*स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल* बुनियादी चिंतन: बालिका से वामा।।स्तंभ 44 विरासत का अर्थ केवल भूमि, संपत्ति या आभूषण नहीं होता। हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को विचार, जीवन-मूल्य, अनुभव, स्मृतियाँ और जीवन जीने का ढंग भी सौंपती है। स्त्रियों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरी हो जाती है। परिवार और समाज में एक स्त्री जिस तरह रहती है, काम करती है, संबंध बनाती है और परिस्थितियों का सामना करती है, उसका कोई न कोई अंश अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहता है। यह विरासत हमेशा शब्दों में नहीं होती। वह व्यवहार, चुप्पी, निर्णय और संघर्ष से निपटने के तरीकों में भी दिखाई देती है। इस अर्थ में एक स्त्री दूसरी स्त्री को केवल परंपरा नहीं देती, बल्कि अपने जीवन से बनी एक दृष्टि भी सौंपती है। यही दृष्टि आगे चलकर उसके अपने जीवन और सामाजिक समझ का हिस्सा बन सकती है। इस विरासत का पहला स्वरूप भाषा है। बच्ची दुनिया को पहचानना अपने आसपास की स्त्रियों की भाषा से शुरू करती है। वह केवल शब्द और संबोधन नहीं सीखती, बल्कि यह भी समझती है कि किससे कैसे बोलना चाहिए, कहाँ अपनी बात रखनी है और कहाँ चुप रह जाना है। वह जानने लगती ह...
ReplyDeleteनमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 11 जनवरी 2021 को 'सर्दियों की धूप का आलम; (चर्चा अंक-3943) पर भी होगी।--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
बहुत सुन्दर
ReplyDeleteसुन्दर सृजन। विश्व हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएं।
ReplyDeleteआप सभी हिंदी साहित्य से जुड़े हुए सुधी जनों का हार्दिक आभार !
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविता।
ReplyDeleteअति सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर सृजन।
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