सिक्कों की खनक में खोती हँसी
सिक्कों की खनक में खोती हँसी
कल्पना मनोरमा
“मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे...”
सुमित्रानंदन पंत की यह कल्पना कितनी भोली और निश्छल थी। बच्चा मिट्टी में बीज नहीं, अपने छोटे-से मन के सपने बोने की बात कर रहा था। बचपन में पैसे बोने की यह कल्पना कौतुक और मासूम उम्मीद से जुड़ी थी। आज पैसे कमाने की दौड़ जीवन की एक बड़ी चिंता बन गई है। फर्क इतना है कि तब एक बच्चा सिक्के मिट्टी में छिपाने की कल्पना करता था और आज का मनुष्य मिट्टी झाड़कर अपनी पूरी उम्र धन कमाने में लगा देता है।
पाने को शायद हमने बहुत कुछ पा लिया है, लेकिन इस पाने की यात्रा में जाने कितनी आत्मीय चीजें पीछे छूट गई हैं। वह बचपन, जो बिना वजह हँसता था। वह दोपहर, जिसमें पेड़ की छाँव किसी महल से कम नहीं लगती थी। वह पगडंडी, जिस पर चलते हुए जूतों से ज्यादा पैरों को मिट्टी का स्पर्श अच्छा लगता था। वह घर, जहाँ शाम का अर्थ था, सबका एक साथ लौट आना। आज जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि एक ही घर में रहते हुए भी परिवार के लोगों के पास साथ बैठने का समय कम होता जा रहा है। शाम आती है, लेकिन हर व्यक्ति अपने काम, मोबाइल या अपनी अलग दिनचर्या में व्यस्त रहता है।
चारों ओर दौड़ ही दौड़ है, नौकरी, व्यवसाय, बड़ा घर, महँगी गाड़ी, ब्रांडेड कपड़े और सोशल मीडिया पर बेहतर दिखाई देने वाले जीवन की चाह। चाहिए, चाहिए और चाहिए। इस चाहत के बीच कहीं वह मनुष्य पीछे छूट जाता है, जो कभी केवल अपने और अपनों के होने से संतुष्ट हो जाता था। हमने जीवन को सुविधाओं से भर दिया है, लेकिन सुविधा और संतोष एक ही चीज नहीं होती हैं। सुविधाएँ बढ़ सकती हैं, फिर भी तनाव और असंतोष कम हों, यह जरूरी नहीं।
जिस मिट्टी की सोंधी गंध कभी रिश्तों में बसती थी, वही मिट्टी अब हमारी महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबकर विलुप्त हो रही है। खेत अधिक उपज देने लगे हैं, लेकिन बढ़ती लागत, रासायनिक इनपुट, पानी की समस्या और बदलती जलवायु ने किसानों और मिट्टी दोनों के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। अनाज की बालियाँ भर आई हैं, लेकिन उनमें किसान की वह सहज खुशी कहाँ है?
हमारी थाली भर रही है, फिर भी मन क्यों खाली होता जा रहा है?
कहते हैं, “जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।” यह कहावत भोजन और मन के संबंध को सरल ढंग से व्यक्त करती है, लेकिन मनुष्य का मानसिक संसार इससे कहीं अधिक जटिल है। भोजन के साथ हमारी जीवनशैली, तनाव, नींद, सामाजिक संबंध और आसपास का वातावरण भी हमारे मन को प्रभावित करते हैं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि हम क्या खा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि हम किस तरह जी रहे हैं और अपने भोजन तथा उसके उत्पादन के प्रति कितने सजग हैं।
नहीं जानता कोई कि मन भी तो एक खेत है। उसमें जो बोया जाएगा, वही उगेगा। कभी उसमें करुणा उगती थी, संवेदना के फूल खिलते थी। अब लक्ष्य, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, तुलना और समय की कमी की खरपतवार इतनी घनी हो चुकी है कि भीतर बैठे मनुष्य की आवाज सुनाई नहीं देती। समस्या धन कमाने में नहीं है। धन जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है, जब धन जीवन का साधन न रहकर जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। आज मानसिक थकान हमारे समय की एक गंभीर समस्या है। चेहरों पर मुस्कान है, तस्वीरों में प्रसन्नता है और प्रोफाइल पर उपलब्धियों की लंबी सूची है। फिर भी भीतर कोई लगातार उदास बैठा है, वह उदासी जिसे न कोई स्टेटस बता पाता है, न कोई तस्वीर छिपा पाती है।
हम दूसरों को अपना सुख दिखाने में इतने व्यस्त हैं कि असली सुख को महसूस करना भूल गए हैं।
तुलना ने हमारे भीतर एक अजीब-सी भूख पैदा कर दी है। पड़ोसी के घर नई गाड़ी आई तो हमारी पुरानी गाड़ी छोटी लगने लगी। किसी मित्र का बच्चा अच्छे अंक ले आया तो अपने बच्चे की मेहनत कम दिखाई देने लगी। किसी की विदेश यात्रा देखकर अपनी पूरी जिंदगी साधारण लगने लगी। धीरे-धीरे हम अपने जीवन को जीना छोड़कर दूसरों के जीवन का हिसाब रखने लगे है। और यह हिसाब कभी पूरा नहीं होता। सबसे अधिक चिंता बच्चों की है। जिस उम्र में बच्चे को मिट्टी से दोस्ती करनी चाहिए, उस उम्र में स्क्रीन और पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा उसके समय का बड़ा हिस्सा घेर रही है। जिस उम्र में उसे दादी-नानी की कहानियों में दुनिया खोजनी चाहिए, उस उम्र में वह कई बार प्रतियोगिता की किताबों में अपना भविष्य खोज रहा है। स्कूल के बाद कोचिंग, कोचिंग के बाद होमवर्क, फिर स्क्रीन और अंत में थका हुआ बचपन।
हम बच्चों से पूछते हैं, “बड़े होकर क्या बनोगे?”
शायद हमें कभी-कभी यह भी पूछना चाहिए—“बड़े होकर खुश कितना रहोगे?”
हमने बच्चों को सफल होना तो सिखा दिया, लेकिन असफल होकर फिर उठना नहीं सिखाया। हमने उन्हें आगे बढ़ना सिखाया, लेकिन किसी के साथ चलना नहीं सिखाया। हमने उन्हें जीतने की आदत डाली, मगर हार के बाद मुस्कुराने का साहस नहीं सिखाया।
कभी दादी की एक कहानी जीवन का अर्थ समझा देती थी। नानी की गोद में सिर रखकर बच्चा बिना किसी पाठ्यक्रम के प्रेम सीख लेता था। कभी पड़ोस का कोई बड़ा अपने और दूसरे के बच्चे में बहुत अंतर नहीं करता था। कभी किसी के घर चूल्हा जलता था तो उसकी खुशबू कई घरों तक पहुँचती थी।
अब घर बड़े हो गए हैं, कई कई कमरे मौजूद हैं मगर उनमें साथ रहने वाले लोग एक-दूसरे से दूर हो गए हैं।
थोड़ा ठहरिए। अपने भीतर झाँककर देखिए। आखिरी बार बिना किसी वजह के आप कब हँसे थे? कब आपने किसी रिश्ते को इसलिए निभाया था कि वह आपका अपना था, इसलिए नहीं कि उससे आपको कुछ मिलना था? कब आपने किसी के चेहरे पर मुस्कान लाई थी, बिना किसी लाभ और उम्मीद के?
शायद इन्हीं छोटे-छोटे सवालों से हमें समझ में आ सकता है कि हमारे जीवन में क्या बचा है और क्या धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। शिक्षा में भी अब केवल अंकों और रोजगार की तैयारी से आगे बढ़कर जीवन-कौशल, सामाजिक-भावनात्मक विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता को अधिक समझा जा रहा है। लेकिन खुशी कोई ऐसा पाठ नहीं है, जिसे एक पीरियड में पढ़ाकर समाप्त कर दिया जाए।
खुशी घर के वातावरण से भी सीखी जाती है।
माँ की अनकही पीड़ा समझना होगी। पिता के साथ बैठकर बात करनी होगी। बच्चे की बात बीच में रोके बिना पिता को सुनना होगा। और कभी-कभी अपने लिए कुछ खरीदकर नहीं,किसी जरूरतमंद को कुछ दे देने में महसूस करनी होगी। मनुष्य की असली समृद्धि बैंक खाते में जमा पूंजी नहीं होती। वह उन रिश्तों में होती है, जिनके साथ वह अपना सुख और दुख बाँट सकता है। बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन प्रकृति एक ही दिन में जंगल नहीं बना जाती। वह धीरे-धीरे बीज से अंकुर, अंकुर से पौधा और पौधे से वृक्ष बनाती है। हम ही हैं जो जीवन को रातोंरात बदल देना चाहते हैं। सफलता अभी चाहिए, पैसा, पहचान और खुशी भी अभी चाहिए।
हम भूल जाते हैं कि कुछ चीजें समय लेती हैं। बहुत ऊँचाई हासिल करना अपने आप में बुरा नहीं है। लेकिन सफलता की कीमत इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि उसके बदले हम अपने रिश्ते, समय और मानसिक शांति खो दें। तेज दौड़ना बुरा नहीं है। मगर इतना तेज भी मत दौड़िए कि पीछे मुड़कर देखने पर कोई अपना दिखाई ही न दे। आखिरकार, जीवन कोई प्रदर्शनी नहीं है, जिसे दूसरों को दिखाने के लिए सजाया जाए। इसलिए अगर कुछ बचाना है, तो केवल पैसा मत बचाइए। मन की मिट्टी भी बचाइए। उसमें प्रेम के बीज बोइए। कुछ ऐसी शामों के लिए सैर पर निकलिए जिनका कोई उद्देश्य न हो।
पैसे बोने से पहले यह देख लीजिए कि आपके भीतर की मिट्टी अभी जीवित है या नहीं। क्योंकि सिक्के उग आएँ और हँसी सूख जाए, तो ऐसी समृद्धि किस काम की? आखिरकार, जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल पैसा कमाना नहीं, जीना भी है।
और जीना ऐसा कि जब कभी पीछे मुड़कर देखें, तो उपलब्धियों की गिनती से अधिक वे लोग याद आएँ, जिनके साथ हमने अपना जीवन साझा किया था।
वे चेहरे, जिनके साथ हम हँसे थे। वे हाथ, जिन्हें हमने थामा था। वह मिट्टी, जिसमें हमारे बचपन की खुशबू थी। और वह हँसी, जो सिक्कों की खनक में खोने से पहले तक हमारी अपनी थी।
सुंदर बोध देता सृजन
ReplyDeleteबहुत सुंदर लाज़वाब लेख।
ReplyDeleteसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।