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माँ बच्चों का बसंत

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माघ में ब्याह कर  पिता के घर आई माँ  फागुन में  पतझड़ की चपेट में आ गयी  तब से कई बसंत गुजर  चुके हैं  उसकी देह से  एक कली न फूट सकी  जब माँ में ख़ुशी का  एक भी कल्ला नहीं फूटा तो इस भौतिक संसार में  बंसत की चाल सिखाने से  वंचित रह गई  एक स्त्री  दूसरी स्त्री को  माँ बच्चों का बसंत होती है अगर माँ नहीं  खिले  तो बच्चे भी पूर्ण नहीं खिलते  और इस तरह  रह जाते हैं   कुनबे बेरंग  भरे बंसत में ... ! ***

कोई भी अपेक्षा

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  मिल सको तो प्रेम तुम उस ठौर मिलना हो नहीं जिस ठौर कोई भी अपेक्षा।।   मत उलझना प्रेम की बेसुध लिखावट में और ना पतझड़ सरीखी खड़खड़ाहट में मौन छाना क्षितिज पर , फिर लौट आना सूर्य के आलोक में ले धूप सी प्रेमिल तितिक्षा।।   हो सके तो हर छुअन से मुक्त रहना पर नहीं करना किनारा , हवा-से नजदीक बहना फूल को भी लग सके ना चोट लेकिन पर सुगंधित ओज लेकर लौटना बनकर शुभेच्छा।।   पुलक में हंसना खुशी में साथ देना पर नहीं प्रतिदान में मन को लगाना जलज में जल है मगर दिखता जलज ही प्रेम तुम सम्पूर्ण की करना समीक्षा।।

कन्यादान

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( सयानी लड़की की डायरी से) चित्र : गूगल से साभार  10 माघ 2000   आज सुबह से घर में मेरे सयाने होने के चर्चे हिकारत के साथ चल रहे थे। बाबूजी ने शाम की चाय पर एक बैठक बुलाई थी। उसमें बड़े दादाजी , अपने बेटे अनिल चाचू , बड़ी बुआ और पूजा बुआ के साथ आए थे। सभी मेरे कमरे की ओर इशारा करते हुए बातें कर रहे थे। लग रहा था जैसे कि मैं अपराधी हूँ। तू बता ,  सयाने होने में क्या मेरा दोष है ? माँ जब चाय देने आयीं तो ” नीम चढ़ी करेली। ” कहकर दादी , माँ को चिढ़ा रही थीं। माँ बेहद चिंतित दिख रही थीं। “ ऐसा करो किशोर , गढ़ी वाले ज्योतिषी जी को अपनी बिटिया का हाथ दिखवा ही डालो। रोज़-रोज़ का तुम्हारा सर दर्द दूर हो जाए, बड़े पहुँचे हुए संत हैं। दो वर्ष हुए न! तुम्हें लड़का खोजते ?” बड़े दादाजी ने बाबूजी से ये कहते हुए पूछा था। बाबूजी ने मुरझाया - सा अपना चेहरा हाँ में हिलाया और मौन हो गए। गमगीन माहौल को देखते हुए उदास सभा समाप्त कर दी गयी।   25 माघ 2000  आज दादाजी वाले ज्योतिषी जी आए थे।  कह रहे थे, “ यजमान , आपकी पुत्री सौभाग्यशालिनी है। अच्छा घर-वर मिलने की पूरी संभावना है। ज...

बात नई किताब की ....

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  ओढ़कर अपना आत्मविश्वास   तुम बना डालो अपने   सबसे थके दिन को अमर जिंदगी का अभियान सालों में नहीं   प्रत्येक दिन में छिपा है सोचकर ये बना लो   जीवन की धूप से माँग टीका   सबसे ज्यादा ज़रूरी है  तुम्हें  अपने लिए सुहागिन बने रहना.   इस संग्रह की ज्यादातर कविताएँ स्त्री-सम्बंधी हैं। फिर भी मैं कोई नारेबाजी न करते हुए प्रचलित रूढ़ियों का विखंडन ही इनका स्थाई स्वर मानती हूँ। मैं चाहती हूँ कि अपनी मुक्ति की कामना के लिए स्त्री अपने जाग्रत अवस्था में स्वयं संघर्षरत रहे। वह किसी के प्रति किसी भी प्रकार की अपेक्षाएँ न करते हुए अपनी भूमिका लिखे। वैदिक या आदिकाल की स्त्री-भूमि को अगर देखा जाए तो स्त्री-पुरुष की जमीन साझी दिखती है। अनुभूति और अभिव्यक्ति के दायरे में खड़ी स्त्री कभी भी कमजोर नहीं हो सकती ,  बस उसे अपनी बात कहने में धैर्य और सहानुभूति की अभिलाषा का रुख अपनी ओर मोड़ना होगा। जिस तरह कविता को हमेशा विवेकवान , भावनात्मक , समन्वय-सक्षम , समाज-संरचना में दूरदर्शी दूरबीन सरीखी मानती आई हूँ ,  उसी तरह स्त्री की मेधा काम करे और वह अपने युद्ध...

पड़ोसी के गुलमोहर पर आया बसंत

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माघ विदा हो रहा है। ठिठुरती ठंड उसी के साथ जाने को मचल रही है लेकिन माघ भी कम चालाक नहीं , उसने मुस्कुराकर ठंड का हाथ फागुन के हाथ में पकड़ा दिया। फागुन ने काँपती बूढ़ी ठंड को झटपट धूप का गुनगुना स्वेटर पहना दिया। स्वेटर पहनकर वृद्धा ठंड संतुष्ट प्रेमिका की तरह मुस्कुराकर इतराने लगी। फागुन ने ‘ कड़ाके की सर्दी ’ का नाम बदलकर ‘ गुलाबी सर्दी ’ रख दिया। बच्चों ने अपने स्वेटर उतार कर फेंकना शुरू कर दिए। थोड़े ही दिनों में फागुन की हवा में जमा-सिमटा दुबका पड़ा भू-भाग अचानक रूखेपन से जूझने लगा।   फागुन की झोली से धीरे से पतझड़ निकल कर चारों ओर बिखर गया तो बाग़-बगीचे सहम गए। नीम के नीचे पीले पत्तों का समुद्र बह निकला। डालियों ने पतझड़ को गलबहियाँ डालने से इंकार किया लेकिन उनकी जिद ज्यादा दिन चल न सकी। बदलते मौसम की पलक झपकते ही चारों ओर तीव्र पतझरी संगीत गूँज उठा और न चाहते हुए भी डालियों को समर्पण में अपने हाथ उठाकर काया पतझड़ को सौंपनी पड़ी। पतझड़ के दिन अबोली चुप्पियाँ लिए विकल वैरागी की तरह इतने भटके कि शामें अनमनी हो खुशियों की परिधि के बाहर छिटक गयीं। जीवन-सरिता मौसम की संधि-शून्यता म...

ऋतुपति आवे पाहुना

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फागुन जूड़े में लगा , चली बसंती नार ऋतुपति आवे पाहुना , झुक गई मन की डार!!   चलो सखी बगिया चलें , लाएं चुन कचनार मदन सजीला आएगा , पहनेगा उर हार।।   मन पाखी उड़ता फिरे , खोजे मन का मीत पात पात मिल गा रहा , बासंती मन गीत।।   हवा जोगिया बन चली , धूप बनी तलवार सूरज बोला नेह से , ठंड गई उस पार ।।   आओ नभ से उतर कर , कामदेव महराज धरती ठिठुरी पड़ी है , साधो इसके काज।।  

मौसम के उन्माद में

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  फागुन के संग आ गया , खेतों में ऋतुराज। डाल डाल पर उग गए , खुशियों के नव ताज।।   लगे डोलने हृदय फिर , कृषक हुए सौमित्र। माटी भी उनको लगे , चंदन का ज्यों इत्र।।   पतझड़ में जब बोलती , संध्या रूखी बात। लिए पोटली खुशी की , मौन पसरती रात।।   मौसम के उन्माद में , मौन हुए वाचाल। ताल पोखरे मचलते , ओढ़ बसंती पाल।।   घरनी बोली कृषक से , चलो कंत उज्जैन कृषक बोलता प्रिया से , सुनो कोयली बैन।।