बाँस भर टोकरी

 

कविता साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी विशेष परिस्थिति में उपजे अंतर्मन के भावों को सुरुचिपूर्ण शब्दों में कलात्मकता से व्यक्त किया जाता है। कविता के भीतर जो रस रचता बसता है, वह रचनाकार की उस विशेष परिस्थिति की मानसिक उपज होती है जिससे प्रभावित हो कर वह अपने भावों को कलमबद्ध करता है। जैसा कि साहित्य दर्पणाकार ‘विश्वनाथ जी’ कहते हैं कि “रसात्मक वाक्य ही काव्य है। रस अर्थात मनोवेगों का सुखद संचार ही काव्य की आत्मा है।” तो ‘कल्पना मनोरमा’ की कविताओं की आत्मा में रची बसी रस गंध तो पढ़ने के बाद ही महसूस करुँगी फ़िलहाल उनकी कवितासंग्रह ‘बाँस भर टोकरी’ का आवरण देख कर अत्यंत सुखद अनुभूति हो रही है। बाँस जन्म से ले कर मृत्यु पर्यन्त हर सुख दुःख में हमारे उपयोग में आता है। फिर वह सूप हो, टोकरी हो, माड़ो(मंडप) हो या मृत्यु शैय्या! सभी जानते हैं कि बाँस आजीविका का साधन भी है। जैसा कि चित्र से भी ध्वनित हो रहा है।

खैर...आज कविता दिवस पर आपके दूसरे काव्य संग्रह ‘बाँस भर टोकरी’ हेतु अनेकानेक बधाइयाँ लेखनी की निरंतरता बनी रहे। शुभकामनाएँ !!

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टिप्पणीकार मीनाधर

 

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