दो किनारों के बीच
दो किनारों के बीच
20 जुलाई 2026
आज सुबह फेसबुक खोला। कल गोल चक्कर ऑनलाइन पत्रिका पर संपादक देवेश पथ सारिया ने मेरी कुछ डायरियाँ प्रकाशित की थीं। सहज ही मन उस पोस्ट की ओर लौट गया। यह देखने की एक स्वाभाविक उत्सुकता थी कि कितने लोगों ने उन्हें पढ़ा और किसने क्या कहा होगा।
लेकिन वहाँ कुछ भी विशेष नहीं जुड़ा था।
उसी क्षण भीतर एक प्रश्न ने सिर उठाया। क्या कला सचमुच दूसरों की स्वीकृति पर आश्रित होती है? क्या रचनाकार की तृप्ति पाठकों की प्रतिक्रिया से निर्मित होती है?
थोड़ी देर बाद लगा, नहीं।
कला अपने स्वभाव में स्वतंत्र है। वह स्वयं में पूर्ण है। वह किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करती। वह ब्रह्म की भाँति स्वयंसिद्ध है। रचनाकार केवल उसका माध्यम है। फिर भी प्रत्येक रचना के बाद उसके भीतर यह जानने की एक सहज आकांक्षा होती है कि जो अनुभूति उसके भीतर उदित हुई थी, क्या वह शब्दों में उसी ताप और उसी सत्य के साथ उतर सकी? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में वह अपनी प्रतिष्ठा नहीं, अपनी अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता खोजता रहता है।
इन्हीं विचारों के बीच फेसबुक की न्यूज़ फ़ीड में एक चित्र पर मेरी दृष्टि ठहर गई। उसमें कुछ शब्द भी थे, पर उन्होंने मुझे नहीं रोका। दो वृक्षों के बीच फैला हुआ रिक्त विस्तार देर तक मुझे अपनी ओर खींचता रहा।
तभी लगा, जीवन भी तो ऐसा ही है। एक ओर जन्म। दूसरी ओर मृत्यु। दोनों अपने-अपने स्थान पर अविचल। उनके बीच निरंतर बहती प्राणधारा। और उस पर रखा लकड़ी के फट्टों सरीखा एक पुल—संसार।
न जाने क्यों, पूरे दृश्य में सबसे क्षीण, सबसे असुरक्षित वही पुल लगा। वृक्ष समय के साक्षी थे। नदी अपने शाश्वत प्रवाह में थी। रिक्तता अपनी मौन पूर्णता में स्थित थी। केवल पुल मनुष्य की रचना था।
शायद संसार भी ऐसा ही है। परंपराओं, रूढ़ियों, गलतियों और न जाने किन-किन परतों से बना हुआ। घर, संबंध, प्रतिष्ठा, उपलब्धियाँ और सफलताएँ—हम अपना समूचा जीवन इन्हीं पर टिकाकर जीते हैं। इन्हें सुरक्षित रखने में अपनी समस्त ऊर्जा लगा देते हैं। जबकि सबसे अधिक नश्वर यदि कुछ है, तो यही है।
जन्म और मृत्यु प्रकृति के सनातन सत्य हैं। जीवन का प्रवाह भी उतना ही सत्य है। इनके बीच हमने जो संसार रचा है, वह एक पुल से अधिक कुछ नहीं। पुल का प्रयोजन पार कराना है, ठहर जाना नहीं। संसार भी कहाँ रुकता है!
चित्र से दृष्टि हट गई, पर वह पुल भीतर रह गया।
अब लगता है, मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह हर चीज़ को नियंत्रित कर सकता है। जबकि यात्रा पुल पार करने से नहीं, प्रवाह में बने रहने से होती है। शायद इसी सत्य को समझ लेने का नाम जीवन है।
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