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स्त्री के आत्मबल का उत्सव

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        हरितालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि स्त्री के मन, उसकी आस्था और रिश्तों के भावनात्मक ताने-बाने का उत्सव है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से विवाहिता स्त्रियाँ इसे अपने पति की लंबी आयु, सुखमय जीवन और दांपत्य के सौंदर्य की कामना के लिए करती हैं। सुबह-सुबह मोहल्ले की गलियों में मेंहदी की हल्की-सी महक तैरती है। आँगन में गोबर से लिपे चौक पर पीतल का कलश सजता है, पीली या जो जिसे पसंद रंग की साड़ी पहने महिलाएँ गीत गुनगुनाती हैं। ढोलक की थाप पर सखियाँ “भादों की रात अंधेरी, मोहे डर लागे ” गाती हैं। कहीं बच्चों की खिलखिलाहट है, कहीं फूलों की माला पिरोती सहेलियाँ। बिन जल पीए स्त्रियां अपनी श्रद्धा में लीन दिखती हैं। यह दृश्य न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का है बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक भावनात्मक सांस्कृतिक परंपरा का सजीव रूप है।   आस्था और तपस्या का संगम पुराने समय में हरितालिका तीज का...

संस्कार : डर या आत्मविश्वास -स्तम्भ -6

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  स्वदेश का रविवारीय स्तंभ 6 #स्तम्भ_बालिका_से_वामा छह–सात वर्ष की बच्चियाँ जीवन का सबसे कोमल और रचनात्मक समय जी रही होती हैं। इसी उम्र में यदि उन्हें डर और आज्ञाकारिता के बोझ में ढाल दिया जाए तो उनका व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। संस्कार का अर्थ भय नहीं, बल्कि विवेक और आत्मविश्वास है। परिवार यदि उन्हें भरोसा, सुरक्षा और संवाद न देकर उनका वस्तुकरण करने लगे तो वही बच्चियाँ जो आगे चलकर साहस, न्याय और संवेदना से समाज को बदलने की शक्ति बन सकती हैं, एक मामूली स्त्री में बदल कर खेद भरा जीवन जीन के लिए मजबूर हो जाती है। आज जब हम बार बार कह रहे हैं कि दुनिया बदल गई है। यकीन मानिए हमने बच्चियों की परवरिश मन से नहीं की और जब वही बच्चियां मां बनीं, तो उन्होंने अपनी औलाद में मानवीय गुणों को नहीं रोप पाया। बदलते वक्त को देखकर जो तुम्हें खुशी होती है, तो ये जानो कि जब सभ्यता के रथ पर सवार होकर समय चलता है, तब ये सब घटित होता है। स्त्री, सभ्यता की सहेली है और सृष्टि की धुरी। अब आप इस बात पर विचार करें...... संस्कार चूरन नहीं, जीवन का लेन देन है। कुसंस्कारी, कठोर और दुत्कारी हुई स्त्री सुसंस्कार...

कन्या पूजन नहीं, कन्या पोषण :स्वदेश सप्तक में स्तम्भ-5

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  बालिका से वामा आख़िरकार बड़ी स्त्री, माँ, दादी, बुआ, मौसी कब समझेंगी कि स्त्री देवी नहीं, इंसान होती है। उम्र में बड़ी स्त्रियां अपने अनुभव और सांस्कृतिक आदर्शों के माध्यम से अपनी अबोध बच्ची के मन में “देवी भाव” कब तक रोपती रहेंगी ? यह देवत्व की भावना बच्ची के कोमल मन में सामाजिक निर्माण, पवित्रता, नम्रता और आदर्शपूर्ण चरित्र की कल्पना उसके बाल मन को विकलांग बनाती है। “धरती से अलग” होने की भावना पैदा करती है। और इस तरह एक बालिका का आदर्शीकृत रूप स्त्रियां ही बनाती हैं। अनजाने दबाव और भ्रम उसके स्वाभाविक व्यक्तित्व और भावनाओं को कुचल, अप्राकृतिक दबाव डालकर अपनी ही बेटी की असली पहचान और सहज भावनाओं का क्षरण कर देती हैं। देवी बनाकर पूजने की प्रक्रिया अक्सर संस्कृति और परंपरा के बहाने की जाती है, जिसमें स्त्रियों की ही अपनी अबोध स्त्री के प्रति लापरवाही कही जाएगी। आज का कॉलम इन्हीं भावनाओं से ओतप्रोत है। कन्या पूजन नहीं, कन्या पोषण                    ...

उजास से भरी कृष्ण की आँखें

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   कृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त 2025 कहा जाता है कि आँखें मन का दर्पण होती हैं। शब्दों से कहीं अधिक बोलती हैं। मनुष्य की गहरी संवेदनाओं और अनुभूतियों को उजागर कर बयान कर देती हैं मन के भीतर की सच्चाई। मनोविज्ञान में यह सत्य माना गया है कि अवचेतन मन जिन भावनाओं को छुपा नहीं पाता, वे अनायास ही आँखों में आ बसता है। क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या, पीड़ा या उल्लास, सबसे पहले आँखें ही उनका खुलासा कर देती हैं। इसी कारण कभी–कभी बिना कुछ कहे भी व्यक्ति अपनी स्थिति दूसरों के सामने न चाहते हुए प्रकट कर देता है। यदि हम भारतीय दर्शन की ओर देखें तो यह विचार और भी गहराई से भरा दिखता है। कृष्ण का चरित्र इस बात का जीवंत उदाहरण है। जिसने भी उन्हें चाहा, उन्होंने स्वयं को उसी भाव में प्रस्तुत कर दिया। मीरा के लिए वे प्रेमस्वरूप बने, अर्जुन के लिए सारथी और मार्गदर्शक, गोपियों के लिए रसिक प्रियतम, और विदुर के लिए अतिथि और उनके प्रिय भगवान। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह तथ्य बताता है कि व्यक्ति की भावना और अपेक्षा ही उसके अनुभव को गढ़ती है। कृष्ण की छवि हर साधक के मन में उसकी अपनी चाह और लगन के अनुसार आकार ले लेती...

स्वतंत्रता की अनुभूति: स्त्री की दृष्टि

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  यह लेख स्त्री–स्वतंत्रता के विविध आयामों को गहराई से प्रस्तुत करता है। इसमें व्यक्तिगत, सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टांतों के माध्यम से पाठक को यह समझाया गया है किस्वतंत्रता केवल संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्मनिर्णय की प्रक्रिया है। लेख की विशेषता यह है कि यह स्त्री के निजी अनुभवों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना से जोड़ते हुए पाठक को आत्ममंथन और प्रेरणा दोनों देता है।                        स्वतंत्रता की अनुभूति: स्त्री की दृष्टि                            स्वतंत्रता केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित नहीं, यह एक व्यक्ति की चेतना,आत्माभिव्यक्ति और निर्णय की क्षमता से भी जुड़ी होती है। जब एक भारतीय स्त्री "स्वतंत्रता" का नाम सुनती है, तो क्या वह केवल 15 अगस्त के झंडारोहण, देशभक्ति गीतों और राष्ट्रगान तक इस भाव को समेट देती है? या उसके भीतर कोई गहरा द्वंद्व उठता है, जहाँ वह अपनी स्वतंत्रता के बारे में सोचने लगती है।  देश आज़ाद कराने को गांध...

बचपन को आज़ाद कराओ

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देश रोजाना दैनिक अखबार में 15 अगस्त 2025 को प्रकाशित      बचपन को आज़ाद कराओ     हर साल पंद्रह अगस्त का दिन पूरे देश को आज़ाद उमंगों में डुबो देता है, तिरंगे की चमकती धारियाँ, हवा में गूंजते देशभक्ति गीत, स्कूलों के मंच पर झूमते बच्चे और चारों ओर गूंजते स्वतंत्रता के भाषण। लेकिन इस जश्न की गहमागहमी में हमें एक और कैद पर भी सोचना होगा, एक खामोश कैद, जो लोहे की सलाखों से भी मजबूत है। यह है तकनीकी डिजिटल जेल, जिसकी चाबी किसी जेलर के पास नहीं, यह कैद मोबाइल स्क्रीन की है, जिसमें देश का अबोध बचपन धीरे-धीरे कैद हो रहा है। जहाँ कभी बच्चे गली-गली दौड़ते, मिट्टी में घुटनों तक धँसते, पेड़ों पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ते, पतंगबाज़ी में चीखते-गाते थे, वहीं आज उनका बचपन मोबाइल स्क्रीन की हलचल तक सिमट गया है: गेम का लेवल पार करना, शॉर्ट वीडियो में खो जाना, और देर रात तक टिमटिमाती रोशनी में आँखें गड़ाए रहना। इतिहास में पढ़ा जा सकता है कि अंग्रेज़ी शासन की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नौजवानों ने अपने सपनों को देश की आज़ादी से जोड़ दिया था। तभी आज के बच्चे...

पप्पू पहलवान

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