स्त्री और बुनियादी संवेदनशीलता का प्रश्न



स्त्री और बुनियादी संवेदनशीलता का प्रश्न

बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा। स्तंभ – 35


किसी भी सभ्यता का वास्तविक स्वरूप उसके वैभव, तकनीकी प्रगति या आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनशीलता से पहचाना जाता है। जब किसी समाज में क्रूरता सामान्य अनुभव बनने लगे और हिंसा केवल आचरण में नहीं, बल्कि विचार, भाषा और संबंधों में भी दिखाई देने लगे, तब संकट केवल कानून और व्यवस्था का नहीं रहता। वह मनुष्यता के क्षरण का संकेत बन जाता है। उस स्थिति में यह प्रश्न गौण हो जाता है कि हिंसा करने वाला स्त्री है या पुरुष। मूल प्रश्न यह होता है कि मनुष्य के भीतर कितना मनुष्य शेष है।
किसी भी व्यक्ति को संबंध स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता प्राप्त होना उसका मौलिक अधिकार है। किसी विवाह, संबंध या निर्णय के लिए "ना" कहना भी उसी स्वतंत्रता का स्वाभाविक विस्तार है। किन्तु जब असहमति, अपमान या असफल संबंध का उत्तर प्रतिशोध या बर्बरता बन जाए, तब प्रश्न केवल अपराध का नहीं रह जाता। वह नैतिक चेतना के विघटन का प्रश्न बन जाता है। प्रत्येक अधिकार अपने साथ उत्तरदायित्व भी लेकर आता है, क्योंकि किसी भी अधिकार का प्रयोग दूसरे मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करता है। इसी कारण स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप अपने विवेक पर अधिकार है। जो अपने क्रोध का स्वामी नहीं बन पाता, वह अपनी स्वतंत्रता का भी पूर्ण स्वामी नहीं हो सकता।
किसी भी समाज की स्थिरता केवल अधिकारों के विस्तार से नहीं, बल्कि चरित्र के विकास से निर्मित होती है। यदि अधिकारों की शिक्षा के साथ करुणा, आत्मसंयम और सहअस्तित्व के संस्कार क्षीण होने लगें, तो सामाजिक संतुलन भी दुर्बल होने लगता है। यही कारण है कि बेटियों और बेटों, दोनों को समान रूप से यह समझना आवश्यक है कि शक्ति का सर्वोच्च रूप संयम है। असहमति का सबसे सभ्य उत्तर हिंसा नहीं, संवाद है। किसी भी परिस्थिति में निर्दोष जीवन के प्रति करुणा समाप्त नहीं हो सकती।
चरित्र का निर्माण किसी एक व्यक्ति या एक संस्था का दायित्व नहीं होता। माता, पिता, शिक्षक, परिवार, विद्यालय और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर अगली पीढ़ी के नैतिक व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। स्त्री की भूमिका इसलिए विशेष मानी जाती है क्योंकि वह जीवन के प्रारम्भिक संस्कारों की निकटतम वाहक होती है, न कि इसलिए कि समाज की समस्त नैतिक जिम्मेदारी उसी पर डाल दी जाए। सभ्यता सदैव साझी जिम्मेदारी से निर्मित होती है।
बालिका का स्त्रीत्व केवल जैविक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी आकार ग्रहण करता है। उसके मन, वाणी और कर्म के प्रारम्भिक संस्कार प्रायः उन स्त्रियों के सान्निध्य में विकसित होते हैं जो उसके जीवन का सबसे निकट का संसार होती हैं। माँ, दादी, नानी, मौसी, बुआ, बहन, शिक्षिका और कार्यस्थल की वरिष्ठ स्त्रियाँ केवल रिश्तों की संरक्षक नहीं होतीं, वे जीवन-दृष्टि की संवाहक भी होती हैं। बालिका स्त्री होने का पहला अर्थ उनके व्यवहार में पढ़ती है। वहीं से वह सीखती है कि दूसरी स्त्री के प्रति सम्मान कैसे रखा जाता है, असहमति कैसे व्यक्त की जाती है, सहयोग और प्रतिस्पर्धा का संतुलन कैसे बनाया जाता है तथा शक्ति का प्रयोग संरक्षण के लिए होता है या प्रभुत्व के लिए। इसलिए स्त्री का स्त्री के प्रति संवेदनशील होना केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आवश्यकता है। यह संवेदनशीलता पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कार के रूप में आगे बढ़ती है।
मानव जीवन का पहला शिक्षण उपदेश से नहीं, अनुकरण से प्रारम्भ होता है। बच्चे बोलना बाद में सीखते हैं, मनुष्य होना पहले सीखते हैं। वे यह देखते हैं कि असहमति किस प्रकार व्यक्त की जाती है, क्रोध पर किस प्रकार नियंत्रण रखा जाता है, क्षमा किस प्रकार माँगी जाती है और दूसरे के दुःख के प्रति कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त होती है। यही अनुभव उनके चरित्र की आधारशिला बनते हैं।
वर्तमान समय का सामाजिक वातावरण त्वरित प्रतिक्रिया को विचारपूर्ण उत्तर से अधिक प्रोत्साहित करता है। डिजिटल माध्यमों ने तत्काल निर्णय, सार्वजनिक आक्रोश और क्षणिक प्रतिक्रियाओं को सामान्य बना दिया है। परिणामस्वरूप धैर्य, आत्मसंयम और संवाद की प्रवृत्तियाँ स्वतः विकसित नहीं होतीं। उनका सचेत अभ्यास करना पड़ता है। यदि यह नैतिक शिक्षा दुर्बल पड़ जाए, तो तकनीकी प्रगति के बावजूद मनुष्यता का ह्रास होने लगता है।
ज्ञान का उद्देश्य केवल दक्षता प्राप्त करना नहीं, बल्कि विवेक का विकास करना भी है। विज्ञान, गणित, भाषा और तकनीक की शिक्षा आवश्यक है। उतना ही आवश्यक दुःख को समझना, असफलता को स्वीकारना, क्षमा माँगना और क्षमा करना भी है। शिक्षा यदि केवल बुद्धि को विकसित करे और चरित्र को उपेक्षित छोड़ दे, तो ज्ञान बढ़ सकता है, पर विवेक नहीं।
इतिहास यह भी बताता है कि अन्याय और पीड़ा का अनुभव अपने आप किसी को अधिक मानवीय नहीं बनाता। चरित्र का निर्माण अनुभवों से कम और उन अनुभवों की नैतिक व्याख्या से अधिक होता है। पीड़ा करुणा भी उत्पन्न कर सकती है और प्रतिशोध भी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य अपने अनुभव को किस दिशा में रूपांतरित करता है। इसी कारण उत्पीड़न का अनुभव किसी को अमानवीय होने का नैतिक अधिकार नहीं देता। प्रतिरोध की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक गरिमा में निहित होती है। यदि प्रतिरोध भी उसी क्रूरता की भाषा बोलने लगे जिसका वह विरोध करता है, तो बदलते केवल पात्र हैं, हिंसा का चरित्र नहीं।
कानून किसी भी समाज की आवश्यकता है, किन्तु वह अपराध के बाद सक्रिय होता है। संस्कार और नैतिक चेतना अपराध की संभावना को पहले ही कम कर देते हैं। किसी सभ्य समाज की सबसे बड़ी सुरक्षा कठोर दंड व्यवस्था नहीं, बल्कि जाग्रत विवेक और संवेदनशील चरित्र होते हैं।
अंततः किसी भी समाज का भविष्य उसकी अगली पीढ़ी के चरित्र पर निर्भर करता है। वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि नई पीढ़ी कितनी सफल, संपन्न या प्रभावशाली बनी। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वह शक्ति प्राप्त करने पर भी विनम्र रह सकी, असहमति के बीच भी मर्यादा बनाए रख सकी और दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझ सकी। इतिहास बार-बार प्रमाणित करता है कि करुणा से रिक्त शक्ति चेहरा बदल सकती है, चरित्र नहीं। इसलिए आने वाली पीढ़ियों को केवल अधिकारों की भाषा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, न्याय और मनुष्यता की भाषा भी सिखानी होगी। यही वह सांस्कृतिक विरासत है जो किसी भी समाज को भीतर से सभ्य बनाती है।

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