स्त्री के आत्मबल का उत्सव
हरितालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि स्त्री के मन, उसकी आस्था और रिश्तों के भावनात्मक ताने-बाने का उत्सव है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से विवाहिता स्त्रियाँ इसे अपने पति की लंबी आयु, सुखमय जीवन और दांपत्य के सौंदर्य की कामना के लिए करती हैं। सुबह-सुबह मोहल्ले की गलियों में मेंहदी की हल्की-सी महक तैरती है। आँगन में गोबर से लिपे चौक पर पीतल का कलश सजता है, पीली या जो जिसे पसंद रंग की साड़ी पहने महिलाएँ गीत गुनगुनाती हैं। ढोलक की थाप पर सखियाँ “भादों की रात अंधेरी, मोहे डर लागे ” गाती हैं। कहीं बच्चों की खिलखिलाहट है, कहीं फूलों की माला पिरोती सहेलियाँ। बिन जल पीए स्त्रियां अपनी श्रद्धा में लीन दिखती हैं। यह दृश्य न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का है बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक भावनात्मक सांस्कृतिक परंपरा का सजीव रूप है। आस्था और तपस्या का संगम पुराने समय में हरितालिका तीज का...