Posts

जुगनुओं की तलाश में

Image
कल्पना मनोरमा & यशवर्धन वाजपेयी  चाँदनी फीकी, हवा भी थमी सी है चाँद की आँखों में कुछ नमी सी है।। *** निकला है चाँद लंबे अरसे के बाद चेहरे पे उसके हँसी जमी सी है।। *** रात भर सुनता था किस्से नानी से बिखरे लम्हात में पसरी गमी सी है।। *** निकलता है कौन बिखेरने को उजाले, थमे हुए मौसम में चहल कदमी सी है।। *** जुगनुओं की तलाश में चाँद मिला, फिर भी लगता है, कोई कमी सी है।। यशवर्धन वाजपेयी

गुरु ने लघु को...

Image
    गुरु ने लघु को टेर कर , दिया ज्ञान संधान लघुता जब तक विनित है , गुरु , गुरुता की खान।। कल्पना मनोरमा

उजाले मिटाने लगे...

Image
उजाले मिटाने लगे मुसलसल नाम-ओ-निशां अँधेरे का जब से मलमल-सी हरी चादर में सुराख होना जारी है। कल्पना मनोरमा   

प्रेम-पगी बुद्धिमान स्त्री

Image
लेखिका व नवबधु: प्रियंका दुबे  : प्रेम-पगी! बुद्धिमान स्त्री जब ढलती है दाम्पत्य में तो सम्बंध उसे सुंदर नहीं बनाता वह संबंध के साथ संगम कर बना लेती है स्वयं को प्रेम-संबंध! उसके साथ चलते हैं सपने-अभिलाषा उसके सहयात्री बनकर प्रेमी के प्रेम में पगी सुकुमारी स्त्री अपने हठों को सहयोग-समझ में तिरोहित कर दांपत्य की पाठशाला में सुरुचिपूर्ण खिलने देती है जीवन के श्वेत-रक्ताभ कँवल  बुद्धिमान स्त्री जब ढलती है दांपत्य में तो प्रेमी को तोड़ती नहीं है उसकी डाल से आपसी विश्वास और सम्मान से जोड़े रखती है प्रेमी को उस वृक्ष से जिससे जुड़कर वह बना है उसका प्रेमी! जिसकी छाया में खेला होता है प्रेमी का बचपन कवि,प्रेमी,पति: अंबर पाण्डेय के संग प्रियंका दुबे बुद्धिमान स्त्री उसे सींचती है सद्भावना के जल से संयम-समझ की चादर के बीच काढ़ती है वह अनुभव के प्रेमिल बेल-बूटे आपसी समझ और समर्पण से विवाहित जीवन को बना लेती है प्रेम का मंदिर सहभागिता की प्रविधियों का सामना करती है नेक नियत से और प्रेमी के भरोसे को जीत लेती है विरोधी परिस्थितियों में बन जाती है वह प्रेमी पति की भरोसेमंद साथी    ...

बोले रे पपिहरा...

Image
ये दिन कोयल के नहीं , चातक के हैं। उस चातक के जिसके द्वारा विरह में तप्त नायक या नायिका अपने प्रिय तक प्रेम का संदेश पहुँचाना चाहती है । मगर पपिहे जैसे लेन-देन के बन्धनों से मुक्त  ग्रीष्म ऋतु में कोयल स्वछंद अमराई से लदे बागों की सैर जीभर करती है । जब कोयल सुधायुक्त बोली में  बोलती है तो आम की मंजरियों के बहाने स्थिर व अडिग दरख्तों के स्वर काँपते-थरथराते हुए संगीत बन जाना चाहते हैं। कोयल की कूकों में प्रकृति पंचम-स्वर का आनन्द ले अमराई की मादक गंध में झूमने लगती है। मौसम के अवदान पर मानव मन की थकन , पीड़ा , अवसाद और बेचैनी भी कम समय के लिए सही , कमने ज़रूर लगती है। मगर चातक निर्द्वंदी है। उसमें कोयल की तरह न रिझाने का गुण है और न ही धरती के सरोकारों से कुछ लेना-देना है। हाँ, अपनी पिहू-पिहू से विरही मन की वेदना को बढ़ा कर सातवें आसमान तक लगा देता है ।  पपिहे की पिहू पिहू विरह वेदना में जकड़ी नायका को पिया-पिया सुनाई पड़ने लगती है । पर  चातक एक ऐसा जीव है जो टकटकी बांधे बस आसमान को एकटक  निहारता रहता है। आसमान की छाती पर छाए काले मेघों में स्वाती नक्षत्र की बूँदें...

एक नई शुरुआत

Image
चित्र : गूगल से साभार    एक नई शुरुआत   वे खुशनुमा मार्च के दिन थे। गुनगुनी बताश में तितलियाँ अठखेलियाँ कर रही थीं। सुनहरे दिनों की आमद , ललिता के घर काम का सैलाब ले आई थी। ऊनी कपड़ों की पोटलियों में नैपथलीन की गोलियाँ डाल कर संदूक में सुरक्षित कर दी गई थीं। गर्मी के कपड़े दुरुस्त किए जा रहे थे। पुरानी साड़ियों की धज्जियों से पांवदान बनाये जा रहे थे। नयी साड़ियों में फ़ोल टाँकी जा रही थी और उनके मैचिंग ब्लाउज सिले जा रहे थे। बची कतरन से हथपंखों में फुंदने लगाए जा रहे थे। बिजली चली जाने पर इन्हीं पंखों का उपयोग ललिता चाव से किया करती थी। इस तरह समझा जा सकता था कि वह भले नौकरी-पेशा स्त्री नहीं थी पर कामों की उसके पास कोई कमी नहीं थी। पति के ऑफिस की पार्टियों में जाना , सैर करना , कहीं घूमने-फिरने के लिए जाना और किसी के पास बैठकर खाली समय में बिताने को वह पाप समझती थी। वहीं उसका पति उसके इस तरह के जीवनयापन पर उसे अन्तर्मुखी , घुन्नू , घर-घुस्सू , अकुशल एवं अव्यवहारिक स्त्री कहता थकता ही नहीं था। ललिता को इस बात का कोई मलाल भी नहीं था।     " किसी को कुछ भी मान लेने में...