माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई


माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई
बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 48

नवरात्रि में हम माँ दुर्गा की आराधना करते हैं। उन्हें शक्ति का स्वरूप मानते हैं। संकटों का सामना करने वाली, अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली और अपने सामर्थ्य से रास्ता बनाने वाली शक्ति। लेकिन देवी की आराधना करते हुए क्या सयानी स्त्री अपने घर की उस स्त्री को भी देखती है, जो वर्षों से पूरे परिवार की जरूरतों को सँभालते हुए अपनी शक्ति का बड़ा हिस्सा दूसरों के जीवन को बनाने में लगा देती है?
स्त्री जब माँ बनती है, तो जैसे बच्चों को बड़ा करने वाली दाई बन जाती है। उनके खाने-पीने, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंता में वह इस कदर डूबी रहती है कि कोई उससे मुखातिब होता है, तो उसके शिशु के बारे में पूछा जाता है। परिवार में किसी को कुछ भी चाहिए होता है, सबसे पहले अपने निकट की स्त्री की याद आती है। स्त्री को करुणा की शक्ति हासिल है और वह किसका काम बाकी है, किसे क्या याद दिलाना है, किसकी परेशानी कैसे दूर करनी है, इन सबके बीच उसका अपना दिन बीत जाने में बुराई नहीं मानती।
अपने से जुड़े दायित्वों को प्रेम से निभाती है। लेकिन प्रेम से किया गया काम भी होता तो काम ही है। कार्यों के निबट जाने के बाद स्त्री का कभी न थकना मानो एक अपेक्षा बन जाती है, जबकि उसका थकना भी उतना ही स्वाभाविक है। ज्यादा चलने के बाद एक मशीन भी खराब हो जाती है। फिर भी अक्सर परिवार में उसके काम को घर की बड़ी स्त्रियों द्वारा इतनी सहजता से लिया जाता है कि उसकी मेहनत दिखाई देना बंद हो जाती है। सबको खाना मिल गया, बच्चे समय पर तैयार हो गए, घर की जरूरतें पूरी हो गईं, तो सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन इस सामान्य दिनचर्या को बनाए रखने के लिए स्त्री ने कितना समय लगाया, कितनी बार उसने अपना काम रोका। माँ बनी स्त्री ने कितनी बार अपनी निजी इच्छाएँ टालीं, इस पर कम ही ध्यान जाता है। जो स्त्री दूसरों की सुविधा के लिए अपने काम बीच में रोक देती है, उसी को महत्वहीन समझ लिया जाता है।
स्त्री को अपनी ही नजरों में महत्वहीन बनाने की व्यवस्था ऐतिहासिक है। प्रगतिशील स्त्री भी अपने को केंद्र में रखकर दैनिक जरूरतों को पूरा करना भूल जाती है। क्यों? क्योंकि स्वदमन के संस्कार इतने गहरे हैं कि सब कुछ सहज लगता है। जो स्त्री दूसरों के जीवन को सँभालने में इतनी सक्षम है, वह अपने जीवन की खुशी के लिए दूसरों की सुविधा या स्वीकृति की प्रतीक्षा क्यों करती है?
यह प्रश्न किसी एक माँ का नहीं है। इसके पीछे हमारी परवरिश, पारिवारिक व्यवस्था और पीढ़ियों से चली आ रही सोच भी है।
बचपन से ही लड़कियाँ सीखती हैं कि घर के लोगों का ध्यान रखना अच्छी बात है। अपनी इच्छा से पहले दूसरों की जरूरत देखना, परिवार के लिए समझौता करना और अपने हिस्से की सुविधा छोड़ देना अच्छे व्यवहार का हिस्सा माना जाता है। विवाह के बाद जिम्मेदारियाँ बदलती हैं और माँ बनने के बाद तो स्त्री एक त्यागमयी प्रतिमा में बदल जाती है, बदल जानी चाहिए। धीरे-धीरे दूसरों के लिए हमेशा उपस्थित रहना उसकी आदत ही नहीं, उसकी पहचान का हिस्सा बन जाता है। वह बिना कहे सबकी जरूरतें समझने लगती है। लेकिन जब अपने लिए कुछ करने की बात आती है, तो उसे सोचना पड़ता है कि घर का काम कौन करेगा, परिवार क्या सोचेगा या उसके इस निर्णय से किसी को परेशानी तो नहीं होगी। समस्या यह नहीं कि स्त्री अपने परिवार से प्रेम करती है या उसके लिए काम करती है। समस्या तब आती है, जब परिवार के लिए उसका समय और श्रम स्वाभाविक अधिकार समझ लिया जाता है, लेकिन अपने लिए समय निकालने पर उसे संकोच होने लगता है।
बच्चे छोटे होते हैं तो माँ की दिनचर्या उनके आसपास घूमती है। छुट्टियाँ उनकी सुविधा से तय होती हैं। खरीदारी उनकी जरूरतों के अनुसार होती है। अपनी पढ़ाई, काम, मित्रों और रुचियों के लिए वह कई बार बाद में समय निकालने की सोचती है। फिर जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और वे अपने निर्णय लेने लगते हैं, तो उनकी दुनिया फैलने लगती है। माँ की चिंता फिर भी समाप्त नहीं होती। तब माँ के सामने एक नया प्रश्न आता है। अब वह अपने लिए क्या करेगी?
क्या स्त्री के जीवन में उसके अपने विकास के लिए शुरू से जगह नहीं होनी चाहिए थी?
जिस तरह वह बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य के बारे में सोचती है, क्या वह अपनी पढ़ाई और भविष्य के बारे में भी सोच सकती थी? जिस तरह वह बच्चों की प्रतिभा को विकसित करने के लिए समय निकालती है, क्या उसे अपने किसी हुनर को सीखने और सँवारने का अवसर मिला? जिस तरह वह परिवार के लिए योजनाएँ बनाती है, क्या अपने सपनों के लिए भी योजनाएँ बना पाती है?
अगर इन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाएँ, तो इससे माँ के प्रेम पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगता। विडंबना यह है कि स्त्री का अपना विकास परिवार के दूसरे सदस्यों के विकास के समानांतर नहीं चलता। बच्चों के लिए नए अवसर खोजे जाते हैं, उनकी रुचियों को प्रोत्साहित किया जाता है। उनके भविष्य के लिए समय तथा संसाधन जुटाए जाते हैं। लेकिन स्त्री की पढ़ाई, काम, मित्रता या रचनात्मक रुचि की बात आती है, तो पहले घर की जिम्मेदारियाँ पूरी हो जाएँ, यह सोचा जाता है। जबकि घर की जिम्मेदारियाँ कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। एक जिम्मेदारी के बाद दूसरी आ जाती है। बच्चों का स्वतंत्र होना माँ की असफलता नहीं है। कई बार यह उसके पालन-पोषण की सफलता होती है। उसने बच्चों को इतना सक्षम बनाया कि वे अपने निर्णय स्वयं ले सकें। अब उसे भी यह स्वीकार करने की जरूरत है कि बच्चे अपनी जिंदगी जिएँ और वह अपने जीवन को नए सिरे से देखे। इसका अर्थ बच्चों से दूर होना नहीं है। माँ होना समाप्त नहीं होता। केवल संबंध का स्वरूप बदलता है। पहले बच्चे की अनेक जरूरतों की जिम्मेदारी माँ पर थी। अब उसे बच्चे की स्वतंत्रता पर भरोसा करना सीखना होगा। चिंता बनी रह सकती है, लेकिन हर चिंता में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं।
इसी तरह स्त्री का अपने जीवन की ओर लौटने का अर्थ भी परिवार से मुँह मोड़ना नहीं है। जब उसे लगे, तब वह पढ़ सकती है, लिख सकती है, मित्रों से मिल सकती है, यात्रा कर सकती है, कोई नया काम सीख सकती है या किसी पुराने सपने को फिर से जगह दे सकती है। घर का काम बना रह सकता है। बुजुर्गों की देखभाल हो सकती है। आर्थिक जिम्मेदारियाँ हो सकती हैं। कई बार पति और परिवार के दूसरे सदस्यों की जरूरतें भी उसी के हिस्से में आ सकती हैं।
भारत के समय उपयोग सर्वेक्षण 2024 में भी महिलाओं और पुरुषों के अवैतनिक घरेलू तथा देखभाल संबंधी काम में बड़ा अंतर दर्ज हुआ। यह याद दिलाता है कि स्त्री के पास अपने लिए समय होना केवल उसकी इच्छा का प्रश्न नहीं है। यह घर में काम के बँटवारे से भी जुड़ा है। अब यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि रोका किसने, माँ अपने लिए खूब जिए। किंतु जिएगी तो तब, जब घर के काम में दूसरे सदस्य उसका सहयोग करेंगे? क्या उसके पास अपनी इच्छाओं पर खर्च करने की स्वतंत्रता है? क्या वह बिना अपराधबोध के अपने लिए कुछ कर सकती है? क्या उसे आर्थिक निर्णय लेने की भी उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी उससे जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा की जाती है?
स्त्री को अपने जीवन के लिए जगह बनाने की सलाह देने से पहले यह भी देखना होगा कि उसके जीवन में जगह छोड़ी कितनी गई है। और यदि वह जगह नहीं छोड़ी गई, तो केवल स्त्री को आत्मनिर्भर बनने की सलाह देना पर्याप्त नहीं होगा।
अब समय है कि ऐतिहासिक दमन की कड़ियाँ टूटें और स्त्री अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं लेना सीखे। इसके लिए जरूरी है कि वह अपने बारे में सोचना सीखे, अपनी जरूरतों को पहचाने और अपने समय पर अपना अधिकार स्वीकार करे। उसे अपने श्रम का सम्मान करना होगा और अपने निर्णयों को महत्व देना सीखना होगा। परिवार को भी यह समझना होगा कि घर चलाना किसी एक सदस्य की स्वाभाविक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा काम है।
स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना नहीं कि वह अपने लिए कुछ कर सके। इसका अर्थ यह भी है कि वह अपने जीवन के निर्णय लेने के लिए हर बार किसी की अनुमति, प्रशंसा या स्वीकृति की प्रतीक्षा न करे। उसे स्वयं के प्रति जवाबदेह होना सीखना होगा, ताकि दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए वह अपने जीवन, अपनी इच्छाओं और अपने विकास के प्रति जिम्मेदारी से विमुख न हो।
यहीं बदलाव की जरूरत है। बेटियों को दूसरों की देखभाल के साथ अपनी देखभाल करना भी सिखाना होगा। उन्हें समझना होगा कि संवेदनशील होना अच्छी बात है, लेकिन अपनी इच्छाओं की अनदेखी करना कोई आदर्श नहीं। स्त्री को सबसे पहले स्वयं के प्रति सजग होना होगा। पुरुषों का स्त्री के श्रम पर निर्भर रहना और उसकी स्वतंत्रता को सहजता से स्वीकार न कर पाना भी इस व्यवस्था का हिस्सा रहा है। इसलिए घर की जिम्मेदारियों का न्यायपूर्ण बँटवारा जरूरी है। लेकिन स्त्री के आत्मबोध की शुरुआत पुरुष के बदलने की प्रतीक्षा से नहीं होनी चाहिए। उसे अपने समय, श्रम और इच्छाओं का मूल्य स्वयं पहचानना होगा।
नवरात्रि में शक्ति की आराधना करते हुए स्त्री को अपनी शक्ति का अर्थ भी समझना होगा। उसकी शक्ति केवल दूसरों का जीवन सँभालने में नहीं, अपने जीवन को दिशा देने में भी है।
बालिका से वामा बनने की यात्रा तभी सार्थक होगी, जब स्त्री अपनी पहचान को बेटी, पत्नी और माँ की भूमिकाओं से आगे देख सकेगी। जब वह अपने प्रति भी जवाबदेह होगी और अपने जीवन की उपेक्षा को त्याग का नाम देना छोड़ देगी। मातृत्व उसके जीवन को समृद्ध करे, लेकिन उसके विकास को रोक न दे।
माँ अपने बच्चे से कह सके, “तुम अपनी जिंदगी जियो। मैं भी अपनी जिंदगी को और अच्छी तरह जीना सीख रही हूँ।”
स्त्री केवल किसी की माँ नहीं है। वह स्वयं भी एक पूरी मनुष्य है।

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