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"बाँस भर टोकरी" पर उषा की प्रतिक्रिया

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  कहते हैं कविता एक कवि की भावनाओं का उद्घाटन है। कविता कवि की संवेदनाओं का प्रवाह है। जिसके कारण वह अपने भावों को व्यक्त कर पाता है। ऐसा ही काव्य संकलन ' कल्पना मनोरमा ' जी की कविताएं का भी है। जिन्होंने बहुत ही शांत भाव से अपनी कविताओं को व्यक्त किया है। ' बांस भर टोकरी ' की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा शांत भाव का माहौल पैदा हो जाता है , जैसे कोई प्रेमी अपने मनोरम प्रेम में डूबे हुए अपनी प्रेमिका की प्रतीक्षा की राह देख रहा हो। कल्पना मनोरमा जी ने इस काव्य संग्रह का नाम बिल्कुल सटीक दिया है। ' बांस भर टोकरी ' जो मानवीयता के विराट दर्शन की ओर इशारा करती है । यदि हम यहाँ टोकरी को स्त्री और बांस को ईश्वरीय तत्व का प्रतीक मान लेते हैं , तो कवयित्री का कहना बिल्कुल सही ठहरता है। जिस विराटता का अंश पुरुष है तो स्त्री भी उसी का अभिन्न अंग होती है। फिर समाज के प्रति इतना भेदभाव क्यों ? ' मनोरमा ' जी ने अपनी कविताओं में एक ऐसी औरत की खोज की है जिसकी चेतना स्वतंत्रता की मांग करती है। दरसल आज औरतों के हिस्से में जो कमोबेश आजादी आई है। वह अधूरी है। स्त्री या पुरुष...

"चाहना" शब्द सजीव होता है. है न!

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विश्व पुस्तक दिवस पर  पुस्तकें कभी भी शोर पसंद नहीं करती हैं। वे अपने इर्दगिर्द सदा ही आर्य मौन चाहती हैं। ये आदत किताबों को लेखन ने डाली है। जब एक प्रबुद्ध लेखक किताबों के लिए भोज्य इकट्ठा कर रहा होता है तब वह निचाट अकेला होता है और जब किताबों का मन बुन रहा होता है तब वह संसार के अनुभव को साथ लेकर लोक की चिल्लाहट से परे एक कोने में डटा होता है। लेखक अपना इतना मानसिक शोधन करता है कि पुस्तकें इसकी आदी हो जाती हैं। बुद्ध के अनुयायी ये बात जानते हैं कि सच्ची ख़ुशी आँखों के झरोखे बंदकर आर्य मौन भरकर घटाकाश में बैठने पर ही संभव हो सकता है। ये बात किताबों ने अपने लेखक से सीखी है इसलिए वह अपने पाठक को बताती है।   जितना एकांत पुस्तकालय उतनी ही ज्ञान की ऋचाओं का गुंजन। आपने देखा होगा संसार में जिस घर में बर्तनों और भौतिक वस्तुओं से ज्यादा पुस्तकें होती हैं , उस घर में शब्दों की सरगोशियाँ सहज ही वहाँ के वातावरण में महसूस की जा सकती हैं। किताबों वाले घर के सदस्यों के मुँह में लगाम नहीं लगी होती है। बल्कि वैचारिक रूप से सदस्य लगाम महसूसते रहते हैं। तभी तो शायद वे रुककर , सोचकर और च...

बाँस की बेटी

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  क्या बाँस की बेटी से आप मिले हैं ? " बाँस भर टोकरी" से यदि बाँस की बात कही जाए तो वह अपनी कठोरता और पोलापन अपनी बेटियों को कभी नहीं सौंपता। बाँस भी हम मनुष्यों की भांति अपनी बेटी को सदैव सहनशीलता और भावुकता से भरे रहना सिखाता है। तभी तो बाँस की बेटियाँ , टोकरियाँ भी अपनी अपरमित उदारता से संसार का हर दिया हुआ चुपचाप अंतर में सहेज लेती हैं।  बाँस की टोकरियों में आप चाहें तो फूल सजाएँ या सब्जी-भाजी , फल , रद्दी पेपर , विदाई के माठ , मिठाई और पुए भरें या फिर कूड़े-कचरे के लिए उन्हें चुन लें। वे मौन रूप से अपने आकार भर सब कुछ स्वीकार कर लेती हैं। वैसे आप देख सकते हो जब टोकरियाँ खाली होती हैं तब उनमें आसमान भरा होता है। पिता बाँस जब अपनी पुत्री के औदार्य को निहारता है तो निहाल हुए बिना नहीं बच पता है। बेटी की उदारता पर बाँस सोच-सोचकर हैरान होता रहता है कि उसकी बेटी उसका नाम कितनी सुंदरता से हर कोने रोशन कर रही है। जब बाँस टोकरियों को फूलों से सजा हुआ देखता है तब तो उसका मन हरा हो लहक उठता है। और इस तरह पिता संतति में अपने पोले अस्तित्व को पल दो पल ही सही भूल जाता है। बेटियों के स...

इलाइची का पुष्प

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  हर फल से पहले संसार में उसका फूल आता है , जो बेहद कोमल और सुंदर होता है। क्या मनुष्य का भी.... ? निश्चित ही। शारीर विज्ञान पढ़ने और पढ़ाने वाले बताते हैं कि मानव फूल भी बेहद खूबसूरत और मोहक होता है। खैर , यहां बात हो रही है छोटी इलाइची के फूल की जो अपने आप में बेहद आकर्षक लग रहा है। इलाइची की खुशबू से कौन परिचित न होगा! वैसे फूल बांस का भी बहुत सुंदर होता है किंतु उसे शुभ नहीं माना जाता किंतु बांस इस भाव से परे ही रहता है। प्रकृति की संरचना में उपजती सृष्टि अभिष्ठ तो होती ही है साथ में उसकी निरापद अबोधता मन को बांधती भी है। प्राकृतिक रौ में सोचकर देखो तो बुरा भी लगता है कि जो तत्व अबोला और अहेतुक होता है , भला उसे शुभ अशुभ की डोर से कैसे बांध दिया जाता है। मुझे लगता है ईश्वर की संरचना में मनुष्य को छोड़कर किसी में भी अपने होने का अहम नहीं होता तो उसमें शुभता और अशुभता की मुहर लगाना क्या उचित होगा ? एक बात , दूसरे किसी एक व्यक्ति का अनुभव सभी प्राणियों का अनुभव नहीं बन सकता है तो फिर गांठ किस बात की ? हां , यहां से रूढ़ी पंथ का जन्म ज़रूर होता है जो जीवनपर्यन्त एक खुश मिजाज़ आ...

नहीं लगता डर

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  नहीं लगता डर उन स्त्रीयों से जो होती हैं स्वाभाव से झगड़ालू न ही वे स्त्रियां खटकती हैं हमारी आपकी आँखों में जो बात बात पर बैठ जाती हैं फुलाकर मुंह अपना न ही वे स्त्रियां बुरी लगती हैं जो जन्म के साथ मौन लेकर होती हैं अवतरित न ही वे स्त्रियां खलती हैं किसी को भी जो कहने को सत्य कर बैठती हैं बतंगड़ खड़ा डर उन स्त्रीयों से लगता है जो किसी की अधसुनी बात को दौड़ पड़ती हैं लेकर आधी रोटी पर दार की तरह खाने परोसने वे साधती हैं निशाना हवा में और देती हैं तूल इतना कि लगने लगती है बे बात की बात भी अच्छे अच्छों को एकदम सच्ची लेकिन जब आता है वक्त करने को आमना सामना बन जाती हैं वे स्त्रियां कछुआ और छिपा लेती हैं मक्कारी भरा अपना सर सुरक्षा कवच के भीतर मामला ठंडा होने तक।  

बाँस भर टोकरी

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  कविता साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी विशेष परिस्थिति में उपजे अंतर्मन के भावों को सुरुचिपूर्ण शब्दों में कलात्मकता से व्यक्त किया जाता है। कविता के भीतर जो रस रचता बसता है , वह रचनाकार की उस विशेष परिस्थिति की मानसिक उपज होती है जिससे प्रभावित हो कर वह अपने भावों को कलमबद्ध करता है। जैसा कि साहित्य दर्पणाकार ‘विश्वनाथ जी’ कहते हैं कि “रसात्मक वाक्य ही काव्य है। रस अर्थात मनोवेगों का सुखद संचार ही काव्य की आत्मा है।” तो ‘कल्पना मनोरमा’ की कविताओं की आत्मा में रची बसी रस गंध तो पढ़ने के बाद ही महसूस करुँगी फ़िलहाल उनकी कवितासंग्रह ‘बाँस भर टोकरी’ का आवरण देख कर अत्यंत सुखद अनुभूति हो रही है। बाँस जन्म से ले कर मृत्यु पर्यन्त हर सुख दुःख में हमारे उपयोग में आता है। फिर वह सूप हो , टोकरी हो , माड़ो(मंडप) हो या मृत्यु शैय्या! सभी जानते हैं कि बाँस आजीविका का साधन भी है। जैसा कि चित्र से भी ध्वनित हो रहा है। खैर...आज कविता दिवस पर आपके दूसरे काव्य संग्रह ‘बाँस भर टोकरी’ हेतु अनेकानेक बधाइयाँ लेखनी की निरंतरता बनी रहे। शुभकामनाएँ !! टिप्पणीकार मीनाधर  

तुम घबराना मत!

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  जब लगने लगे दुनिया में तुम्हें चाहने वाला कोई भी नहीं बचा है , तो भी तुम घबराना मत! न ही भयाभय सन्नाटों से मात खाकर आत्मदाह करने की सोचने लगना। हाँ , एक काम तुम ज़रूर करना। तुम खुद को बेजोड़ चाहने लगना।फिर देखना समय तुम्हारे लिए हँसी और मानवीय पहलकदमी के कैसे-कैसे मौके खोज-खोज कर जोड़ लाएगा कि तुम दंग हुए बगैर न बच सकोगे।  लेकिन ये सब कुछ बहुत जल्दी , पलक झपकते नहीं होगा इसलिए तुम्हें धैर्य धरना भी सीखना होगा। ***