टिनी का सपना
टिनी का सपना
टिनी एक चंचल और प्यारी बच्ची थी। उसे कल्पनाओं की दुनिया में खोए रहना बहुत पसंद था। वह कहानियाँ सुनते-सुनते खाना खाती और कभी-कभी अपने विचारों में इतनी खो जाती कि आसपास की बातें भी भूल जाती। उसकी छोटी-छोटी शरारतें घर के सभी लोगों को बहुत भाती थीं।
टिनी का कमरा रंग-बिरंगी तितलियों की तस्वीरों और खिलौनों से सजा हुआ था।
एक रात उसकी नानी ने उसे सुनहरी परी और उसकी पालतू तितली की कहानी सुनाई। उस तितली के पंखों पर हीरे जड़े थे, जो सूरज की रोशनी में इंद्रधनुष की तरह चमकते थे। परीलोक का वर्णन सुनकर टिनी मंत्रमुग्ध हो गई। सबसे अधिक उसे हीरे-जड़े पंखों वाली तितली की बातें अच्छी लगीं।
उस दिन उसने नानी से दूसरी कहानी सुनाने की जिद भी नहीं की। कहानी समाप्त होते ही नानी अपने कमरे में चली गईं और टिनी धीरे-धीरे नींद की गोद में खो गई।
नींद में उसने एक अद्भुत सपना देखा।
वह परीलोक पहुँच गई थी। वहाँ सब कुछ चमक रहा था। परी कहीं बाहर गई हुई थी, लेकिन महल के दरवाज़े पर चमचमाते पंखों वाली तितली बैठी थी। तितली ने मुस्कुराकर टिनी से कई सवाल पूछे।
"तुम यहाँ क्यों आई हो?" तितली ने पूछा।
"मैं तुमसे मिलने आई हूँ," टिनी ने उत्साह से कहा।
यह सुनकर तितली बहुत खुश हुई।
वह टिनी को परीमहल के पीछे बने एक सुंदर बगीचे में ले गई। वहाँ चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। सूरज की सुनहरी किरणें पत्तों के बीच से छनकर धरती पर बिखर रही थीं। तितली ने टिनी को वह फूल दिखाया जिस पर वह सोती थी, वह फूल भी दिखाया जिसका पराग वह खाती थी और वह भी, जिस पर बैठकर वह हवा का आनंद लेती थी।
टिनी को वे सभी फूल बेहद अद्भुत लगे। सूरज की रोशनी में तितली के पंख नीले, पीले, लाल और बैंगनी रंगों में चमक रहे थे।
तितली धीरे-धीरे उसके पास आई और कान में फुसफुसाकर बोली, "आज से मैं तुम्हारी दोस्त हूँ।"
टिनी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
तितली ने उसे अपने पंखों पर बैठाया और पूरा परी महल घुमाया। इसके बाद वह उसे जंगल के भीतर बने एक जादुई बगीचे में ले गई। वहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। फूल हवा के साथ झूम रहे थे और चारों ओर उनकी भीनी भीनी सुगंध फैली हुई थी।
"यह मेरा बगीचा है," तितली ने मुस्कुराकर कहा।
"तितली गार्डन!" टिनी खुशी से बोली।
"हाँ," तितली हँसते हुए बोली, "तुमने बिल्कुल सही पहचाना। मैंने इसे बहुत मेहनत से बनाया है।"
फिर तितली ने सीटी बजाई। देखते ही देखते हीरे-जड़े पंखों वाली असंख्य तितलियाँ वहाँ आ गईं और टिनी को चारों ओर से घेरकर नाचने लगीं।
"तुम बहुत प्यारी हो, तितलू!" टिनी ने कहा।
तितली ने स्नेह से उत्तर दिया, "और तुम भी बहुत प्यारी हो, मेरी बच्ची। इसलिए मैं तुम्हें अपने बगीचे की सैर कराने लाई हूँ।"
टिनी तितली गार्डन की सुंदरता में खोई हुई थी कि तभी किसी की आवाज़ सुनाई दी—"टिनी, उठो! सुबह हो गई।"
टिनी ने आँखें खोलीं। वह अपने कमरे में,बिस्तर पर सोई और सपनों में खोई थी। टिनी का सपना समाप्त हो चुका था, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान अब भी खिली हुई थी।
वह मन ही मन बोली, "आज रात मैं फिर उस जादुई बगीचे की सैर करने जाऊँगी।"
तभी रसोईघर से मम्मी की आवाज़ फिर से आई,"पहले स्कूल जाओ टिनी, फिर कहीं जाना!"
“ये मम्मी मन की बात भी कैसे सुन लेती हैं!”
टिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह जल्दी-जल्दी तैयार हुई और खुशी-खुशी स्कूल चली गई।
सीख
अच्छी कहानियाँ हमारी कल्पना को पंख देती हैं और सपनों की दुनिया को और भी सुंदर बना देती हैं।
सुंदर सी बाल कहानी
ReplyDeleteअरे! आप अभी भी ब्लॉग पढ़ती हैं अनीता की, सुखद आश्चर्य। हार्दिक शुभकामनाएं और आभार!
Deleteकल्पना मनोरमा
अच्छी कहानी है। बच्चों को बहुत आनन्द आएगा पढ़कर। हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
ReplyDeleteचंपक,नंदन की याद दिला दी आप, बचपन में पहुंच गये हम तो आजकल ऐसी परियों की कहानी लिखता कौन है भला।
ReplyDeleteआपकी इतनी सुंदर सी कहानी पढ़कर बता नहीं सकते कितना अच्छा लग रहा।
कृपया और भी ऐसी कहानियां लिखिए।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १९ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
Kitni pyaari kahaani hai!!!!
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