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वसंत के केंद्र में प्रेम की ज्योत्सना

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    पत्रिका पृष्ठ की तस्वीर  हमारी हथेलियों की तरह पृथ्वी की हथेली  में भी मौसम की अमिट रेखायें और ऋतु चक्र होते हैं। उसी के अनुसार संसार अपने आप को प्रकाशित करता हुआ सदा सृजनशील रखता है। हम कह सकते हैं कि जीव-जगत एक दूसरे के पूरक हैं। मौसम की मुट्ठियों में हमारे जीवन की मिठास-खटास सुप्त रूप से बन्द पड़ी होती है। मौसमों की करवटों में सांसारिक जीवन सार निहित है। अब देखो न! नितांत ठिठुरती सर्दी की ऋतु जैसे ही अपने प्रिय के गुनगुने देश जाने को उत्सुक होती है , ऋतुराज की पालकी संसार के दुर्गम पथ पर चुपके से उतर आती है। चारों ओर ठिठुरे उपवन और डालियों में फलने-फूलने की अदम्य लालसा अचानक बलवती होने लगती है। धरती की नवतिका गतिविधियों का समाचार सबसे पहले पवन को प्राप्त होता है। पवन तत्क्षण अपने तेवर बदल कर मौसम के अनुकूल अपना साफ़ा लहराने लगता है। सर्दी की विदाई की चिट्ठियाँ गेंदे के कत्थई फूलों के साथ समीर ज्यों ही बाँटना शुरू करता है सबसे पहले बेघरों को राहत मिलती है। सड़क के किनारे जर्जर फ़ुटपाथों पर मुस्कानें भले मैली-कुचैली हों , लौटने लगती हैं। ठंडे पड़े उनके चूल्हों में आ...

रिचुय्ल

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निक्कू का बचपन वैसा ही था जैसा कि सभी बच्चों का होता है। भाई के साथ मौज-मस्ती,   माँ की लोरी  के साथ  दूध-भात-रोटी और दोस्तों के साथ खेलना। लेकिन उसका दिमाग़ तेज़ था। इस बात का अंदाजा तब लगया गया जब निक्कू खिलौनों को छोड़ पेन-पेपर की ओर आकर्षित हो गया था । जिस उम्र में बच्चे घोड़ा , हाथी , बंदूक और चोर-सिपाही वाले खेल खेलते हैं , निक्कू बेढंगे ही सही कागज़ों , दीवारों व फर्श पर चित्र उकेरने लगा था। भाई की नोटबुक पर पेन्सिल चलाना पहले तो शैतानी में गिना गया लेकिन प्रयोग के तौर पर उसकी माँ निक्कू को पेपर-पेन्सिल पकड़ाने लगी थी। तिरछी-सीधी रेखाएँ या उलझे हुए गोले बनाने में निक्कू खूब किलकता। उसके इस खेल पर मोहित उसकी माँ को लगने लगा कि बड़ा होकर निक्कू ज़रूर चित्रकार ही बनेगा। उसका एक कारण ये भी था, निक्कू रेखाओं को एक दूसरे के साथ इस तरह जोड़ता कि देखने वाले को पेपर पर किसी न किसी चित्र की शक्ल उभरी हुई दिखती।  जब निक्कू थोड़ा बड़ा हुआ तो एक दिन उसका रेखा-स्वांग जलपरी की आकृति लेकर पेपर पर उभरा। माँ ने रबड़ से थोड़ा सुधार दिया! फिर तो निक्कू के पिता भी उस चित्र को जलपरी कहने लग...

जन्मदिन शुभ हो मेरे लाल!!

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  यशवर्धन  बचपन एक ऐसा भाव होता है जो बेहद नाजुक और कोमल मन वाला होता है. व्यक्ति उसमें सदैव तटस्थ रह नहीं सकता   लेकिन कामना करता रहता है. तुम कितने भी बड़े क्यों न हो जाओ हमारे लिए तुम उतने ही छोटे हो जितने 8 फरवरी 2002 में मैंने तुम्हें मिलिट्री होस्पिटल अहमदाबाद में पाया था. तुम से मिलाने वाले  डॉ. गंगाधरन की शुक्रगुजार हूँ. साथ में अपनी प्रिय मित्र ममता राय जी की भी मैं आभारी हूँ. तुम्हारे जन्म के समय सोने की सलाई से ॐ शब्द का लेखन उन्हीं के  हाथों संपन्न हुआ था. ये सभी मुझसे ज्यादा ख़ुशी मनाने वाले व्यक्ति   थे. डॉक्टर गंगाधरन के साथ नर्स स्टैला की भी मैं शुक्रगुजार हूँ जिसने अपनी ममता का पयपान तुझे कराया क्योंकि मैं उठने-बैठने में भी असमर्थ थी. तू भूख से कुनमुना रहा ही था कि तभी डॉ. गंगाधरन राउंड पर आ गये. उन्होंने स्टैला से पूछा ," स्टैला तेरी बेटी फ़ीड करती है न ?" " यस सर! " जैसे ही नर्स ने हाँ बोला वैसे ही डॉ. गंगाधरन ने कहा 'मास्टर बाजपेयी' को फीड करा दो. तत्काल उसने उनकी आज्ञा का पालन किया. यहाँ तक तुम्हारी छठी पूजा भी मिलिट्री होस्पिटल में नर्स स...