Posts

प्राचीर से

Image
  प्राचीर से जो उग रहा , वह प्राण प्यारा है रश्मियां सुरभित सलोनी रूप न्यारा है पवन वासंती बहेगी खोलकर अब केश अपने भुवन दमकेगा नदी और सर किनारा है।

खेल

Image
किसी ने कहा,जीवन खेल है हमने खेल को जीवन समझ लिया दिन के आरण्यक में खोजने लगे हम भूख की डाल पर तृप्ति के फूल अकेले रहकर खुद से आँख मिलाना कठिन लगा तो हमने भीड़ को चुन लिया और कबीलों में खो गए लड़ने लगे दिन से लोगों को वह खेल लगा हमने खेल में खो दिया खुद को   खेल स्थगित करता गया हमारा रोना तो हम हँसते गए खुद पर और ज़िंदा बच गए। ****

खुद से मिलो

Image
  समय रहते पहचान लो अपनी कीमत नहीं तो कोई चीन , कोई जापान उठा ले जायेगा तुम्हारा बुद्ध किसी पेड़ के नीचे पड़े आम की तरह और तुम रह जाओगे बनकर बुद्धू   प्रेम प्रयोगों में नहीं प्राप्तियों में निहित है प्रेम कहता है कहीं भी जाओ अपने साथ मन ,  प्राण ,  आत्मा को ले जाओ इनके बिना शरीर काम नहीं करता किसी और से मिलने से पहले खुद से मिलो जैसे पानी से पानी ,  बादल से बादल , धूप से धूप ,  रंग से रंग खुशबू से खुशबू मिलती है अपने को मत छोड़ो किसी और के सहारे उठाओ हाथ आसमान की ओर और छू लो अपना माथा जहां आज भी रखा होगा माँ का एक गुनगुना चुंबन उठाकर प्रेम को वहाँ से मल लो अपनी आँखों पर ताकि देख सको दुनिया को ज्यादा प्रेम से पहचान सको कीमत उसकी जो हमेशा मौन रहा , नदी के बीच , नदी की तरह।  ***  

जहाँ तेरी ये नज़र है…

Image
ट्रेन को शाम-सात बजे कानपुर रेलवे स्टेशन पहुँचना था , पहुँची सुबह तीन बजे। किसी को लेने आने के लिए पहले ही मना कर चुकी थी और स्टेशन पर बैठने का मन नहीं था सो बाहर निकलकर देखने लगी। ऑटो-गाड़ियों में ड्राइवर ऊँघ रहे थे। थोड़ी ऊहापोह के बाद मैंने एक ऑटो वाले से चलने के लिए कहा। बड़ी मुश्किल से वह बीस रुपए ज्यादा लेकर चलने को तैयार हुआ। थोड़ी देर में रिक्शा जैसे ही सड़क पर पहुँचा , अँधेरे ने चारों ओर से मुझे जकड़ लिया। कानों में अँधरे की सांय-सांय बज उठी। छाती में डर थरथरा उठा तो अनेक प्रकार की दुश्चिंताओं ने मुझे घेर लिया। "रिक्शा वाला कहीं मु स ल मा…..तो नहीं ?" विचार आते ही व्याकुलता चर्म सीमा लाँघने लगी। समझदारी ने हाथ खड़े किए तो एक युक्ति सूझ गई। "हेलो इंस्पेक्टर साहब! थाना चकेरी!" अपने ख़याली भाई को झूठमूठ का इंस्पेक्टर बनाकर फ़ोन लगा मैं अभिनय करने लगी। "........" "अरे क्या बताएँ , गाड़ी सात घंटे बिलंब से अभी-अभी स्टेशन पहुँची है , घर जा रही हूँ।" "......." "किससे जा रही हूँ ? ऑटो-रिक्शा से।" "........." "आपकी ग...

धरा की गोद में

Image
  सूर्य की किरण मिली तो जग रही हूँ मैं कि जैसे जग रहा हो एक बीज आसमान के तले , मचल , धरा की गोद में।   आँधियों से लड़ सकूँ जो धूप में डटी रहूँ कि बारिशों में भीगकर खड़ी रहूँ, विशाल पेड़ की तरह अडिग , धरा की गोद में।   कि शत्रुओं से भय न हो तो मित्र से बंधू नहीं डगर नई कदम नए , दौड़ती सदा रहूँ मैं सिंहनी के मार्ग पर विरल , धरा की गोद में।। ***  

मान्यताओं की आँच

Image
चित्र : अनुप्रिया  " आओ संतो! आज कहाँ से सूरज निकल पड़ा ?" धनक सिलाई मशीन रखे कपड़े सिल रही थी , बोली। " अरे जिज्जी! मरने की भी फुरसत ना मेरे कों। ” संतो ने बिटिया का कुरता धनक की ओर बढ़ाते हुए कहा। " ऐसी कहाँ से नोटों की पौ फट पड़ी है तेरे घर जो व्यस्त हो गयी ?" धनक ने सुई में धागा डालते हुए कहा। “ जिज्जी , मेरी सास नाती की मेंड उठावे गंगा जी नाहवे जा री है। ” संतो ने साफई दी।   " सास जा रही है ?” “ हाँ जिज्जी! ”  “ तो तूने क्यों उठना-बैठना तज दिया ?” धनक ने खरखराते हुए मशीन चला दी। " जिज्जी सो तो तुम सही कह रही हों लेकिन मेरी सास के प्राण मायके में बसते हैं। बस दाल , अचार , बड़ी , पापड़ बना-बनाकर मर री हूँ मैं। " संतो ने साड़ी का पल्ला सिर पर सहेजते हुए कहा।   " इसका मतलब तेरी सास मायका घूमने जा रही है। " मुस्कुराते हुए धनक ने तंज कसा। " हाँ जिज्जी , ऐसा ही समझ…। " " तो सास से भी थोड़ा बहुत काम ले लिया कर संतो। " " ना जिज्जी उनके छोरा से तो आप मिली ही हों ?" “ हाँ तो। " ...

चिड़िया का कहना सुनो

Image
" सदियों से चली आ रही परंपराओं में से बेजान परंपरा की  एक सूखी पत्ती  निकालकर फेंक सको, और अपनी पसंद की हरी पत्तीनुमा जाग्रत परंपरा जोड़ सको तो आओ , बुनें घोंसला अपने लिए। " चिड़िया ने कहा। " किसी को भी लग सकता है कि मनुष्य घोंसले में रहता है। लेकिन नहीं , वह अपने हाथ से बनाए घोंसले में नहीं , अपितु अपने मन के द्वारा विचारों से बने घोंसने में नितांत अकेला रहता है। उस घोंसले को बनाते हुए वह कितना विचलित या तटस्थ रहा , उसके बोलने - बताने और आचार-विचार प्रकट करने से वह दिखता है। ईंटों के मकान से निकलकर आदमी कहीं छिप भी सकता है लेकिन विचारों में प्रकट होकर छिपना मुश्किल है। " चिड़िया आसमान की ओर देखकर बुदबुदाई। " आओ , पुरानी घिस चुकी परंपराओं को पुनर्नवा कर नई परंपराएं गढ़ें। " चिड़िया का कहना, डाल ने सुना , सुना पेड़ , फूल , फल , आकाश , सूरज और मौसम ने। चिड़िया की करनी और कथनी में समानता भी थी लेकिन मनुष्य विकास वाला खरगोश पकड़ने की जल्दी में दिखा। ***