कल्पना मनोरमा की कहानी ‘खाली मकान’
अपने ही घर में असुरक्षित स्त्री की कथा है
कल्पना मनोरमा की कहानी ‘खाली मकान’
— चारुमित्रा,राँची(झारखंड)
इंद्रप्रस्थ भारती के मई 2026 अंक में प्रकाशित कल्पना मनोरमा की कहानी ‘खाली मकान’ एक ऐसे मध्यवर्गीय परिवार की कथा है, जिसमें बच्चों के भविष्य की चिंता एक स्त्री को अपने पति से अलग रहने का निर्णय लेने के लिए विवश करती है। कहानी का आरंभ एक व्यावहारिक समस्या से होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह स्त्री की निजता, असुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था के भीतर उसकी सीमित स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाता है। लेखिका ने एक सामान्य-सी दिखाई देने वाली घटना के माध्यम से उस मानसिक दबाव को उभारा है, जिसमें घर की जिम्मेदारियाँ निभाती स्त्री अपने ही घर में सहज और सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती।
कहानी का आरंभ मध्यवर्गीय जीवन की उन विवशताओं को सामने लाता है, जिनमें नौकरी, बच्चों की शिक्षा और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। यहाँ एक प्रश्न यह भी है कि परिवार के भविष्य के लिए लिए गए निर्णयों की कीमत आखिर किसे चुकानी पड़ती है। सोनाली का निर्णय स्वेच्छा और विवशता, दोनों का मिला-जुला रूप है। वह अपने जीवन की व्यवस्था स्वयं करना चाहती है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता परिस्थितियों और जिम्मेदारियों से बँधी हुई है।
सोनाली उसी सोसायटी में किराए का मकान तलाशती है, जहाँ वह पिछले पाँच वर्षों से रह रही है। परिचित परिवेश और रोजमर्रा की सुविधाओं से उसका जुड़ाव स्वाभाविक है। उसे लगता है कि जगह बदलने से नई परेशानियाँ खड़ी होंगी। सी-11 मकान खाली मिलने पर वह राहत महसूस करती है। मकान पुराना है और उसे विशेष पसंद भी नहीं आता, लेकिन वह उसे स्वीकार कर लेती है। इस बिंदु पर कहानी में मकान केवल एक भौतिक जरूरत नहीं रह जाती; वह सोनाली की सुरक्षा, स्थिरता और स्वतंत्र जीवन की उम्मीद का आधार बनती है।
लेकिन यह उम्मीद जल्दी ही टूटने लगती है। जब मकान मालिक का बार-बार घर आना और देर तक वहाँ बैठे रहना सोनाली के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। वह उसके सामने अपने सामान्य काम भी सहजता से नहीं कर पाती। बाथरूम और शौचालय एक ही होने के कारण उसकी परेशानी और बढ़ जाती है। धीरे-धीरे वह अपने कामों का समय बदलने लगती है, कई काम टाल देती है और मकान मालिक के जाने का इंतजार करती है।
लेखिका ने इन प्रसंगों के माध्यम से स्त्री की असुरक्षा को किसी बड़े टकराव या नाटकीय घटना से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में होने वाले छोटे-छोटे हस्तक्षेपों से व्यक्त किया है। सोनाली का अपना घर होते हुए भी अपनी सुविधा से नहाने, कपड़े सुखाने या दूसरे सामान्य काम करने में असमर्थ होना इस स्थिति की विडंबना है। घर, जो व्यक्ति को निजता और सुरक्षा देता है, यहाँ धीरे-धीरे असहजता का स्थान बन जाता है।
सोनाली की मनःस्थिति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह अपनी आशंका को लेकर स्वयं भी निश्चित नहीं है। वह बार-बार सोचती है कि आखिर उसे डर क्यों लग रहा है। वह अपने अनुभव को परखती है और मकान मालिक के व्यवहार को सामान्य मानकर स्वयं को समझाने की कोशिश करती है। कुमार से बातचीत में जब उसे पता चलता है कि मकान मालिक का संबंध उसके वरिष्ठ अधिकारी से है और शिकायत करने पर नौकरी में परेशानी हो सकती है, तो उसकी असहायता और बढ़ जाती है।कहानी यहाँ निजी जीवन में सत्ता और संस्थागत दबाव के प्रवेश को भी रेखांकित करती है।
कुमार का व्यवहार भी विचारणीय है। वह सोनाली की परेशानी सुनता है, लेकिन नौकरी और वरिष्ठ अधिकारी से जुड़े संबंधों के कारण कोई स्पष्ट समाधान सामने नहीं रख पाता। इस प्रसंग में कहानी दांपत्य संबंधों के भीतर संवाद और सहयोग की जरूरत को भी सामने लाती है। सोनाली अपनी परेशानी माँ से साझा नहीं करती, क्योंकि उसे पहले ही अकेले न रहने की सलाह मिल चुकी है। उसे शायद यह आशंका है कि अपनी समस्या बताने पर उसके निर्णय पर सवाल उठेंगे। इस प्रकार वह एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जहाँ परेशानी का सामना करने के साथ-साथ उसे अपनी परेशानी छिपाने का दबाव भी झेलना पड़ता है।
कहानी की बात करें तो शीर्षक ‘खाली मकान’ अपनी व्यापक अर्थवत्ता के कारण विशेष महत्त्व रखता है। आरंभ में यह मकान सोनाली के लिए एक अवसर है—एक ऐसा स्थान, जहाँ वह बच्चों के साथ रहकर अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकती है। लेकिन धीरे-धीरे वही मकान उसकी निजता और सुरक्षा के लिए खतरे का प्रतीक बन जाता है। मकान भौतिक अर्थ में खाली है, लेकिन उसमें रहने वाली स्त्री के लिए सहजता और स्वतंत्रता की जगह लगातार सिकुड़ती जाती है। अंततः मकान छोड़ देने के बाद भी उसके भीतर का खालीपन और असुरक्षा का बोध समाप्त नहीं होता। इस तरह शीर्षक का अर्थ केवल एक खाली पड़े घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्त्री के टूटते भरोसे और उसके भीतर गहराते असुरक्षा-बोध से भी जुड़ जाता है।
कहानी का महत्त्व इस बात में है कि ‘खाली मकान’ एक ऐसे समाज की तस्वीर प्रस्तुत करती है, जहाँ स्त्री की असुरक्षा केवल उसकी निजी समस्या नहीं रह जाती, बल्कि एक व्यापक सामाजिक प्रश्न बन जाती है। जब एक स्त्री अपने ही घर में सुरक्षित महसूस न कर सके, तो क्या केवल घर बदल लेना उसकी समस्या का समाधान हो सकता है?
एक आम सी स्थिति को लेकर बहुत ही विश्वसनीय कथानक। कल्पना मनोरमा प्रभावशाली लेखिका हैं।
ReplyDeleteस्त्री जीवन के वास्तविक अनुभवों को लेकर बनी गयी कथा मन को उद्वेलित कर जाती है
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