Posts

दिन के अँधेरे

Image
प्रयाग शुक्ल जी के चित्र का चरित्र चित्रण(2) रात के अँधेरों से ज्यादा खतरनाक दिन के अँधेरे होते हैं। कई-कई बार नौजवानों को इन्हीं से मुठभेड़ करते देखा है। दिन के अँधेरों में दिखने वाले तारे टिमटिमाते नहीं और चाँद जादुई रंगत नहीं बिखेरता। रात जैसी आत्मीयता भी दिन के अँधेरों के पास नहीं होती। निरंतर यात्राएँ मन को थकान से तब भरने लगती हैं जब उनके दृश्य अंदर की ओर न खुलकर , बाहर की ओर खुलते हैं। बाहर के दृश्य इतने उथले और बेजान होते हैं कि धूप से तपे हुए दृश्यों में जमा ठंडापन किसी यातना से कम नहीं लगने लगता। जीवन की खदान , कोयला खदानों से कम नहीं होती। हाँ , फ़र्क बस इतना हैं कि जीवन की खदानों में इंजीनियर , खल्लासी , टोर्चमैन से लेकर अंतिम मजदूर तक सिर्फ़ हम ही हम होते हैं। चलो हम ये सोच भी लें कि अपने हाथ जगन्नाथ , फल प्राप्ति का महान अवसर है लेकिन इतनी एकाग्रता लाएँ कहाँ से जो अभीष्टता को प्राप्त हो सकें। अब देखो न! सबसे प्रिय कार्य , संगीत सुनते-सुनते हम कभी भी बच्चों की पेरेंट्स मीटिंग में अध्यापकों से झगड़ने पर पहुँच जाते हैं , पड़ोसियों के झगड़ों में बीचबिचाव कर किसी की सहानुभूति ...

शिक्षा कहती है .....

Image
  जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गयी स्त्री के कार्य क्षेत्र से अवगत मेरी माँ ने कराया। माँ का गहराई से मानना था कि स्त्री का दायरा समस्त भूखंड है और हर काम में उसकी भागीदारी निहित है। ऐसा कोई काम नहीं, जिसके लिए उन्होंने न अपने आप को सीखने से रोका और न ही मुझे ये बताया कि ये तुम्हारा काम नहीं और ये तुम्हारा ही काम है। वे परिधि का मान अपने प्राणों जितना रखते हुए सभी से यानी  कि चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी से खुले मन से बात करती थीं। समानता से बात करते हुए खुद को संरक्षित किये रहना उनका सहज स्वभाव था, जो मेरे भीतर भी शायद बह आया है। वे हमेशा कहती थीं कि,"स्त्री को अपने शरीर के बाहर रहकर खुद को मनुष्य बनाए रखना होगा ।" इस समझ के प्रति श्रद्धा भी  उन्हीं की देन है। स्त्री आज़ादी में शिक्षा को वे बहुत बड़ा टूल मानती थीं।   चित्र को देखते हुए- सही मायने में स्त्री की आज़ादी यहीं से शुरू होती है। जिस दिन स्त्री खड़िया पट्टी उठा लेती है , उस दिन से उसके मन के बाहर-भीतर उजाला होना शुरू हो जाता है। उसके आसपास एक ऐसा दर्पण अवतरित होता है जिसमें वह सभ्यता की परछाइयों को देखना शुरू ...

हरसिंगार वाले दिन

Image
हरसिंगार वाले दिन माने, मेरे बचपन का हरा उमंगित रंग ,  उत्सव की समृद्धशाली गमक , माँ का गीला स्नेह , सपनों का मोहक संसार ,  शाम ढले पखेरुओं की कतारें में पंछिओं को गिनने की खुद से होड़, प्रकृति के सानिध्य की परिकल्पना में निजता पुष्पित होने का प्रतिक है।  आज भी जब हम कंक्रीट के जंगल में समय बिताने के लिए मजबूर हैं तब भी हर वर्ष अश्विन मास की आबोहवा में जो सौंधापन घुलकर मेरे पास तक चला आता है, वह हमारी जड़ों द्वारा सोखी हुई ताजगी है जो कभी सूखती नहीं । यह समय  दुर्गा माँ की मर्यादाओं का घंटनाद  वातावरण में व्याप्त कर स्त्री की भूमिका को चौमुख दीया जैसा दमका जाता है। बरसाती मन निर्मल पवन की तरह उल्लासित हो स्मृतियों की भूमि पर चुए हरसिंगार चुनने दौड़ पड़ता है । हरसिंगार के फूल रात की आँखों में फूले प्रकृति के सपने होते हैं, जो सूरज की पहली किरण पर पृथ्वी पर बरसकर अरुणोदय को अपना श्वेतवर्णी आह्लाद  सौंप देता है  और पवन के दुपट्टे पर इत्र की नरम फ़ुहार छिड़क कर अपना जीवन धन्य बना लेता है । इस मौसम में क्षितज का पसीजना शुरू होना और वनस्पतियों को ओस का मिलना ऋतु...

हम किसी भी तरह बच जाना चाहते हैं

Image
    विदाई के वक्त मन भारी न हो तो वह मन कैसा ? मन प्रेम में पिघल कर आँखों के रास्ते बहे नहीं तो वह प्रेम कैसा? जब प्रेम में विरह फूटता है तो प्रेम की जड़ें कानों के आसपास अँखुआती हुईं महसूस होती हैं। हृदय की दीवारों को प्रेम का स्फुरण धीरे-धीरे प्रेमी को भिंगोता हैं--- जैसे बरसात की नरम फुहारें किसी मिट्टी के घर को भिंगोती हैं। मन की डाल पर देखते ही देखते प्रेम का फल नहीं लगता। पहले आँसुओं की लड़ियाँ गालों को भिगोते हुए तसल्ली से किसी एकांत पल में प्रेम के बिरवे को सींचती हैं तब कहीं कोई कली चटखती है। प्रेम की कली कपास की नहीं कमल की तरह होती हैं ।   प्रेम प्रेमी को चीखने कहाँ देता है? अगर प्रेम प्रेम कर कोई चीखता फिरे तो वह प्रेमी कैसा? प्रेम के आँसू गाढ़े होते हैं। वे ज्यादा देर बहते नहीं, आँखों के किनारों पर चिपक जाते हैं मौन। जैसे रात का स्याह अँधेरा किसी की आँख का काजल नहीं बनता पर प्रकृति की ऊँच-नीच छिपाकर समता भर देता है। उसी तरह धूप को कूट-पीटकर गहने में नहीं ढाल सकते पर धूप पिए गेंहू ही हमें पोसते हैं। गगनचुंबी टहनियों पर टांग भले दो मन को पर हवा के झोंके उस...

आँसू हृदय की अनुशंसा हैं

Image
"हालात कैसे भी हों बहादुर कभी रोया नहीं करते, सीने में जिनके सीखने का जूनून हो वो कभी हिम्मत खोया नहीं करते ।" -डॉ. विवेक बिंद्रा  उक्त कोट को पढ़कर ज़रा-सा भी इसे मानने को दिल नहीं मानता। हालाँकि इस तरह की कोटेशनबाजी हमारी पीढ़ी के बचपन ने खूब सुनी होगी और ये उक्ति खूब चर्चित होते हुए भी देखी गयी होगी। इस करुणा कलित हृदय में/ अब विकल रागिनी बजती क्यों हाहाकार स्वरों में/ वेदना असीम गरजती ?/ मानस सागर के तट पर/ क्यों लोल लहर की घातें कल कल ध्वनि से हैं कहती/ कुछ विस्मृत बीती बातें ? आती हैं शून्य क्षितिज से/ क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी टकराती बिलखाती-सी/ पगली-सी देती फेरी ? रोना यदि कायरता की निशानी होता तो महाकवि जयशंकर प्रसाद जी अपनी कविता का कथ्य आँसू को क्यों बनाते। क्यों वे आँसू ग्रन्थ लिखते? खैर , इस बात के इतर भी अगर देखें तो आज़ के समय में हो या बीते हुए वक्त में , ये कहना कितना गलत होगा कि बहादुर रोया नहीं करते । क्यों भई बहादुरों के पास दिल नहीं होता? या उनकी महसूस करने की क्षमता बहादुरी सीखने में क्षीण हो जाती है?  जबकि रोना एक बेहद सहज प्रक्रिया है। इंसान माँ की...

माँ! तुम मुझमें ज़िन्दा हो

Image
  ये श्राद्ध वाले पुरखों को स्मरण करने के दिन हैं। मैंने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की महीन विभाजित रेखा को समझने वाली , स्वतंत्रता को संबल देने वाली और अपने सम्पूर्ण स्त्रीत्व को दृढ़ता से सहेजने वाली माँ को याद कर मानो उनकी संगत का सुख ले लिया है। आप जहाँ हों , स्नेह करने वाले लोगों से घिरी हों प्रिय माँ! आपकी सदा ही जय है ❤️ आप अगर ये कहते हैं कि आज के समय में ही स्त्री जागरूक हुई है , तो ऐसा भ्रम मत पालिए जनाब! स्त्रियाँ सदियों से जागरूक होती आ रही हैं। हाँ , जागरूक स्त्रियों के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी अब दिनोंदिन बढ़ती जा रही है , जो स्त्री के नाते सुखद मानती हूँ। मैं अगर अपनी बात करूँ तो सदियों पहले की तो नहीं , लेकिन अपनी तीन पीढ़ी की महिलाओं के बारे में ज़रूर जानती हूँ। दादी और उनकी माँ , नानी और अपनी माँ! इन सबमें मेरी माँ बेहद सजग और जागरूक महिला थीं। वे लोगों की मतलब पुरुष और स्त्रियाँ जो अपने वजूद से अनभिज्ञ होती थीं , उनकी चालाकियाँ , चापलूसियाँ , बातों की हेराफेरी , कार्मिक कुटिलताओं की मुर्कियाँ और पुरुषगत भीरू नियति को चुटकियों में पहचान कर उसके प्रति अपना मौन विद्र...

हिंदी की जय हो

Image
चित्र: अरुण मिश्र  एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों , संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहिका , संप्रेषिका और परिचायिका भी है। हिंदी का व्याकरण और भाषा सरल , सहज और सुगम होने के कारण वैज्ञानिक भाषा के रूप में इसे जाना जाता है। हिंदी को दुनिया भर में समझने , बोलने और चाहने वाले लोगों की बहुत बड़ी संख्या मौजूद हैं। आजकल तकनीकी हस्तक्षेप ने हिंदी को जो त्वरा प्रदान की है वह उत्साहजनक है। मीडिया के विविध आयामों ने दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले जनों को भले संकुचित व्याकरणिक ज्ञान होने पर भी अपनी बात दूर तक पहुँचाने का जो अवसर दिया है , उससे हिंदी संवाद का दायरा बढ़ा है।   आज महानगरों में टेढ़ी-मेढ़ी ही सही युवा हिंदी में बात करते हुए देखे जा सकते हैं। यहाँ तक आकर कहा जा सकता है कि हिंदी का भवन विशाल है। उसके भवन के हाथीद्वार पर अलंकारों की महराबें हैं तो समृद्ध व्याकरण का उसका सिंहासन है। अपने आसन पर सुशोभित हिंदी के चरणों में नौ रस युक्त गंगा-जमुना बहती हैं। हिंदी के हाथों में छंदों के कमल हैं तो पाँवों में गीतों की पैजनियाँ। होंठ...