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मैं शरीर से अधिक हूँ?

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        11.06.2026      मैं शरीर से अधिक हूँ? इन दिनों मृत्यु का ख्याल कुछ ज्यादा आने लगा है। ऐसा नहीं कि मैं मरना चाहती हूँ या जीवन से ऊब गई हूँ। उल्टा, जब जीवन बहुत सुंदर लगता है, तब यह ख्याल और तीखा हो जाता है। ज्यादा बार दिमाग खटखटाता है। सुबह की चाय, पेड़ों पर नई पत्तियाँ, किसी बच्चे की हँसी, किसी अनजान व्यक्ति की सदाशयता, इन सबको देखकर अचानक लगता है कि एक दिन यह सब छूट जाएगा। और तब प्रश्न उठता है कि जो छूट जाएगा, वह क्या है? और जो छूटेगा नहीं, वह क्या है? मैं अपने शरीर को देखती हूँ। यह वही शरीर नहीं है जो बचपन में था। न वह जो युवावस्था में था। समय ने इसमें बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन एक अनुभूति ऐसी है जो आज भी वैसी ही लगती है जैसी वर्षों पहले थी। वही जो देखती है, सोचती है, दुखी होती है, प्रसन्न होती है और प्रश्न पूछती है। तब कभी-कभी मन में आता है कि शायद मैं केवल शरीर नहीं हूँ। यह कोई आध्यात्मिक दावा नहीं है। न ही किसी धर्मग्रंथ से निकला हुआ निष्कर्ष। यह तो बस एक प्रश्न है, जो मृत्यु के विचार के साथ बार-बार मेरी ओर लौट आता है। अरस्तु ...

परिधि के बाहर जीवन,मन और विचार

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           ( 11.06.2026) हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा गहरे दोहराव से निर्मित होता है। हम बार-बार उन्हीं रास्तों पर चलते हैं, उन्हीं लोगों से मिलते हैं, उन्हीं बातों पर विचार करते हैं और धीरे-धीरे उन्हीं निष्कर्षों के भीतर बसने लगते हैं, जिन्हें कभी हमने सत्य मान लिया था। किसी माने हुए सत्य का खंडन करना अत्यंत कठिन कर्म है। क्योंकि केवल समाज ही परम्पराओं की परिधि में नहीं घूमता, मन भी अपनी परिधियाँ रच लेता है। कुछ शब्द, कुछ व्यक्ति, कुछ घटनाएँ और कुछ भाव ऐसे होते हैं जो निरंतर हमारे भीतर लौटते रहते हैं। प्रातः आँख खुलते ही बासी और जर्जर विचार मन की सतह पर उपस्थित हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो मन अपने ही निर्मित, परिचित संसार में पुनः प्रवेश कर गया हो। वहाँ सब कुछ जाना-पहचाना है, वही स्मृतियाँ, वही आशंकाएँ, वही निष्कर्ष। मन अनजाने की अपेक्षा परिचित को अधिक सहज स्वीकार करता है; इसलिए वह बार-बार उन्हीं मानसिक पगडंडियों पर लौटता है, चाहे वे उसे सीमित ही क्यों न कर रही हों। इस प्रकार मनुष्य केवल बाहरी परम्पराओं का नहीं, अपनी आंतरिक आदतों और धार...

किसान जीवन का करुण और वैचारिक दस्तावेज : ‘खरगांव का चौक

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                    लेखिका: आशा पाण्डेय            उपन्यास: खरगाँव का चौक  खरगांव का चौक समकालीन हिंदी उपन्यासों में एक ऐसा रचना-कृति है, जो किसी एक कथा-घटना या किसी एक पात्र की नियति तक सीमित न रहकर एक पूरे सामाजिक–आर्थिक यथार्थ को अपने भीतर समेट लेती है। यह उपन्यास महाराष्ट्र की खेती-किसानी, किसान आत्महत्याओं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन और उससे उपजते मानवीय संबंधों के टूटने-जुड़ने की कथा कहता है। लेखिका आशा पांडेय ने इस यथार्थ को करुणा, संवेदना और गहरी सामाजिक जिम्मेदारी के साथ रूपायित किया है। ‘खरगांव का चौक’ का केंद्रीय विषय महाराष्ट्र में लंबे समय से चली आ रही किसान आत्महत्याओं की त्रासदी है। यह उपन्यास इस समस्या को किसी आँकड़े, सरकारी रिपोर्ट या प्रत्यक्ष राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की तरह नहीं, बल्कि घर-परिवार, खेत-खलिहान और रिश्तों की बारीक परतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। संतोष का आत्महत्या करना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक पूरे परिवार और समुदाय के भवि...

लेखन की तैयारी या सहजता की खोज

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किसी भी रचनाकार के लिए सबसे कठिन क्षण शायद वही होता होगा, जब वह तय कर लेता होगा कि आज उसे कुछ अद्भुत लिखना है। मेरे लिए भी ये क्षण कठिन से कठिनतम हो जाते हैं। क्योंकि जिस वक्त रचनात्मकता को धैर्य की ज़रूरत होती है, उसी क्षण अधीरता अपना खेल शुरू कर देती है। शब्द ठोस हो जाते हैं, विचार जुगनुओं की तरह जलते-बुझते हैं, और सामने रखे कागज़ मुझे देखते रह जाते हैं कि उन पर मन की इबारत उतरे। मैं खुद को ज़्यादा समय इसी स्थिति में पाती हूँ। इससे उबर भी जाएँ, लेकिन सुनी-सुनाई बातों पर मन अमल कर लेता है कि लेखन एक साधना है। इसलिए उसे साधने के लिए विधि-विधान होना ही चाहिए। जैसे योगी आसन बिछाकर ध्यान में बैठता है, एक लेखक को भी अपनी टेबल सजाकर, किताबें व्यवस्थित कर, पूरी तैयारी के साथ लिखने बैठना चाहिए। इस सोच के साथ मैं कई बार स्टडी टेबल की सफाई और सजावट में लग जाती हूँ—किताबें जमाना, पेन-पेंसिल ठीक करना, सामने की दीवार पर प्रेरक पंक्तियाँ चिपकाना। सब कुछ तैयार हो जाने पर लगता है कि अब तो लिखना सहज हो जाएगा। लेकिन ठीक उसी समय मन नए भाव में भटकने लगता है। कभी चाय का बहाना, कभी फोन, कभी को...

सुंदर लड़के

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सुनो सुंदर लड़के  सुंदर होना निजी उपलब्धि की तरह  मत देखा करो यह एक साँझी घटना है जिसमें तुम्हारा कम, एक स्त्री का जागना ज्यादा  मानीखेज बन पड़ा है जब दर्पण के सामने खुद पर मुग्ध होने का मन करे, तो ठहर जाया करो याद किया करो  नींद भरी उन आँखों को, तुम्हारी आँखों में  ठहर सके चमक  भूली रही थीं सोना  उम्र के विस्तार भर  और ये भी कि बुरी नज़र  सिर्फ़ तुम्हें ही नहीं लगती उन हाथों को भी लगती है जो रह गए तुम्हारे पीछे जब करे मन  अपने अस्तित्व पर इतराने का लगा लिया करो चुपके से  स्मृति का काला टीका कान के पीछे सुंदर होने की न्यूनतम नैतिकता  थामें रहेगी तुम्हारा हाथ। कल्पना मनोरमा

मैं पेड़ होना चाहती हूँ

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मन यूँ करता है अब  कि कुछ दिन ही सही  न भूख लगे, न प्यास की उठे कोई पुकार  देह अपना बोझ ख़ुद ही उतार कर फेंक दे और मैं सिर्फ़ स्वांस भर रह जाऊँ न बच्चों को चुगाने की चिंता हो, न समय के दाँत काटने का डर यह इनकार नहीं है जीवन से, बस पल भर के लिए शोर से बाहर आना चाहती हूं मैं उस पेड़ पर रहना चाहती हूँ जहां जड़ें उसकी हों, और भरोसा मेरा  जहाँ हर प्रश्न का उत्तर फल की तरह नहीं, छाया की तरह उतरे मेरे भीतर मैं किताब में खोना चाहती हूँ अक्षरों के बीच अपना नाम भूलकर पन्ने पलटते हुए सबसे बुरी कथा की किरदार बन पाठकों की आँखों में  झांकना चाहती हूँ  चिड़ियों से बातें करना चाहती हूँ— बिना अर्थ का बोझ ढोए जो जानती हैं चिड़ियां  सीखना चाहती हूँ  और उन्हें बताना चाहती हूँ कि  उड़ान कोई उपलब्धि नहीं, एक सहज आदत है हवा में उड़ना चाहती हूँ बिना दिशा,बिना मंज़िल जहाँ से लौटना अनिवार्य न हो और ठहरना अपराध न बने किसी अनजाने जंगल में  खो जाना चाहती हूँ  मैं ख़ुद को थोड़ी देर जीने देना चाहती हूँ  मैं पेड़ होना चाहती हूँ। कल्पना मनोरमा

मां की स्मृति में

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माँ की आँखें मामूली नहीं थीं। उनकी चिंतनधारा ने मुझे विचारों की समृद्ध विधि सौंपी है। आपके होने के आगे मेरा होना हमेशा नतमस्तक रहेगा। मलाल बस इतना, मैं ही वह न दे पाई जो एक स्त्री को दूसरी स्त्री को देना चाहिए। यह स्वीकार आज भी भीतर कहीं ठहरा रहता है।  मां का जीवन साहित्यिक नहीं था। पर सोच साहित्यिक थी। अब सोचती हूँ तो लगता है कि आप एक किरदार की तरह थीं। उत्साह और जिजीविषा से भरीं। आप साधारण स्त्री तो बिल्कुल नहीं थीं। न सोच में। न व्यवहार में। न भाषा में। न जीवन में। आप असाधारण थीं। मां ने अपने कार्यान्वयन से वह सिखाया जो साधारण स्त्री सोच नहीं सकती। मां ने सिखाया सामने चाहे पुरुष हो या स्त्री बात दोनों से की जा सकती है। झेंपने की की जरूरत नहीं। मैंने आपसे ही अपनी देह यानी स्त्री-देह से विरक्त और आत्मा में स्थिर रहना सीखा। मैंने आपसे अपनी परिधि को बड़ा बनाना सीखा। मैंने आपसे अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना सीखा। साथ ये भी सीखा कि जो रिश्ते संवेदना रहित होकर उपयोग करने लगें, उन्हें त्यागना ही उचित है। आपके सिखाए हुए रास्ते पर चलते हुए कई कई बार मैं खुद को परेशानियों स...