स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल*



*स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल*

बुनियादी चिंतन: बालिका से वामा।।स्तंभ 44

विरासत का अर्थ केवल भूमि, संपत्ति या आभूषण नहीं होता। हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को विचार, जीवन-मूल्य, अनुभव, स्मृतियाँ और जीवन जीने का ढंग भी सौंपती है। स्त्रियों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरी हो जाती है। परिवार और समाज में एक स्त्री जिस तरह रहती है, काम करती है, संबंध बनाती है और परिस्थितियों का सामना करती है, उसका कोई न कोई अंश अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहता है। यह विरासत हमेशा शब्दों में नहीं होती। वह व्यवहार, चुप्पी, निर्णय और संघर्ष से निपटने के तरीकों में भी दिखाई देती है। इस अर्थ में एक स्त्री दूसरी स्त्री को केवल परंपरा नहीं देती, बल्कि अपने जीवन से बनी एक दृष्टि भी सौंपती है। यही दृष्टि आगे चलकर उसके अपने जीवन और सामाजिक समझ का हिस्सा बन सकती है।
इस विरासत का पहला स्वरूप भाषा है। बच्ची दुनिया को पहचानना अपने आसपास की स्त्रियों की भाषा से शुरू करती है। वह केवल शब्द और संबोधन नहीं सीखती, बल्कि यह भी समझती है कि किससे कैसे बोलना चाहिए, कहाँ अपनी बात रखनी है और कहाँ चुप रह जाना है। वह जानने लगती है कि कौन-सी बात घर के भीतर कही जा सकती है और कौन-सी बाहर। किस रिश्ते में अधिकार से बोलना है और किसके सामने अपनी भावनाओं को किस तरह व्यक्त करना है। इस तरह भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं रहती, वह दुनिया को समझने और उसमें अपना स्थान पहचानने का साधन भी बन जाती है। एक स्त्री दूसरी स्त्री को भाषा के साथ-साथ व्यवहार और संबंधों को समझने का एक ढंग भी सौंपती है।
दूसरा पक्ष संस्कारों का है। संस्कार कोई पुड़िया में रखकर देने वाला चूर्ण नहीं, बल्कि परिवार की दिनचर्या, उत्सव, श्रम का बँटवारा और रिश्तों का व्यवहार आदि बालिका अपने आसपास की स्त्रियों को देखकर सीखती है। वह अबोधपन से सीखने लगती है। किसके लिए पहले खाना परोसा जाना चाहिए, किसके दर्द को स्वाभाविक मान लेना चाहिए। मतलब, यहाँ चली आ रही परंपराओं को जाँचने का कार्य माँ को करना चाहिए। साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप स्वभाव, सार सार को गहि लहै, थोथा देई उड़ाए। क्योंकि कुछ रिश्तों को जोड़ते हुए स्त्री खुद टूटने लगती है, और फिर भी रिश्ते जुड़ने से रहे। उस जगह छोड़ने का निर्णय स्त्री को स्वयं लेना होगा।
क्योंकि विरासत केवल अच्छी बातों की नहीं होती, डर भी विरासत में ही मिलता है। “वहाँ अकेले मत जाना”, “बहुत देर मत करना”, “लोग क्या कहेंगे”, “सावधान रहना” जैसी बातें अक्सर चिंता और प्रेम से कही जाती हैं। इनके पीछे पिछली पीढ़ी के अपने अनुभव और असुरक्षाएँ होती हैं। जिस स्त्री ने अपने जीवन में खतरे देखे हैं, वह चाहती है कि अगली पीढ़ी उनसे बची रहे। इसलिए हर सावधानी को बंधन मानना उचित नहीं। लेकिन जो डर एक समय सुरक्षा का साधन था, वही बदलती परिस्थितियों में बेटी के लिए सीमा बन सकता है। इस बात का ख्याल भी स्त्री को ही रखना चाहिए। विरासत बना रही स्त्री के लिए यह परखना जरूरी है कि अगली पीढ़ी को डर को नकारना नहीं, बल्कि उसे समझकर जहाँ जरूरी हो, वहाँ सतर्क होना सीखना है।
इसके साथ स्वतंत्रता की विरासत भी बनती है। एक स्त्री जब शिक्षा, काम, सार्वजनिक जीवन या अपने निर्णयों के लिए जगह बनाती है, तो अगली पीढ़ी के लिए वह रास्ता कुछ आसान हो जाता है। जिस अधिकार के लिए पिछली पीढ़ी को संघर्ष करना पड़ा, वह अगली पीढ़ी के लिए सामान्य जीवन का हिस्सा बन सकता है। इस तरह विरासत में केवल जीवन जीने के तरीके नहीं आते, बल्कि अपनी पसंद और निर्णय के लिए मिली हुई जगह भी आती है।
आत्मविश्वास भी इसी विरासत का हिस्सा है। वह हमेशा समझाने से नहीं आता। कई बार वह आसपास की स्त्रियों को निर्णय लेते, काम करते और कठिन परिस्थितियों में अपनी बात पर टिके देखते हुए बनता है। जिस लड़की ने अपनी माँ या दूसरी स्त्रियों को अपने फैसले लेते, काम करते और विरोध के सामने खड़े होते देखा होता है, उसके लिए स्त्री का यह रूप असाधारण नहीं रहता। इसके विपरीत, यदि उसके सामने डर और सीमित विकल्प ही हों, तो अपनी संभावनाओं की कल्पना भी सीमित हो सकती है। इसलिए आत्मविश्वास केवल व्यक्ति का गुण नहीं, उस वातावरण का भी परिणाम है, जिसमें वह बड़ी होती है।
पंडिता रमाबाई के जीवन में इस विरासत का एक ठोस उदाहरण मिलता है। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को अपने जीवन-कर्म का हिस्सा बनाया। शारदा सदन और मुक्ति मिशन के माध्यम से उन्होंने लड़कियों और स्त्रियों के लिए शिक्षा तथा नए जीवन के अवसर तैयार किए। उनकी बेटी मनोरमाबाई ने शिक्षा पाई, माँ के काम में साथ दिया और आगे लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया। यहाँ माँ ने जिस राह को अपने जीवन में खोला, बेटी ने उसे आगे बढ़ाया। विरासत इसी तरह विचार से आगे बढ़कर कर्म का रूप भी ले सकती है।
हालाँकि कोई भी विरासत एक दिशा में नहीं चलती। बेटी केवल माँ से मिली चीजों को ग्रहण नहीं करती, लेकिन कुछ भी ग्रहण करने का धरातल परिवार की स्त्रियाँ ही बनाती हैं।
इसलिए कहना समीचीन होगा कि स्त्री से स्त्री तक पहुँचने वाली विरासत केवल परंपराओं और गहनों के लेनदेन की ही नहीं होती है। उसमें भाषा, स्मृति, अनुभव, सावधानियाँ, अवसर और आत्मविश्वास आदि सब शामिल हैं। एक स्त्री अपने जीवन में जो जीती, सहती, बदलती या हासिल करती है, उसका असर अगली पीढ़ी पर पड़ता है।
विरासत का अर्थ केवल जो मिला, उसे सुरक्षित रखना भी नहीं, बल्कि उसे अपने समय की कसौटी पर परखकर आगे देना भी है। हर बालिका तभी अपनी माँ से मिली विरासत में कुछ नया जोड़ पाती है, जब उचित निर्णय लेने की क्षमता उसे विरासत में मिली होती है।
इस तरह हर पीढ़ी केवल अतीत नहीं सँभालती, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए आगे बढ़ने की जगह भी बनाती है। यही स्त्री से स्त्री तक चलने वाली विरासत की असली ताकत है। वह स्त्री सुदृढ़ जरूर होगी, जिसकी माँ ने समय रहते अपने प्रति सचेत होने का जोखिम उठाया होगा।

Comments

Popular posts from this blog

मैं पेड़ होना चाहती हूँ

बूढ़ी होती स्त्री

लेखक की गढ़ी हुई छवि