सुमन केशरी से यह संवाद मात्र साक्षात्कार नहीं, एक रचनाकार की आत्मस्वीकृति है। सुमन केशरी एक ऐसी कवि हैं, जिन्होंने निःसंकोच अनेक विषयों पर कविताएँ रची हैं। वे रामायण-महाभारत के मिथकीय चरित्रों की मूल कथा को बनाए रख कर उनमें आधुनिक चेतना भर कर समसामयिक बनाने की कला में निष्णात हैं। इसी के साथ में ठेठ आधुनिक विषयों व संवेदनाओं की भी कविताएँ रचती हैं तथा कविताओं का विश्लेषण भी करती हैं। 'कथानटी' के रूप में वे न केवल कथा कहती हैं, बल्कि उसे जीती भी हैं। यह बातचीत स्मृति, संघर्ष, प्रेम, विचार और असहमति की कई परतें खोलती है। उनके लेखन में गहन सामाजिक दृष्टि, आत्ममंथन और स्त्री-स्वर की स्पष्टता है। साहित्यिक सत्ता से टकराते हुए वे अपनी मौलिकता बनाए रखती हैं। यह वार्ता हिंदी साहित्य में स्त्री की सजग, विचारशील और जिजीविषा-भरी उपस्थिति का दस्तावेजीकरण करती है। यह एक लेखिका के सतत संघर्ष और संवेदना की गाथा है। क.म. कल्पना मनोरमा ( संवादक ) सु.के. सुमन केसरी ( प्रतिसंवादक ) क.म. : आपने लिखना कब से शुरू किया? किसी की प्रेरणा से या स्वस्फूर्त। पहली कहानी/ कविता/आलोचना...
स्वदेश का रविवारीय स्तंभ 4 बुनियादी चिन्तन : बालिका_से_वामा स्त्री भाषा का प्रारंभ बालिका के बचपन में ही हो जाता है, जब उसका मन अबोध और जिज्ञासु होता है। इस उम्र में वह अपने आस-पास की महिलाओं जैसे माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी, बड़ी बहन से सीखती है। ये महिलाएँ ही उसके लिए भाषा, व्यवहार, संस्कार और स्त्रीत्व की पहली शिक्षक होती हैं। बालिका के मन में उठने वाले सवाल, उसकी जिज्ञासा, उसके भावों को समझकर और सही दिशा देकर ये महिलाएँ ही "स्त्री भाषा" के बुनियाद को मजबूत करती हैं। उनके अनुभव, बोलने का अंदाज़, भावों की अभिव्यक्ति आदि सब मिलकर बालिका की भाषा को आकार देते हैं। इसलिए, यह ध्यान देना और समझना आवश्यक है कि कैसे ये रिश्तेदार स्त्रियाँ अपनी अबोध बालिकाओं को सुनती, समझती और संभालती हैं, ताकि उनकी भाषा और व्यक्तित्व सकारात्मक और सशक्त बने। बालिका सुदृढ़ होगी तो वामा व्यवस्थित हो सकेगी। माँ भाषण नहीं,भाषा दो ...
मन यूँ करता है अब कि कुछ दिन ही सही न भूख लगे, न प्यास की उठे कोई पुकार देह अपना बोझ ख़ुद ही उतार कर फेंक दे और मैं सिर्फ़ स्वांस भर रह जाऊँ न बच्चों को चुगाने की चिंता हो, न समय के दाँत काटने का डर यह इनकार नहीं है जीवन से, बस पल भर के लिए शोर से बाहर आना चाहती हूं मैं उस पेड़ पर रहना चाहती हूँ जहां जड़ें उसकी हों, और भरोसा मेरा जहाँ हर प्रश्न का उत्तर फल की तरह नहीं, छाया की तरह उतरे मेरे भीतर मैं किताब में खोना चाहती हूँ अक्षरों के बीच अपना नाम भूलकर पन्ने पलटते हुए सबसे बुरी कथा की किरदार बन पाठकों की आँखों में झांकना चाहती हूँ चिड़ियों से बातें करना चाहती हूँ— बिना अर्थ का बोझ ढोए जो जानती हैं चिड़ियां सीखना चाहती हूँ और उन्हें बताना चाहती हूँ कि उड़ान कोई उपलब्धि नहीं, एक सहज आदत है हवा में उड़ना चाहती हूँ बिना दिशा,बिना मंज़िल जहाँ से लौटना अनिवार्य न हो और ठहरना अपराध न बने किसी अनजाने जंगल में खो जाना चाहती हूँ मैं ख़ुद को थोड़ी देर जीने देना चाहती हूँ मैं पेड़ होना चाहती हूँ। कल्पना मनोरमा
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