शीशियाँ इत्र की



 शीशियाँ इत्र की भी

रहती हैं बे-खुशबू तब तक

जब तक खोलता नहीं कोई उन्हें

कभी कभी ही सही

तुम, खुलकर हंसा करो।

 

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