प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान


प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान 
बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 43

प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है।
स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है?
   यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री को लंबे समय तक प्रेम की वस्तु की तरह देखा गया, प्रेम करने वाले मनुष्य की तरह कम। उसके लिए यह तय किया जाता रहा कि किससे विवाह करना उचित है, किससे संबंध रखना उचित है, किस उम्र में प्रेम करना चाहिए और किस तरह का साथी उसके लिए स्वीकार्य होगा। आधुनिक समय में परिस्थितियाँ बदली हैं, लेकिन पुराने विचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
समाजशास्त्री एंथनी गिडेन्स ने आधुनिक अंतरंग संबंधों को समझाते हुए अपनी पुस्तक द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ इंटिमेसी में “प्योर रिलेशनशिप” की अवधारणा दी है। उनके अनुसार आधुनिक संबंध केवल सामाजिक कर्तव्य के कारण टिके रहने के बजाय इस बात पर टिकते हैं कि दोनों व्यक्तियों को उस संबंध से संतोष और अर्थ मिल रहा है या नहीं। यानी संबंध में बने रहना केवल इसलिए पर्याप्त नहीं कि समाज उसे स्वीकार करता है। संबंध में पारस्परिकता और व्यक्तिगत संतोष भी महत्वपूर्ण हैं।
यह विचार स्त्री के लिए विशेष महत्व रखता है। क्यों? क्योंकि स्त्री विचारों, भावनाओं और समझ को अगली पीढ़ी की स्त्री में स्थानांतरित करती है।
यदि प्रेम में केवल एक व्यक्ति की इच्छा महत्वपूर्ण हो और दूसरा लगातार उसके अनुसार ढलता रहे तो वह संबंध बराबरी का नहीं रह जाता। प्रेम में दोनों की इच्छा होनी चाहिए। और यह बात कम से कम स्त्री को बचपन से समझ आनी चाहिए। बालिका को यह बात समझ आ जानी चाहिए कि प्रेम, सम्मान और करुणा के लेन-देन में दोनों की सहमति होनी चाहिए। दोनों को असहमति व्यक्त करने की जगह होनी चाहिए।
यहीं से प्रेम और समर्पण के बीच का अंतर समझना जरूरी है।
समर्पण यदि स्वेच्छा से हो तो वह प्रेम का सुंदर हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि स्त्री से समर्पण इसलिए अपेक्षित हो क्योंकि वह स्त्री है, कमज़ोर है, तो यह प्रेम नहीं बल्कि सामाजिक भूमिका बन जाती है। और जब कोई बालिका ऐसे परिवेश में रहती है, उसकी समझ वैसी ही विकसित होती है। प्रेम में किसी के लिए अपने समय का कुछ हिस्सा देना स्वाभाविक है। लेकिन अपने पूरे जीवन पर दूसरे का अधिकार दे देना प्रेम की अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती।
इस तरह की सोच अचानक नहीं बनती। अबोध बचपन में बालिका देखकर, सुनकर, महसूस कर इस तरह की अवधारणा में जकड़ जाती है। क्योंकि एक लड़की अपनी माँ को देखती है कि उसकी माँ घर में सबकी पसंद याद रखती है। किसे क्या खाना पसंद है। किसे किस समय चाय चाहिए। किसकी तबीयत खराब है। किसका जन्मदिन है। किस रिश्तेदार को क्या अच्छा लगेगा। बच्ची इन सबके बीच प्रेम का एक अर्थ सीखती है, दूसरों की जरूरतों को सर्वोपरि समझना।
माना कि संवेदनशीलता मनुष्य का मूल्यवान गुण है। फिर भी किसी को पसंद करने, इंतजार करने, नाराज़गी सहने से पहले खुद की ओर लौटना चाहिए। किसी के लिए अपने निर्णय बदलना मनुष्यता की कोटि में आता है। लेकिन अपने आप को विलीन कर देना समर्पण नहीं है। क्योंकि आत्मसम्मान के प्रश्न और उसके उत्तर को याद रखना होगा।
प्रेम में अपने साथी की खुशी महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन अपनी गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई स्त्री लगातार अपनी इच्छा दबाकर संबंध बनाए रखती है तो बाहर से संबंध शांत दिखाई दे सकता है, भीतर से वह स्त्री अकेली होती जाती है।
यहाँ भारतीय समाज की एक पुरानी धारणा फिर सामने आती है। बेटी की पसंद पर परिवार चिंता करता है। प्रेम विवाह को लेकर सवाल उठते हैं। जाति, धर्म, वर्ग, परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति के आधार पर संबंधों को परखा जाता है। कई बार लड़की की इच्छा सबसे अंत में पूछी जाती है।
उसे समझाया जाता है कि परिवार उसके भले के लिए सोच रहा है। और यह समाज के हर वर्ग में निहित है। परिवार सचमुच उसके भले की चिंता करता है या अपनी मान मर्यादा के अनुसार निर्णय लेता है? परिवार की दृष्टि में बेटी की सुरक्षा महत्वपूर्ण होने के बजाय कई बार उनकी परंपराएँ, मान्यताएँ और धारणाएँ पोषित हों, इस दिशा में कार्य किया जाता है। होना ये चाहिए कि परिवार अपनी वयस्क बेटी की इच्छा को सुने और उसके साथ मिलकर उसके चयन पर विचार का तरीका निकाले। जाति और वर्ग से ज्यादा बेटी द्वारा चुने गए युवक के अंदर मानवीय गुण कितने हैं, इस पर बात हो।
यहीं माँ की अहम भूमिका फिर सामने आती है।
मानवीय गुणों के साथ स्त्रीत्व में स्थित माँ अपनी बेटी से प्रेम के बारे में बात करे। उसे केवल यह न बताए कि प्रेम से बचना है। वह यह भी बताए कि प्रेम में स्वयं को बचाए रखना कितना आवश्यक है। वह बेटी से पूछे कि जिस व्यक्ति को वह पसंद करती है, उसमें उसे क्या दिखाई देता है? क्या वह उसकी बात सुनता है? उसकी असहमति स्वीकार करता है? उसके सपनों को महत्व देता है? उसके काम को उतना ही महत्वपूर्ण मानता है, जितना अपने काम को? क्या वह उसके मित्रों और परिवार का सम्मान करता है? और सबसे जरूरी, क्या उसके साथ रहते हुए बेटी स्वयं को अधिक स्वतंत्र महसूस करती है?
शायद यही प्रश्न प्रेम की वास्तविक गुणवत्ता को समझने में मदद कर सकते हैं।
प्रेम में आत्मसम्मान का अर्थ यह नहीं कि स्त्री कठोर हो जाए। वह अपने साथी की जरूरतों को न समझे, उसके दुःख में साथ न दे, उसके कठिन समय में उसके साथ खड़ी न रहे। नहीं, यह सब करना प्रेम का ही हिस्सा है। लेकिन साथ देते हुए स्वयं को मिटा देना जरूरी नहीं। इस बात का भी ध्यान रखना होगा।
एक स्वस्थ संबंध में दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के जीवन को बड़ा करते हैं। एक-दूसरे की दुनिया छोटी नहीं करते। इसलिए प्रेम को केवल त्याग की भाषा में समझना पर्याप्त नहीं है। प्रेम में आनंद भी है। मित्रता है। आकर्षण है। बातचीत है। साथ होने की इच्छा है। एक-दूसरे की उपलब्धियों पर खुशी है। कठिन समय में साथ खड़ा होना है। और कभी-कभी एक-दूसरे को अपने लिए थोड़ी जगह देना भी है।
स्त्री की इच्छा को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इच्छा को लंबे समय तक उसके चरित्र से जोड़कर देखा गया। पुरुष की इच्छा को स्वाभाविक मान लिया गया और स्त्री की इच्छा को मर्यादा की कसौटी पर रखा गया। इससे प्रेम भी असमान हो गया।
माँ को चाहिए, वह बेटी को सिखाये कि प्रेम से डराना नहीं और प्रेमी को उसके जीवन का अंतिम सत्य नहीं बना देना। उसे यह समझाना ज्यादा जरूरी है कि प्रेम उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, पूरा जीवन नहीं।
उसे बताया जाए, प्रेम और प्रेमी के अलावा उसका अपना काम है। अपनी मित्रताएँ हैं। अपने सपने हैं। अपनी रुचियाँ हैं। अपने विचार हैं। प्रेम इन सबको मिटाकर नहीं, इनके साथ जगह बनाकर सुंदर हो सकता है। प्रेम में स्त्री का सबसे बड़ा अधिकार शायद यही है कि वह प्रेम करे तो अपनी इच्छा से करे। चुने तो समझकर चुने। साथ रहे तो बराबरी से रहे। असहमति हो तो कह सके। चोट लगे तो उसे पहचान सके। और यदि कोई संबंध उसकी गरिमा लगातार कम कर रहा हो तो उससे बाहर आने का साहस भी रखे। प्रेम में स्त्री को त्याग की मूर्ति बनने की आवश्यकता नहीं। उसे मनुष्य बने रहने की आवश्यकता है। शायद प्रेम की सबसे सुंदर अवस्था वही है जहाँ दो लोग एक-दूसरे को अपना बनाने के बजाय एक-दूसरे को अपना बने रहने की जगह देते हैं। यहीं प्रेम अधिकार से संबंध में बदलता है। यहीं इच्छा स्वायत्तता से जुड़ती है। और यहीं स्त्री अपने भीतर यह विश्वास पैदा करती है कि प्रेम पाने के लिए उसे स्वयं को खोना जरूरी नहीं है।
एक स्त्री अपनी अगली पीढ़ी की बालिका को अगर खुद पर विश्वास करना सिखा पाई तो वामा को अपनी आवाज़ मिलेगी ही, संशय से मुक्ति मिलेगी।

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