Posts

तू भी एक सितारा है

Image
रात के ग्यारह बज रहे थे। बेटे को जल्दी सुलाने की खातिर माँ परेशान थी लेकिन बेटा खिड़की से झाँकते चाँद पर फ़िदा था। लाख जतन करने के बाद भी जब निक्कू नहीं सोया तो गुस्सा होकर माँ ने उसकी तरफ से करवट बदल ली। “ मम्मा , चाँद से मैंने सिर्फ एक तारा माँगा था फिर भी वह बादल ओढ़कर छिप गया। ” निक्कू ने माँ को अपनी ओर खींचते हुए कहा।   “ चाँद बहुत दूर से अभी-अभी आसमान पर आया है ,  थका होगा। वैसे भी पहले वह अपने सितारों से बात करेगा क्या तुझसे? अच्छा! चलो अभी सो जाओ , कल ग्रेट मिल्टन एकेडमी में इंटरव्यू है तेरा। तुझे स्कूल जाना है।   गिनती ,  अंग्रेजी के अल्फावेट , ओलम, तुझे जो याद करवाया गया है,   सब कुछ याद है न ?” माँ ने पूछा। “ हाँ मम्मा , लेकिन मुझे अभी तारा चाहिए, हूँ हूँ हूँ । ” बेटे ने जिद करते हुए कहा। “ निक्कू ,  आज सो जाओ, कल हम चाँद से तारा ज़रूर माँगेंगे , तेरे लिए। ” बेटे के अनोखे खेल पर माँ प्यार भरीं थपकियाँ देकर उसे सुलाने लगी। “ क्या चाँद बच्चों की नहीं, सिर्फ बड़ों  की बात सुनता है ?” जिज्ञासा लिए वह बोला। “ निक्कू! सच कहूँ? क्योंकि झूठम...

संवेदनशील मनुष्य के जीवन की अनंत पीड़ा का कोलाज

Image
"नदी सपने में थी" काव्य संग्रह की अपनी बात  “ कला सिखाती नहीं , ‘ जगाती ’  है। क्योंकि उसके पास  ‘ परम सत्य ’  की ऐसी कोई कसौटी नहीं ,  जिसके आधार पर वह गलत और सही ,  नैतिक और अनैतिक के बीच भेद करने का दावा कर सके…तब क्या कला नैतिकता से परे है ?  हाँ ,  उतना ही परे जितना मनुष्य का जीवन व्यवस्था से परे। ”                                ( निर्मल वर्मा-ढलान से उतरते हुए से ) साहित्य के अग्रगण्य लेखक निर्मल वर्मा ने कितनी सुंदर बात कही है। जीवन से कलात्मकता को हटा दिया जाए तो जीवन अधूरा-अपूर्ण लगने लगेगा। तो क्या कविता कला की प्रतिरूप कही जाएगी ?  हाँ ,  जिस प्रकार कला किसी को कुछ सिखाती नहीं ,  जगाती है ,  उसी प्रकार कविता सोए हुए मनुष्य के मन में एक कलात्मक कौंध पैदा करती है। उसी कौंध में विवेकवान अपने जीवन की झलक पाकर उसे जीने की विधि को खोज   लेता   है। वरना जीवन काटना तो सभी को पड़ता   ही   है। वैसे कहा जाए तो विसंगति-बोध से भर...

यथार्थ बोध एंव नारी संवेदनाओं का कलात्मक पक्ष

Image
संवेदनाओं का कलात्मक पक्ष ( विशेष संदर्भ -बॉस भर टोकरी ) कल्पना मनोरमा आज के स्त्री लेखन विशेष कर हिंदी कविता की विस्तृत दुनिया में अपना एक कोना सुरक्षित कर चुकी हैं. जहाँ अधिकतर कविताएँ यथार्थ की पथरीली जमीन को तोड़ने के दावे के साथ उसे वैसे ही ऊसर छोड़ आगे बढ़ जाती हैं , वहीँ कल्पना की ज्यादातर कविताएँ उसी सख्त , ऊसर जमीन पर अपनी कल्पना के ही नहीं यथार्थ के कड़वे बीज को जो इस समाज ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आधी आबादी को सौपें थे , उसे उन्होंने संस्कारों की मिट्टी में अपनी संवेदनाओं की नमी के साथ रोप दिया है. शब्द दर शब्द आज वही मेहनत अपनी सुगंधि से साहित्य संसार को तो सुवासित कर ही रही है , उन्होंने उसको ही संस्कार व् संस्कृति के रूप में संजो कर ‘ बांस भर टोकरी ’ में संकलित कर पुनः इसी समाज को लौटा दिया हैं.   धरती ने कब बीज को अपनी छाती में छिपा कर रखा है ? वह तो उसे अपने को उलीच कर दे देती है. इसीलिए उसे पुनर्नवा कहा जाता है. ये कविताएँ भी उसी तरह कि हैं , इनसे गुजरते हुए आपको यह एहसास बराबर होता चलेगा कि कुछ भी समतल नहीं , यथार्थ की खुरदरी जमीन से अपने अच्छे-बुरे अनुभवों से बराबर संवाद कर...