं  मैंने  मुट्ठी भर मिर्ची के बीज  लौटकर देखती हूँ तो  बीजों के अस्तित्व को उगा पाती हूँ  मिर्ची के बीज अब बीज नहीं  बन चुके होते हैं खोल वे  नवांकुरित तने से लगे ऐसे  लटकते हैं  जैसे मुर्गे की गर्दन में लटकती है  पत्तेनुमा  लाल झालर  क्या उगना शाश्वत है ? क्या उगने की चाहत में तीखापन हो जाता है विसर्जित  मैंने पूछा  हवा के साथ खिड़की बोली उगना ही जीवन की मिठास है!  ***

वह चिड़िया क्या गाती होगी

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" वह चिड़िया क्या गाती होगी ?" प्रतिभा कटियार की नवलोकार्पित कृति Bodhi Prakashan से कुछ समय पूर्व प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक का शीर्षक प्रश्नाकुलता लिए हुए है। हम में से जो भी अपने बचपन में अति संवेदनशील रहा होगा उसने एक न एक बार ये प्रश्न हवा में उछाल कर ज़रूर पूछा ही होगा कि दूर नीम की डाल पर या घर की मुंडेर पर वह जो चिड़िया मटक मटक का चूं चूं चूं कर रही है , आख़िर वह क्या गाती होगी ? पंछियों की बोली हम जान पाते तो न जाने प्रकृति के कितने रहस्यों से रू ब रू हो सकते थे। खैर , प्रतिभा जी ने ये पत्र महामारी के घोर त्रासद समय में अपना गुबार उगलने या आसुओं को शब्दों में समेटने के दौरान लिखे हैं। इस बात को मद्दे नज़र रखते हुए जब सोचती हूं तो लगता है कि लेखिका ने चिड़िया को जीवन के प्रतीक में लिया होगा क्योंकि जिस समय लेखिका इस कृति को रच रही होगी उस समय सड़क , घर , अस्पताल , पगडंडियों और न जाने कहां कहां जीवन बेकल हो चिचिया रहा था। कहीं चिड़िया की तरह बोलते हुए जीवन को प्रश्रय भी मिला तो कहीं तड़पते हुए प्राण गंवाते हुए भी देखा गया। लेकिन जब जब उस मनहूस समय के चंगुल में ...

लैटर बॉक्स!

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बीसवीं सदी में कभी लैटर बॉक्स! ये डिब्बा सिर्फ़ डिब्बा न होकर सुख और दुःख बाँटने वाला देव दूत माना जाता थ। जब से इसका जन्म हुआ होगा इसने बड़े निर्लिप्त भाव से अपनी ओर लोगों के बढ़ते हुए हाथों को और ताकते हुए हज़ार-हज़ार आँखों को देखा होगा। घुड़सवारों के हाथ संदेश पहुँचाना, कबूतरों के पंजों में चिट्ठियाँ बाँधकर अपने प्रिय तक संदेश पहुँचाना, लैटर बॉक्स वाली प्रक्रिया से निश्चित ही दुरूह रही होगी। तभी किसी ने सही कहा है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। इस डिब्बे के बारे में कितनी सुंदर कल्पना की होगी किसी ने। खैर अब अगर डिब्बे की मन की बात कहें तो जब इसका पेट चिट्ठियों से भर जाता था तो कभी-कभी पत्रों के ताप से इसका माथा तपने लगता था। राजनैतिक पत्रों से इसे बदहजमी जैसी शुबा होने लगती और प्रेम पत्रों से जब इसे गुदगुदी होने लगती थी तब ये चाहता था कि कब पोस्टमैन आए और ताला खोलकर इसका मन हल्का कर जाए। वैसे ताला खोलने का इंतज़ार सिर्फ़ इसे ही नहीं , लोगों को भी बड़ी बेसब्री से हुआ करता था। और जैसे ही लाल डिब्बे का दरवाजा खुलता था डाकिया बाबू डाक को काँधे पर लटकाकर चल पड़ते थे। जिसका ज...

तुम प्रमुख हो पिता

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  भोर के सांवले धुंधलके में आज़ भी जब खुलती है  अलसाई आँख मन तुम्हारे पास ही दौड़ा चला जाता है पिता! सिर्फ़ एक बात कहना चाहती हूँ जिस तरह हमारे हाथों से अनछुआ बचा रह जाता है नीला आसमान ठीक उसी तरह तुम क्यों प्रतीत होते हो पिता! जबकि तुम तो ज़मीन पर सदा हमारे पास होते हो पिता ! फिर भी...........! पर कुछ भी हो जाए हमारे होने में तुम प्रमुख हो पिता !! ...  

तुम्हारी यादें

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  ओ प्यारे मुरशिद!! ज़रा ठहर जाना उस मोड़ पर जहां रुक कर की थीं हमने बातें , शीशम के दरख्तोंं से तुम ये कतई मत समझ लेना कि मैं तुम्हारे गंतव्य में बाधा बनूँगी नहीं!बिल्कुल नहीं मैं लौटाने आ रही हूं बस तुम्हारी यादें जिन्हें तुम भूल गए हो शाम कॉफी पीते वक्त मेरे घर के कैफेटेरिया में पड़ी वैंत वाली उस गोल मेज़ पर जिस पर रखा है तुम्हारी पसंद का क्रिस्टल वाला ऐश ट्रे सुनो! मैंने तुमसे सिर्फ़ एक सिगरेट मांगी थी ताकि तुम्हारी गिनती की सिगरेटों में से कर सकूं एक कम लेकिन तुमने तो यादों का पुलिंदा ही खिसका दिया आँख बचा कर नन्हें गुलदान की ओट में तुम क्या सोचते हो वस्तुएं तुम्हारी चुगली न करेंगी खैर छोड़ो अब इन धड़कती यादों पर मेरा कोई अख़्तियार नहीं इन्हें तुम्हारे पास होना ही उचित होगा इसलिए कहती हूं ठहर जाओ कि मिल सके मुझे रूहानियत भरा सुकून।  ***

गरीब की सम्वेदनाएं

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  दुत्कारना! नहीं नहीं ये शब्द शोभा नहीं देते सही शब्दों में उसे नजरंदाज करना , कभी खैर कुशल न पूछना उसके घर आई खुशियों में , मन से शामिल न होना ही कहना उचित होगा लेकिन एक गरीब उसके दिए चंद सिक्कों की खनक में क्यों भूल जाता है अपने जीवन की सारी जहालत और निछावर कर देता है देनदार की झूठी मुस्कान पर अपने ईमान को जबकि देने वाला होता है अब भी चारों खाने सचेत कुछ भी अपना देते वक्त जल्द ही भुनाएगा वह अपना दिया दरअसल अपने वक्त और मिजाज़ के अनुसार , बेरहम देनदार जानकर उसकी पोल ख़रीद रहा होता है अपने लिए असल हमदर्दी , अपने प्रति लॉयल्टी और सामाजिक सरोकारों में अपनत्व भरी खुशामद गरीब की लेकिन गरीब क्यों नहीं रख पाता है बेरुखी याद उसकी जिसने परोसी होती है बीते वक्त में हर संभव अवहेलनाएं उसके प्रति दरअसल दूरदर्शी मदद करने वाला व्यक्ति पैसों की चमक दिखाकर उसकी मदद नहीं , सही मायनों में ठग रहा होता है गरीब की सम्वेदनाएं ।  ***