बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास
बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास
स्त्री शिक्षा केवल किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय का प्रश्न नहीं है, बल्कि सभ्यता के विकास, सामाजिक न्याय और मानवीय प्रगति का आधार है। किसी भी समाज की प्रगति का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ महिलाओं को शिक्षा, अभिव्यक्ति और आत्मनिर्णय के कितने अवसर उपलब्ध हैं। शिक्षा स्त्री को केवल अक्षरज्ञान नहीं देती, बल्कि अपने अस्तित्व को समझने, प्रश्न करने, निर्णय लेने और समाज में सक्रिय भागीदारी निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है। यही कारण है कि इतिहास के प्रत्येक परिवर्तनकारी दौर में स्त्री शिक्षा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
फिर भी यह विडम्बना रही है कि लंबे समय तक दुनिया के अधिकांश समाजों में महिलाओं की शिक्षा को सीमित करने का प्रयास किया गया। परंपराएँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, आर्थिक परिस्थितियाँ और लैंगिक पूर्वाग्रह उनके मार्ग में बाधा बनते रहे। इसके बावजूद अनगिनत स्त्रियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ज्ञान की लौ को जीवित रखा और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते बनाए।
शिक्षा का संबंध केवल विद्यालयों और डिग्रियों से नहीं है। यह घर, परिवार, समाज, संस्कृति और जीवनानुभवों से निर्मित एक व्यापक प्रक्रिया है। एक शिक्षित स्त्री केवल स्वयं को नहीं बदलती, बल्कि अपने परिवार, समुदाय और समाज की चेतना को भी प्रभावित करती है। उसकी जिज्ञासा, संवेदना और आत्मनिर्भरता आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों और दृष्टि को आकार देती है।
गाँव और घर का शैक्षिक वातावरण
मेरे जीवन की प्रारम्भिक स्मृतियाँ किसी विद्यालय की घंटी से नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के औरैया तहसील के छोटे-से गाँव अटा के खुले आकाश, आम के बागों और घर के भीतर पसरे अध्ययनशील वातावरण से जुड़ी हैं। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस करती हूँ कि मेरी शिक्षा की शुरुआत अक्षरों से पहले ही हो चुकी थी। वह मेरे घर, परिवार और गाँव के सामूहिक जीवन से आकार ले रही थी।
अटा एक सामान्य भारतीय गाँव था। यहाँ प्राथमिक विद्यालय तो था, किंतु पुस्तकालय, अस्पताल और अन्य आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। फिर भी गाँव अपने भीतर एक विशिष्ट सांस्कृतिक संसार समेटे हुए था। चारों ओर फैले खेत, आम के बाग, आपसी सहयोग की भावना और सामुदायिक जीवन की आत्मीयता इसे जीवंत बनाए रखते थे। गाँव के लोग सीमित संसाधनों में भी संतोष और परिश्रम के साथ जीवन जीते थे। शिक्षा के अवसर भले कम थे, लेकिन सीखने की संभावनाएँ हर ओर बिखरी हुई थीं।
मेरा घर गाँव के बाहरी छोर पर स्थित था और चारों ओर आम के पेड़ों से घिरा हुआ था। आज की भाषा में उसे एक छोटे-से फार्महाउस जैसा कहा जा सकता है। घर का भौतिक परिवेश ग्रामीण था, किंतु उसके भीतर का वातावरण शिक्षा, जागरूकता और बौद्धिक जिज्ञासा से भरा हुआ था। इसका श्रेय मुख्य रूप से मेरी माँ को जाता है। वे स्वयं सीमित औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर सकी थीं, लेकिन सीखने की उनकी ललक कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने घर को केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि विचार और अध्ययन का केंद्र बना दिया था।
हमारे घर में नियमित रूप से साहित्यिक पत्रिकाएँ तो नहीं आती थीं, किंतु उपलब्ध पुस्तकों का संसार कम समृद्ध नहीं था। गीता, रामायण, सुखसागर, वशिष्ठ गीता जैसे ग्रंथों के साथ-साथ स्त्री शिक्षा और समाज सुधार से संबंधित पुस्तकें भी थीं। माँ जब मायके से लौटतीं, तो अपने भाई द्वारा पढ़े गए उपन्यास और कहानी-संग्रह भी साथ ले आतीं। उन पुस्तकों ने घर में ऐसा वातावरण निर्मित किया, जहाँ पढ़ना केवल शौक नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।
बरसात के दिनों की स्मृतियाँ आज भी विशेष रूप से याद आती हैं। खेतों में काम कम होने पर गाँव के लोग हमारे घर के अहाते में एकत्र हो जाते थे। महिलाओं की टोली में माँ विभिन्न ग्रंथों का पाठ करतीं और उनके अर्थ समझातीं, जबकि पुरुषों की बैठकों में भी पढ़ने और सुनने का क्रम चलता रहता। बचपन में इन चर्चाओं की गहराई भले ही समझ में न आती हो, किंतु उन्हें सुनते-सुनते विचारों और शब्दों की दुनिया से परिचय होने लगा। संभवतः यहीं से मेरे भीतर जिज्ञासा और ज्ञान के प्रति आकर्षण का जन्म हुआ।
माँ का विश्वास था कि सीखना जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। वे हमें प्रकृति और आसपास की दुनिया से भी सीखने के लिए प्रेरित करती थीं। मकड़ी का जाला, तितली का जीवन-चक्र, पक्षियों का व्यवहार या ऋतुओं का परिवर्तन, इन सबमें वे सीख के सूत्र खोज लेती थीं। उनके लिए संसार की प्रत्येक वस्तु एक खुली पुस्तक थी। उन्होंने हमें सिखाया कि जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक देखना और समझना सीख लेता है, उसके लिए पूरा संसार एक विद्यालय बन जाता है।
मेरे पिता का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। वे अनुशासनप्रिय, परिश्रमी और आत्मसम्मान को महत्व देने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने हमें बैठाकर बहुत कम पढ़ाया, किंतु अपने व्यवहार से श्रम, समयबद्धता और जिम्मेदारी का महत्व समझाया। उनसे हमने सीखा कि शिक्षा का संबंध केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण से भी है। उनके व्यक्तित्व ने हमें यह विश्वास दिया कि मेहनत और अनुशासन जीवन की प्रत्येक उपलब्धि की आधारशिला हैं।
घर के भीतर दादी का प्रभाव भी था, जो परंपरागत सोच का प्रतिनिधित्व करती थीं। इस प्रकार हमारे घर में परंपरा और प्रगतिशीलता दोनों साथ-साथ उपस्थित थीं। एक ओर माँ नई संभावनाओं और शिक्षा की पक्षधर थीं, तो दूसरी ओर दादी पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को महत्त्व देती थीं। इन दोनों दृष्टियों के बीच रहते हुए मैंने जीवन के विविध पक्षों को समझना सीखा। शायद इसी कारण बचपन से ही मेरे भीतर प्रश्न करने और विभिन्न दृष्टिकोणों को देखने की प्रवृत्ति विकसित हुई।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस करती हूँ कि मेरे जीवन की वास्तविक शिक्षा किसी संस्थान से पहले घर और गाँव ने दी। गाँव ने मुझे सामुदायिकता, प्रकृति और श्रम का महत्व सिखाया, जबकि घर ने जिज्ञासा, अध्ययन और विचार की संस्कृति दी। सीमित संसाधनों के बावजूद वहाँ ऐसा वातावरण था जिसने सीखने की इच्छा को जीवित रखा। मेरे लिए गाँव और घर का यह शैक्षिक वातावरण केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का आधार है। वहीं मैंने जाना कि यदि सीखने की आकांक्षा जीवित हो, तो मिट्टी का एक साधारण घर भी विश्वविद्यालय बन सकता है।
माँ : शिक्षा, जिजीविषा और प्रतिरोध की प्रतीक
मेरे जीवन में यदि किसी एक व्यक्ति को शिक्षा का सबसे बड़ा स्रोत कहा जाए, तो वह मेरी माँ हैं। उन्होंने मुझे केवल पढ़ना-लिखना नहीं सिखाया, बल्कि सीखने का अर्थ समझाया। उनके व्यक्तित्व में संघर्ष, संवेदना, जिज्ञासा और आत्मविश्वास का ऐसा अद्भुत मेल था जिसने मेरे जीवन की दिशा निर्धारित की। आज जब मैं अपने बचपन और शिक्षा की यात्रा पर दृष्टि डालती हूँ, तो पाती हूँ कि मेरी माँ स्वयं एक ऐसी पाठशाला थीं, जहाँ जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पाठ बिना किसी औपचारिक पाठ्यक्रम के पढ़ाए जाते थे।
माँ उस पीढ़ी की स्त्रियों में थीं, जिन्हें सीमित शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला था। उनके पिता ने उन्हें आठवीं कक्षा तक पढ़ाया और फिर उनका विवाह कर दिया। उस समय यह भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। किंतु विवाह के बाद भी उनकी सीखने की आकांक्षा समाप्त नहीं हुई। उन्होंने घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी और बीटीसी तक शिक्षा प्राप्त की। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि उस सामाजिक वातावरण में एक प्रकार का प्रतिरोध भी थी, जहाँ स्त्री की शिक्षा को अक्सर अनावश्यक समझा जाता था।
विवाह के बाद उन्हें ऐसे परिवार में आना पड़ा जहाँ परंपरागत सोच का प्रभाव गहरा था। मेरी दादी परिवार की मुखिया थीं और घर के अधिकांश निर्णय उन्हीं के हाथों में होते थे। वे स्वयं शिक्षित थीं, किंतु स्त्रियों की स्वतंत्रता और नौकरी के पक्ष में नहीं थीं। माँ को नौकरी का अवसर मिला, लेकिन दादी ने यह कहकर उसका विरोध किया कि परिवार की बहू किसी के अधीन काम नहीं करेगी।
माँ ने परिस्थितियों के सामने झुकना स्वीकार किया, किंतु अपने भीतर की जिज्ञासा और आत्मविश्वास को कभी समाप्त नहीं होने दिया। दिनभर घर-गृहस्थी के अनगिनत कार्यों में व्यस्त रहने के बाद भी वे रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ती थीं। बचपन में यह दृश्य मुझे सामान्य लगता था, पर आज समझ में आता है कि वह केवल पढ़ना नहीं था, बल्कि अपने अस्तित्व और सपनों को जीवित रखने का प्रयास था। दिन में वे एक पारंपरिक बहू की भूमिका निभाती थीं और रात में एक जिज्ञासु, विचारशील स्त्री के रूप में अपने भीतर की दुनिया को विस्तार देती थीं। उन्हें देखकर मैंने सीखा कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, मनुष्य अपनी आंतरिक स्वतंत्रता को बचाए रख सकता है।
माँ ने हमें कभी केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रखा। वे चाहती थीं कि हम जीवन को समझें, प्रश्न करें और अपने अनुभवों से सीखें। उनकी शिक्षा-दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता थी। उन्होंने कभी हमारी जिज्ञासाओं को दबाने का प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत वे हमें सोचने, तर्क करने और अपने निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रेरित करती थीं। वे चाहती थीं कि हम केवल दूसरों की कही हुई बातों को स्वीकार न करें, बल्कि उन्हें समझें और परखें भी। यही कारण है कि बचपन से ही हमारे भीतर स्वतंत्र चिंतन की प्रवृत्ति विकसित हुई।
माँ ने हमें स्त्री की एक अलग छवि से भी परिचित कराया। उन्होंने केवल पारंपरिक कथाएँ नहीं सुनाईं, बल्कि भारतीय इतिहास और साहित्य की उन स्त्रियों की कहानियाँ भी सुनाईं जिन्होंने अपने ज्ञान, साहस और निर्णय क्षमता से समाज में विशिष्ट स्थान बनाया। अरुंधती, अपाला, घोषा, मदालसा, अनसूया जैसी विदुषी स्त्रियों के प्रसंग हों या झाँसी की रानी, महादेवी वर्मा और अन्य प्रेरक व्यक्तित्वों की बातें, इन सबने मेरे भीतर स्त्री की भूमिका को लेकर एक व्यापक दृष्टि विकसित की। माँ की कहानियों में स्त्री केवल घर की जिम्मेदारियाँ निभाने वाली नहीं थी, बल्कि विचारशील, सक्षम और निर्णय लेने वाली व्यक्तित्व थी।
शिक्षा के प्रति उनका समर्पण केवल विचारों तक सीमित नहीं था। जब मैं छठी कक्षा में पहुँची और अंग्रेज़ी की पढ़ाई शुरू हुई, तब उन्होंने स्वयं अंग्रेज़ी सीखकर मुझे पढ़ाना शुरू किया। यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वे किसी नई चुनौती से घबराती नहीं थीं। उन्होंने हमें सिखाया कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती और उम्र या परिस्थिति उसका अवरोध नहीं बन सकती।
माँ ने अपने जीवन में अनेक समझौते किए, अनेक इच्छाओं का त्याग किया, लेकिन अपने बच्चों की शिक्षा के प्रश्न पर कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हम पढ़ें, सोचें और आत्मनिर्भर बनें। आज जब मैं अपने जीवन की उपलब्धियों और अनुभवों पर विचार करती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि उनमें मेरी माँ का सबसे बड़ा योगदान है। उन्होंने मुझे अक्षरों का ज्ञान दिया, लेकिन उससे भी अधिक जिज्ञासा, साहस और आत्मविश्वास दिया। उन्होंने सिखाया कि सीमाएँ चाहे कितनी भी हों, मनुष्य अपने भीतर ऐसा उजाला जगा सकता है जो जीवन भर उसका मार्गदर्शन करता रहे। मेरे लिए माँ केवल जन्मदात्री नहीं, बल्कि शिक्षा, संघर्ष और आशा की जीवित प्रतीक हैं।
विद्यालय संस्कृति, स्त्री शिक्षा और आत्मविश्वास का निर्माण
विद्यालय बच्चों के व्यक्तित्व, सोच, व्यवहार, आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह केवल ज्ञान प्रदान करने वाली संस्था नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश है जहाँ बच्चे स्वयं को, अपने समाज को और अपने समय को समझना सीखते हैं। विशेष रूप से लड़कियों के लिए विद्यालय वह पहला सार्वजनिक संसार होता है, जहाँ वे घर की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी क्षमताओं और संभावनाओं को पहचानने का अवसर प्राप्त करती हैं।
ग्रामीण समाज में विद्यालय लंबे समय तक शिक्षा का एकमात्र औपचारिक केंद्र रहा है। आज भी अनेक गाँवों में यही वह स्थान है जहाँ बच्चे पहली बार विविध विचारों, अनुभवों और सामाजिक संबंधों से परिचित होते हैं। किंतु विद्यालय समाज से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं होता। समाज में विद्यमान धारणाएँ, पूर्वाग्रह और असमानताएँ उसकी संस्कृति में भी दिखाई देती हैं।
लड़कियों और लड़कों के प्रति व्यवहार में अंतर इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। हमारे समाज में लड़कियों से बचपन से ही अनुशासन, शालीनता और आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाती है। विद्यालयों में भी यह दृष्टिकोण अनेक रूपों में दिखाई देता है। यदि कोई लड़की अधिक प्रश्न पूछती है, अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है या किसी बात पर असहमति प्रकट करती है, तो उसे कई बार ‘बहुत बोलने वाली’ या ‘जिद्दी’ कह दिया जाता है। वहीं लड़कों की जिज्ञासा को प्रायः सक्रियता और बुद्धिमत्ता का संकेत माना जाता है। यह भेदभाव भले प्रत्यक्ष न दिखाई दे, लेकिन धीरे-धीरे लड़कियों के आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता को प्रभावित करता है।
विद्यालय की संस्कृति केवल कक्षा तक सीमित नहीं होती। खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, प्रयोगशालाएँ, वाद-विवाद, पुस्तकालय और सहपाठियों के साथ संवाद भी शिक्षा की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। यदि इन क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी सीमित कर दी जाए, तो उनके व्यक्तित्व के विकास की संभावनाएँ भी सीमित हो जाती हैं। लंबे समय तक उन्हें ऐसी गतिविधियों तक ही सीमित रखा गया जिन्हें ‘स्त्रियोचित’ माना जाता था, जबकि नेतृत्व, खेल, विज्ञान और प्रयोगधर्मी कार्यों को लड़कों के लिए अधिक उपयुक्त समझा जाता रहा। परिणामस्वरूप अनेक प्रतिभाशाली लड़कियाँ अपनी क्षमताओं का पूरा विकास नहीं कर पातीं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आत्मविश्वास जन्मजात नहीं होता। यह निरंतर प्रोत्साहन, अवसर और सकारात्मक अनुभवों से विकसित होता है। जब किसी लड़की को प्रश्न पूछने, निर्णय लेने, नेतृत्व करने और नई चुनौतियाँ स्वीकार करने का अवसर मिलता है, तब उसके भीतर आत्मविश्वास का निर्माण होता है। इसके विपरीत यदि उसे बार-बार रोका जाए या उसकी जिज्ञासाओं को महत्व न दिया जाए, तो धीरे-धीरे उसके भीतर संकोच और आत्म-संदेह विकसित होने लगता है।
विद्यालय तभी सार्थक कहा जा सकता है जब वह विद्यार्थियों को केवल उत्तर याद करने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और प्रश्न करने के लिए भी प्रेरित करे। जिस वातावरण में जिज्ञासा और संवाद को सम्मान मिलता है, वहाँ रचनात्मकता, नवाचार और आत्मविश्वास का विकास स्वाभाविक रूप से होता है। लड़कियों के लिए यह स्वतंत्रता और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक संरचनाएँ लंबे समय तक उनके निर्णय लेने के अधिकार को सीमित करती रही हैं।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन स्त्रियों को शिक्षा और अवसर मिले, उन्होंने अपने समय और समाज को नई दिशा दी। भारतीय परंपरा में गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और घोषा जैसी विदुषी स्त्रियों ने ज्ञान की परंपरा को समृद्ध किया। आधुनिक भारत में पंडिता रमाबाई, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा और इंदिरा गांधी जैसी महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि शिक्षा स्त्री को केवल आत्मनिर्भर नहीं बनाती, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का वाहक भी बनाती है।
आज भले ही शिक्षा के अवसर पहले की तुलना में अधिक उपलब्ध हों, लेकिन समान अवसरों की चुनौती अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों की संस्कृति अधिक संवेदनशील, समावेशी और समानतापूर्ण बने। लड़कियों को केवल पढ़ने का अवसर ही नहीं, बल्कि नेतृत्व, विज्ञान, खेल, कला और सार्वजनिक अभिव्यक्ति के सभी क्षेत्रों में समान भागीदारी मिले। उन्हें यह अनुभव कराया जाए कि उनकी जिज्ञासा, उनकी आवाज़ और उनके सपने उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने किसी और के।
लालटेन की लौ से आत्मनिर्भरता तक
आज जब अपने जीवन की यात्रा पर पीछे मुड़कर दृष्टि डालती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि शिक्षा का अर्थ मेरे लिए कभी केवल विद्यालय, पाठ्यपुस्तकों या डिग्रियों तक सीमित नहीं रहा। उसका वास्तविक स्वरूप मुझे घर, परिवार, गाँव और सबसे अधिक अपनी माँ के जीवन से समझ में आया। बचपन में जिन बातों को मैं सामान्य जीवन का हिस्सा मानती थी, समय के साथ वे ही मेरे लिए शिक्षा के गहरे सूत्र बनती चली गईं। माँ का संघर्ष, पिता का अनुशासन, दादी की परंपरागत सोच और गाँव का सामुदायिक जीवन, इन सबने मिलकर मेरी दृष्टि का निर्माण किया।
आज समझ पाती हूँ कि शिक्षा मनुष्य को अपने भीतर झाँकना, विवेकपूर्ण निर्णय लेना और परिस्थितियों का सामना करना सिखाती है। विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह आत्मनिर्भरता का सबसे सशक्त माध्यम है, क्योंकि वही उन्हें अपनी पहचान, अपने अधिकारों और अपनी संभावनाओं को समझने का अवसर प्रदान करती है।
मेरे जीवन में यह विश्वास किसी सिद्धांत या पुस्तक से नहीं आया, बल्कि एक स्त्री के जीवन-संघर्ष को देखते हुए विकसित हुआ। वह स्त्री मेरी माँ थीं। दिनभर परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने के बाद भी वे सीखने की अपनी जिज्ञासा को जीवित रखती थीं। आज भी स्मृति में वह दृश्य उज्ज्वल है। रात का सन्नाटा, मिट्टी का घर, चारों ओर पसरा अँधेरा और लालटेन की पीली रोशनी में बैठी एक स्त्री, जो पढ़ते हुए अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नया रास्ता बना रही थी। उस समय शायद मैं नहीं समझती थी कि वह केवल पुस्तक नहीं पढ़ रही थीं, बल्कि जीवन की सीमाओं को चुनौती दे रही थीं।
वर्षों बाद महसूस होता है कि वही लालटेन की लौ मेरे भीतर भी एक विश्वास बनकर जलती रही। उसी ने मुझे सीखने, सोचने और आगे बढ़ने का साहस दिया। यदि आज मैं अपने बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोचने, जिज्ञासु बनने और अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए प्रेरित कर पाती हूँ, तो उसके पीछे माँ की वही शिक्षा है जो उन्होंने अपने जीवन से दी थी।
आज जब शिक्षा पर इतने विमर्श हो रहे हैं, नई नीतियाँ बन रही हैं और ज्ञान के असंख्य स्रोत उपलब्ध हैं, तब भी मुझे लगता है कि शिक्षा का मूल प्रश्न वही है कि क्या वह मनुष्य को स्वतंत्र सोचने, संवेदनशील बनने और अपने भीतर के प्रकाश को पहचानने में सक्षम बना रही है। यदि शिक्षा केवल सूचना और प्रतिस्पर्धा तक सीमित रह जाए, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्ची शिक्षा व्यक्ति को स्वयं से संवाद करना सिखाती है, उसे अपने समय और समाज के प्रति सजग बनाती है तथा दूसरों के दुःख-सुख को समझने की मानवीय दृष्टि प्रदान करती है। मेरी माँ ने शायद किसी शैक्षिक सिद्धांत की भाषा में यह बात कभी नहीं कही, लेकिन अपने जीवन से मुझे यही सिखाया कि शिक्षा मनुष्य की चेतना का विस्तार करती है।
बंदिशें हर युग में रही हैं और आगे भी रहेंगी। उनका स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उनसे मुक्ति का सबसे प्रभावी साधन शिक्षा ही है। शिक्षा वह उजास है जो व्यक्ति को भीतर से प्रकाशित करती है। वह केवल एक जीवन नहीं बदलती, बल्कि पीढ़ियों की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। इसलिए जब भी मैं स्त्री शिक्षा के बारे में सोचती हूँ, मेरे सामने किसी विद्यालय की इमारत नहीं, बल्कि लालटेन की रोशनी में पढ़ती हुई अपनी माँ की छवि उभरती है। मेरे लिए शिक्षा का सबसे सुंदर और सबसे सशक्त प्रतीक वही है, अँधेरे के बीच जलती हुई एक छोटी-सी लौ, जो स्वयं भी प्रकाशित होती है और दूसरों के लिए भी रास्ता रोशन करती है।
। लेखिका: कल्पना मनोरमा
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