मन यूँ करता है अब कि कुछ दिन ही सही न भूख लगे, न प्यास की उठे कोई पुकार देह अपना बोझ ख़ुद ही उतार कर फेंक दे और मैं सिर्फ़ स्वांस भर रह जाऊँ न बच्चों को चुगाने की चिंता हो, न समय के दाँत काटने का डर यह इनकार नहीं है जीवन से, बस पल भर के लिए शोर से बाहर आना चाहती हूं मैं उस पेड़ पर रहना चाहती हूँ जहां जड़ें उसकी हों, और भरोसा मेरा जहाँ हर प्रश्न का उत्तर फल की तरह नहीं, छाया की तरह उतरे मेरे भीतर मैं किताब में खोना चाहती हूँ अक्षरों के बीच अपना नाम भूलकर पन्ने पलटते हुए सबसे बुरी कथा की किरदार बन पाठकों की आँखों में झांकना चाहती हूँ चिड़ियों से बातें करना चाहती हूँ— बिना अर्थ का बोझ ढोए जो जानती हैं चिड़ियां सीखना चाहती हूँ और उन्हें बताना चाहती हूँ कि उड़ान कोई उपलब्धि नहीं, एक सहज आदत है हवा में उड़ना चाहती हूँ बिना दिशा,बिना मंज़िल जहाँ से लौटना अनिवार्य न हो और ठहरना अपराध न बने किसी अनजाने जंगल में खो जाना चाहती हूँ मैं ख़ुद को थोड़ी देर जीने देना चाहती हूँ मैं पेड़ होना चाहती हूँ। कल्पना मनोरमा
बात ये नहीं कि मैं बूढ़ी हो रही हूँ बात ये है कि मैं सुंदर हो रही हूँ धुंधलाई आँखों में जीवन के रंग अब दिखते हैं अपने सबसे मौलिक स्वरूप में साथी की कही हर बात में ढूँढ़ लेती हूँ कुछ अपने योग्य अर्थ; बिगड़ी बात पर अब घबराहट नहीं होती बातों के मायने तुरंत नहीं बदलती— सारे अर्थ उधारी खाते में डिपॉज़िट कर देती हूँ कभी फुर्सत में समझने को आँखों के नीचे उभर आई महीन रेखाएँ कभी दुलराती हैं मुझे, कभी सच का पानी बनकर आँखें साफ कर जाती हैं घर से निकलते हुए अब आईने की नहीं घड़ी और छड़ी की याद रहती है समय के साथ कदम मिलाकर चलने में एक अनोखा आनंद है और आनंद है जीवन के अंतिम शब्दनाद को धीरे-धीरे अपने भीतर उतरते हुए देखने में। कल्पना मनोरमा
दूसरों के द्वारा गढ़ी हुई छवि 22 जुलाई 2026 अब जाकर एहसास होता है कि लेखक का जीवन केवल उसके अच्छे लेखन से नहीं चलता। एक रचनाकार के साथ उसकी रचनात्मक छवि ही नहीं चलती, उसके समानांतर एक गढ़ी हुई अदृश्य छवि भी चलती है। आश्चर्य यह है कि उस छवि को गढ़ने में स्वयं लेखक का कोई योगदान नहीं होता। लोग उसे अपने अनुभवों, अपनी धारणाओं, अपने अहं और अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार आकार देते रहते हैं। धीरे-धीरे वह छवि इतनी दूर तक पहुँच जाती है कि स्वयं लेखक उससे अपरिचित रह जाता है। हाल ही की एक घटना ने वर्षों पुरानी एक स्मृति फिर से जगा दी। कुछ महीने पहले एक पत्रिका के संपादक ने स्वयं कहानी माँगी थी...कहानी भेजते समय अच्छा लगा। लगा कि मेरे लेखन पर संपादकों का विश्वास बनने लगा है। कोने में बैठकर लिखी गई वह कहानी पाठकों तक पहुँचेगी। वैसे भी कहानी का प्रकाशित होना या न होना बड़ा प्रश्न नहीं है। हर संपादक को अपना निर्णय लेने का अधिकार है। मुझे तो देर तक उस मौन ने रोके रखा जो रचना लेने के बाद लगातार बना रहा।...
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