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आँसू हृदय की अनुशंसा हैं

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"हालात कैसे भी हों बहादुर कभी रोया नहीं करते, सीने में जिनके सीखने का जूनून हो वो कभी हिम्मत खोया नहीं करते ।" -डॉ. विवेक बिंद्रा  उक्त कोट को पढ़कर ज़रा-सा भी इसे मानने को दिल नहीं मानता। हालाँकि इस तरह की कोटेशनबाजी हमारी पीढ़ी के बचपन ने खूब सुनी होगी और ये उक्ति खूब चर्चित होते हुए भी देखी गयी होगी। इस करुणा कलित हृदय में/ अब विकल रागिनी बजती क्यों हाहाकार स्वरों में/ वेदना असीम गरजती ?/ मानस सागर के तट पर/ क्यों लोल लहर की घातें कल कल ध्वनि से हैं कहती/ कुछ विस्मृत बीती बातें ? आती हैं शून्य क्षितिज से/ क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी टकराती बिलखाती-सी/ पगली-सी देती फेरी ? रोना यदि कायरता की निशानी होता तो महाकवि जयशंकर प्रसाद जी अपनी कविता का कथ्य आँसू को क्यों बनाते। क्यों वे आँसू ग्रन्थ लिखते? खैर , इस बात के इतर भी अगर देखें तो आज़ के समय में हो या बीते हुए वक्त में , ये कहना कितना गलत होगा कि बहादुर रोया नहीं करते । क्यों भई बहादुरों के पास दिल नहीं होता? या उनकी महसूस करने की क्षमता बहादुरी सीखने में क्षीण हो जाती है?  जबकि रोना एक बेहद सहज प्रक्रिया है। इंसान माँ की...

माँ! तुम मुझमें ज़िन्दा हो

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  ये श्राद्ध वाले पुरखों को स्मरण करने के दिन हैं। मैंने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की महीन विभाजित रेखा को समझने वाली , स्वतंत्रता को संबल देने वाली और अपने सम्पूर्ण स्त्रीत्व को दृढ़ता से सहेजने वाली माँ को याद कर मानो उनकी संगत का सुख ले लिया है। आप जहाँ हों , स्नेह करने वाले लोगों से घिरी हों प्रिय माँ! आपकी सदा ही जय है ❤️ आप अगर ये कहते हैं कि आज के समय में ही स्त्री जागरूक हुई है , तो ऐसा भ्रम मत पालिए जनाब! स्त्रियाँ सदियों से जागरूक होती आ रही हैं। हाँ , जागरूक स्त्रियों के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी अब दिनोंदिन बढ़ती जा रही है , जो स्त्री के नाते सुखद मानती हूँ। मैं अगर अपनी बात करूँ तो सदियों पहले की तो नहीं , लेकिन अपनी तीन पीढ़ी की महिलाओं के बारे में ज़रूर जानती हूँ। दादी और उनकी माँ , नानी और अपनी माँ! इन सबमें मेरी माँ बेहद सजग और जागरूक महिला थीं। वे लोगों की मतलब पुरुष और स्त्रियाँ जो अपने वजूद से अनभिज्ञ होती थीं , उनकी चालाकियाँ , चापलूसियाँ , बातों की हेराफेरी , कार्मिक कुटिलताओं की मुर्कियाँ और पुरुषगत भीरू नियति को चुटकियों में पहचान कर उसके प्रति अपना मौन विद्र...

हिंदी की जय हो

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चित्र: अरुण मिश्र  एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों , संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहिका , संप्रेषिका और परिचायिका भी है। हिंदी का व्याकरण और भाषा सरल , सहज और सुगम होने के कारण वैज्ञानिक भाषा के रूप में इसे जाना जाता है। हिंदी को दुनिया भर में समझने , बोलने और चाहने वाले लोगों की बहुत बड़ी संख्या मौजूद हैं। आजकल तकनीकी हस्तक्षेप ने हिंदी को जो त्वरा प्रदान की है वह उत्साहजनक है। मीडिया के विविध आयामों ने दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले जनों को भले संकुचित व्याकरणिक ज्ञान होने पर भी अपनी बात दूर तक पहुँचाने का जो अवसर दिया है , उससे हिंदी संवाद का दायरा बढ़ा है।   आज महानगरों में टेढ़ी-मेढ़ी ही सही युवा हिंदी में बात करते हुए देखे जा सकते हैं। यहाँ तक आकर कहा जा सकता है कि हिंदी का भवन विशाल है। उसके भवन के हाथीद्वार पर अलंकारों की महराबें हैं तो समृद्ध व्याकरण का उसका सिंहासन है। अपने आसन पर सुशोभित हिंदी के चरणों में नौ रस युक्त गंगा-जमुना बहती हैं। हिंदी के हाथों में छंदों के कमल हैं तो पाँवों में गीतों की पैजनियाँ। होंठ...

हँसो हँसो जल्दी हँसो

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  रात यात्रा पर है और मैं खिड़की में अकेली बैठी टिमटिमाते हुए तारों में से माँ और नानी को ख़ोज रही हूँ। जब से ये दोनों धरती छोड़ आसमान में रहने लगी हैं , मौका मिलते ही ढूंढने बैठ जाती हूँ। लैंप पोस्ट के नीचे शीशम की सूखी टहनियों में लगीं दो फलियाँ रात और मेरे बीच साक्षी हैं। अरे! अरे! दिखा , मुझे एक तारा ज्यादा टिमटिमाता हुआ-सा दिखा। ये माँ नहीं हो सकती , नानी हैं। मेरी नानी बहुत हँसती थीं इन्हीं टिमटिमाते तारों की तरह और इतना हँसने वाली माँ की बेटी , मेरी माँ! बहुत सोच-समझकर हँसती थीं और हर काम भी सोच-समझ कर करती थीं। इसलिए ज्यादा और बेवक्त हँसने पर मुझे डांट भी पिट जाती थी। " नानी की तरह बस सारा दिन हँसती रहती हो , ज़रा तमीज भी सीखो। " लेकिन नानी को मैंने हमेशा हर बात पर हँसते ही देखा था सो हँसना मुझे अच्छा लगने लगा था।   धीरे-धीरे अनुभव पकता रहा और नानी को हर वक्त हँसते देख , मैंने बचपन में ही समझ लिया था कि उन्हें किसी भी प्रकार का दुख , दुःखी नहीं कर सकता और कैसा भी सुख हँसी से ज्यादा कुछ दे नहीं सकता इसलिए उन्होंने दोनों को हँसी से तौल लिया था। रात भी हँसती है पर इसकी ...

स्वातंत्रय चेता नारी की कविताएँ

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डॉ. कृष्णा श्रीवास्तव जी की समीक्षात्मक टिप्पणी    " बाँस भर टोकरी " कविता संग्रह जो वनिका पब्लिकेस से अभी हाल ही में आया है। उस संग्रह की लगाभग कविताएँ स्वातंत्रय चेता नारी की कविताएँ हैं। कल्पना की कविताओं में जहाँ पुरुष और नारी एक दूसरे के पूरक बने रहने की कामनाएँ करते हैं , वहीं स्वतंत्र मगर स्त्री को मर्यादित स्व में लिप्त रहकर उच्च से उच्चतर जीवन जीने की मान मनौअल्ल है। जैसे बाँस और उससे बनी टोकरी अथवा बाँसुरी दोनों में ही विराट तत्व का समावेश है , दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जैसे— जल में कुंभ , कुंभ में जल है भीतर बाहर पानी।   कल्पना का मानना है कि जब पुरुष और स्त्री एक ही तत्व से निर्मित हैं तो स्त्री दमित और तुच्छ क्यों है ? कविताएँ पढ़ते हुए महसूस होता है , कवयित्री दुनिया को न पूर्ण स्त्रीमय देखना चाहती हैं न पुरुषमय , वह तो स्त्री और पुरुष दोनों को अपने-अपने स्व में जाग्रत रहकर समानांतर चलता हुआ देखने की बात कहती हैं पर किसी के द्वारा किसी की भी छाया को घेरना कवयित्री बहुत गलत मानती है। बस इसी असमानता की खाई में पनपती कई कई कविताएं इस में पढ़ी जा सकती हैं। कवित...

कागा सब तन खाइयो

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" एक काम बनाने में दूसरा कब बिगड़ जाए , कहा नहीं जा सकता। वैसे ही एक को मनाने में दस रूठ जाएँ और पहले वाला भी न मने तो घाटा पहल करने वाले का ही होगा न ? फिर भी मैं करुँगी । " लवलीन ने नीम पर बैठी चिड़िया से बोला और तार से कपड़े उतारने लगी। पति के साथ वह खुश थी लेकिन नेपथ्य से आते मौन कोहराम उसे जीने नहीं दे रहा था। उसी ठहराव को वह खत्म करना चाहती थी। " क्या एक बहू अपने दोनों घरों में खुशहाली की चाहत नहीं रख सकती ?" लवलीन ने कैलेण्डर में बेटे की सालगिरह वाली तारीख पर गोला लगा दिया। शाम गहरा चुकी थी, कपड़े आयरन टेबल पर टिका उसने झटपट मंदिर में दीपक जला दिया। मिल्क फीडर तैयार कर बेटे को पकड़ाते हुए कुशन के सहारे टिका , रसोई में चली गयी। ट्रिन ट्रिन ट्रिन कॉलबेल बजी और बजती रही। गुड्डू दौड़ सकता तो झट से पापा के लिए दरवाज़ा खोल देता। बहुत देर जब गेट नहीं खुला तो प्राकेत ने मोबाइल पर अपने घर आने की सूचना पत्नी को दी। पसीना पोंछते लवलीन ने दौड़कर गेट खोल दिया। “ आजकल तुम कहाँ खोई-खोई रहती हो लवी ?”  “.......” “ अच्छा चलो एक कप गरमागरम चाय बना दो, मैं हाथ मुँह धोकर आया। ...

गाँव की माटी और पीढ़ियों के दर्द की कहानियाँ

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कृति : अलगोजा  लेखक: जयराम सिंह गौर  समीक्षक: कल्पना मनोरमा  प्रकाशक: भावना प्रकाशन  मूल्य:  395 /- हिंदी कहानी का उद्भव और विकास न हुआ होता तो शायद सामाजिक परम्पराएँ समय की किसी करवट में सो कर विलीन हो जातीं। हम अपनी पीढ़ियों की परम्पराएँ क्या युक्तियां भी अपनी अगली पीढ़ी को न बता पाते। उद्भव और विकास के सूत्र निबन्ध में मधुरेश जी लिखते हैं ,” ब्रिटिश शासन के बाद भारतीय समाज की मूल चिंता अपनी परम्परा और संस्कारों के संरक्षण के रूप में दिखाई देती है। विचारों की लड़ाई के लिए गद्य ही उपयुक्त माध्यम बन सकता था। ” कहने का तात्पर्य कहानी एक पारम्परिक बोधगम्यता को धीमी गति से पीढ़ी दर पीढ़ी कहती चलती है। जयराम सिंह गौर जी से मेरा परिचय सन २०१९ जून को अपनी पुस्तक ’ कबतक सूरजमुखी बनें हम ’ के लोकार्पण में हुआ था। आपने अपनी तमाम व्यस्तताओं को नकारते हुए कार्यक्रम में शामिल होकर मेरा मनोबल बढ़ाया था। खैर , मैंने आपको बहुत तो नहीं पढ़ा लेकिन फेसबुक के माध्यम से टुकड़ों में ही सही आपके सृजनात्मक विचारों से अवगत होती रही हूँ। हिन्दी साहित्य की कहानी विधा मेंं साधिकार लेखनी चलाने ...